मनुष्य सत्य को सिद्धांतों में खोजता है, पर सत्य सिद्धांतों से पहले अनुभव में जन्म लेता है। हम अक्सर यह जानना चाहते हैं कि जीवन का अर्थ क्या है, हमारा धर्म क्या है, हमारा मार्ग क्या है। पर यदि हम ठहरकर अपने ही जीवन को ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि उत्तर कहीं बाहर नहीं, हमारे व्यवहार, हमारी आदतों और हमारे निर्णयों में ही छिपे हैं। हमारा जीवन ही हमारा दर्पण है।
दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता। वह सजावट को नहीं, वास्तविकता को दिखाता है। उसी प्रकार जीवन भी हमारे दावों को नहीं, हमारे चुनावों को प्रकट करता है। यदि हम कहते हैं कि हमें समय का मूल्य पता है, तो हमारा दिन किसमें बीतता है? यदि हम कहते हैं कि हमें सत्य प्रिय है, तो क्या हम कठिन परिस्थितियों में भी सच का साथ देते हैं? यदि हम कहते हैं कि हमें स्वतंत्रता चाहिए, तो क्या हम अपनी कमजोरियों से मुक्त होने का प्रयास करते हैं?
जीवन का अवलोकन आत्मचिंतन की पहली सीढ़ी है। जब हम स्वयं को देखने लगते हैं—बिना बचाव के, बिना बहाने के—तब धीरे-धीरे एक स्पष्टता जन्म लेती है। हम देख पाते हैं कि किन बातों पर हम अनावश्यक प्रतिक्रिया देते हैं, किन स्थितियों में हमारा अहंकार सक्रिय हो जाता है, किन इच्छाओं के कारण हम बेचैन रहते हैं। यही निरीक्षण हमें भीतर की सच्चाई से परिचित कराता है।
सत्य किसी विशेष वेश में नहीं आता; वह रोज़मर्रा की घटनाओं में छिपा रहता है। जब हम बार-बार किसी परिणाम से असंतुष्ट होते हैं, तो वह संकेत है कि कहीं हमारी दृष्टि या दिशा गलत है। जब कोई आलोचना हमें अत्यधिक विचलित करती है, तो वह हमारे भीतर की असुरक्षा को उजागर करती है। जीवन हर दिन हमें पाठ पढ़ाता है—प्रश्न यह है कि क्या हम छात्र बनने को तैयार हैं?
दर्पण में देखना हमेशा सुखद नहीं होता। हम अपनी कमियों, अपने भय और अपनी असंगतियों से सामना करते हैं। पर यही सामना आत्म-विकास का आरंभ है। जो व्यक्ति स्वयं को देखने का साहस करता है, वही स्वयं को बदलने की क्षमता रखता है। जो अपनी आदतों का साक्षी बन जाता है, वही उन्हें रूपांतरित कर सकता है।
अवलोकन का अर्थ आलोचना नहीं है; यह सजगता है। यह स्वयं को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि समझना है। जब हम अपने जीवन को शांत मन से देखते हैं, तो हमें स्पष्ट होता है कि हमारी प्राथमिकताएँ वास्तव में क्या हैं। हम किसके पीछे भाग रहे हैं? हमें किससे डर लगता है? हमें वास्तव में किससे संतोष मिलता है? ये प्रश्न धीरे-धीरे हमारे भीतर की दिशा को स्पष्ट कर देते हैं।
अंततः, जीवन कोई रहस्य नहीं जिसे बाहर से खोला जाए। वह एक दर्पण है, जिसमें प्रतिदिन हमारा चरित्र, हमारा साहस और हमारी सच्चाई झलकती है। यदि हम सच में सत्य को जानना चाहते हैं, तो हमें अपने ही जीवन को ध्यानपूर्वक देखना होगा—अपने शब्दों से नहीं, अपने कर्मों से।
जब हम स्वयं के जीवन को साक्षी भाव से देखने लगते हैं, तब हमें किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती। हमारा अनुभव ही हमारा शिक्षक बन जाता है, और उसी में सत्य की रोशनी दिखाई देने लगती है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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