जाति की पूँछ: लोकतंत्र का सबसे विश्वसनीय अंग

जाति की पूँछ: लोकतंत्र का सबसे विश्वसनीय अंग

मनुष्य के विकास में पूँछ का लुप्त हो जाना शायद प्रकृति की एक ऐतिहासिक चूक थी। कम से कम मनुष्य तो ऐसा ही मानता है। वरना वह बार-बार पीछे मुड़कर क्यों देखता रहता कि कहीं पूँछ फिर से उग तो नहीं आई? भीतर कहीं न कहीं उसे मलाल की काश ये पूंछ फिर से उग आये तो मजा आ जाए । आखिर इंसान है; जो मिला है बड़ा कपाल ,सोचने समझने तर्क करने की शक्ति उसकी क़द्र क्यों करेगा,उसकी नजर तो बस पूंछ खोज रही है  उसे चैन कहाँ!

कुछ लोगों ने समझाया—“भाई, नाक भी तो है! उसी से हर मामले में घुस सकते हो। किसी का भी काम बिगाड़ने के लिए नाक पर्याप्त है।”
पर आदमी संतुष्ट कहाँ हुआ!नाक से आप सिर्फ सूँघ सकते हैं,नाक जब चाहे तब कट सकती है ,पूंछ का अपना आहे जलवा..हनुमान जी ने पूंछ के बल पर पूरी लंका अमें आग लगाए हम कम से कम अपने गिने चुने दुश्मनों के घर तो फूंक ही सकते हैं l जब चाहे तब  पूँछ से  किसी को भी लपेट सकते हैं,पटखनी दे सकते हैं ।

नाक सीमित है, पूँछ बहुउपयोगी है।

और तभी उसे आत्मिक शांति मिली—जब जात की पूँछ उसके पीछे  बांध दी !
वह भी ऐसी कि जन्म के साथ मुफ़्त। अस्पताल से छुट्टी के समय बच्चे के नाम, वजन और लंबाई के साथ उसके पीछे एक अदृश्य किंतु पूर्णतः मान्य पूँछ बाँध दी जाती है—जाति की पूँछ।

पूँछ ऐसी ढीठ और चिपकू कि जीवन भर साथ रहे । कभी पहचान का डमरू बजाये , कभी वैमनस्य की कटार बन कर किसी के भी सीने में घोंप दी जाए । कभी गले की  घंटी बन जाए , तो कभी दूसरों के लिए चाबुक की तरह भी इस्तेमाल कर सकें । कभी सजावट के लिए , तो कभी सुरक्षा-कवच का पुख्ता इंतज़ाम ।

जाति की पूँछ का उपयोग अत्यंत बहुआयामी है। आपकी पूँछ के हिसाब से आपकी पूछ तय होगी। कोई आपसे सवाल पूछे या न पूछे—यह आपकी पूँछ के रंग, रूप, लंबाई और इतिहास पर निर्भर करेगा।
नाक पर बैठी सवालों की मक्खियाँ? बस पूँछ झटकी और उड़ गईं।
जिम्मेदारी की भनभनाहट? एक झटके में साफ।

इसके साथ एक लाइसेंस भी मिलता है—पीड़ित होने का, पीड़ित दिखने का, पीड़ा बाँटने का, और अवसर मिले तो पीड़ा वितरित करने का भी।
दमन, अत्याचार, भेदभाव—सबकी  नैतिक किट साथ में।
सामने वाला ज्यादा चिक चिक करे तो उसे  पूँछ में लपेटकर दो-चार सामाजिक पलटियाँ मार दो—आजकल इसे “सीधा संवाद” कहा जाता है।

यह पूँछ सिर्फ पहचान नहीं, पूरा टूलकिट है—पद, प्रतिष्ठा, नमस्ते, नौकरी, माल, ठेका, सत्ता, विवाह, राजनीति, मोहल्ला, संस्था—हर जगह पूँछ पहले पहुँचती है आदमी बाद में..पूंछ है तो  पहुँच बनती है। इंसान ने पूँछ को ओढ़ना-बिछाना सब मान लिया है।
हाँ,कुछ  पूँछ गंधा रही हैं , मक्खियाँ भी भिनभिना रही हैं।शायद मखियों को बैठे रहने के लिए पूंछ का गन्धाना जरूरी है l वो इतने अकर्मण्य की अपनी पूंछ को हिलाकर मक्खियों को उड़ा भी नहीं सकते ,अपनी पूंछ पर बैठी मक्खियाँ ही तो उन्हें समाज में विक्टिम दिखने का जरिया है l

राजनीति ने इसकी असली क्षमता सबसे पहले पहचानी। पहले राजनीति नीति से चलती थी; अब नीति से पहले जाति चलती है। घोषणापत्र कम, जाति-सूचियाँ ज़्यादा छपती हैं। नेता भाषण में अपनी पूँछ दिखाकर आपकी पूँछ से मेल बैठाता है। चुनाव जीतते ही वही पूँछ जेब में रख लेता है—ज़रूरत पड़े तो फिर निकाल लेता है। पक्ष हो या विपक्ष—दोनों की पूँछ बराबर लंबी, बस रंग अलग।

मतदाता भी कम चालाक नहीं। सड़क, पानी, स्कूल, अस्पताल बाद में। पहले देखेगा—कौन मेरी पूँछ सहला रहा है। जो जितना सहलाए, वही योग्य। अगर सम्मान सुरक्षित है तो गड्ढे में भी गर्व से गिरा जा सकता है।

जाति का गर्व अत्यंत भावुक प्राणी है। इसमें तर्क का प्रवेश वर्जित है। आप कह दीजिए—“जाति से ऊपर इंसान होना चाहिए।” सामने वाला तुरंत आहत—
“आप हमारी पहचान मिटाना चाहते हैं!”
पहचान बड़ी नाज़ुक वस्तु है। हवा लगे तो टूट जाए, पर दूसरे की पहचान तोड़ने में यही पहचान फौलाद बन जाती है।

सोशल मीडिया ने तो इस पूँछ को डिजिटल पंख दे दिए हैं। प्रोफ़ाइल फोटो, बायो, हैशटैग—हर जगह जातीय गौरव लहरा रहा है। पोस्ट ऐसी कि लगे—अगर जाति न होती तो सभ्यता भी न होती। इतिहास भी अब पूँछ के रंग से रंगा जाता है—जो हमारे हैं, वे महान; जो नहीं हैं, वे संदिग्ध संदेहास्पद ।

और मज़े की बात यह कि पूँछ पर गर्व करने वाला आदमी चलना भूल चुका है। लोकतंत्र की डाली पर पूँछ लपेटे लटका हुआ है। आगे बढ़ना नहीं—हाँ, उछल-कूद खूब कर सकता है। उसे पता है—चलना शुरू किया तो पूँछ का महत्व कम हो जाएगा।

और यही है हमारे लोकतंत्र की सबसे स्थायी उपलब्धि—
हर कोई अपनी-अपनी जाति की पूँछ लगाए, मूँछों पर ताव दिए खड़ा है।
लोकतंत्र चल रहा है—या यूँ कहिए, पूँछों के सहारे लटक रहा है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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