कबीरा खड़ा  बाजार में –

कबीरा खड़ा  बाजार में –

पहला सवाल यही है कि हम किस कबीर पर बात करें—क्योंकि कबीर एक नहीं, कई हैं। एक कबीर विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में हैं, फूटनोट और फुटकर विवादों के बीच; एक कबीर संग्रहों में हैं—श्यामसुंदरदास से लेकर और भी विद्वानों के संकलनों तक, जिनमें वाणी को कतर-बूँछ कर करीने से रखा गया है; एक कबीर लोक में गाए जाते हैं—अलग-अलग रागों, ढोलक और आल्हा की टेर पर, भारत से निकलकर एशिया और यूरोप तक; और एक कबीर विमर्शों में—जहाँ उन्हें कभी दलित चेतना का कवि कहा गया, कभी ओबीसी का स्वर, और ब्राह्मणवादी अपहरण बनाम पुनरुद्धार की बहसें चलीं। इतने कबीरों के मेले में हमारा कबीर कौन? मेरा जवाब सरल है—वही कबीर जो मनुष्य है: 15वीं शताब्दी के काशी का जुलाहा, जिसकी आँखों में करघे की तान है, दिल में प्रेम की प्यास, और जीभ पर सवालों की धार।

जन्मकथा भी चार राहों से चलती है—इतिहासकारों का कबीर: काशी के जुलाहे दंपति नीरू-नीमा के यहाँ पले; लोककथा का कबीर: विधवा ब्राह्मणी की कोख से जन्मा शिशु, जिसे जुलाहों ने पाल लिया; धर्मदासी कल्पना का कबीर: लहरतारा के कमल पर सूरज की किरणों से अवतरित; और एक वह मीथकीय कबीर जो विष्णु के अवतार ठहरते हैं। पर इन सब कथाओं को एक सुस्त शाम की चाय की तरह पीकर रख दीजिए—रचनाकार को समझने के लिए उसे मनुष्य मानना जरूरी है। जब हम कबीर को जमीन पर उतारते हैं, तभी उनकी कविता आसमान छूती है। यही सीधेपन की ताकत है: चमत्कारों की धुंध हटाएँगे, तभी विचार का सूरज निकलेगा।

अब मूल बात: कबीर का ‘ज्ञान’ क्या है, जिसकी वे घोषणा करते हैं—“संतो, आई ज्ञान की आंधी”? सबसे पहले, शास्त्र के बारे में उनका कठोर मत—ज्ञान का जीवित संदर्भ ग्रंथ नहीं, जीवन है। किताबें ठहराव हैं, जबकि जिंदगी बहाव है; ठहरा हुआ पानी सड़ता है, बहता पानी गुनगुनाता है। इसलिए वे बार-बार संकेत करते हैं: शास्त्र को सिर पर नहीं, कंधे पर रखो; और मौका पड़े तो नदी में बहा भी दो, ताकि संशय की गाठें ढीली हों। यह शास्त्र-विरोध नहीं, जीवन-समर्थन है—क्योंकि ग्रंथ तब तक उपयोगी हैं, जब तक वे प्रश्न जगाते हैं; जहाँ वे उत्तर थोपने लगें, वहाँ वे दीवार बन जाते हैं।

दूसरा और निर्णायक सूत्र—ज्ञान का द्वार प्रेम से खुलता है। “ढाई आखर प्रेम” कोई नादानी नहीं; यह अस्तित्वशास्त्र है। कबीर के यहाँ प्रेम ‘उपलब्धि’ नहीं, ‘उदासी’ से उपजा हुआ विरह है—वह बेचैनी जो विराट से दूरी का अहसास कराती है, वह तड़प जो भीतर का दरवाजा खटखटाती रहती है। यही वजह है कि उनकी पंक्तियों में विरह का साँस-साँस सुनाई देता है—आँखें पथ निहारती-निहारती झाईं पड़ जाएँ, नाम पुकारते-पुकारते आवाज बैठ जाए। कबीर सिखाते हैं: समाधान तलाशो मत, सच्ची बेचैनी को पहचानो; प्रेम समाधान नहीं, संवेदना की चरम अवस्था है—जहाँ उत्तर नहीं, उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है।

तीसरा, संप्रदायों पर उनकी निर्णायक चोट। कबीर के लिए धर्म आचरण और बोध है, संगठन और पहचान नहीं। जैसे ही धर्म चिन्हों, वेशभूषाओं, झंडों, घोषणाओं में सिमटता है, वह आत्मा खो देता है और कंकाल बच जाता है। कबीर दोनों तरफ—मंदिर और मस्जिद—एक ही सवाल फेंकते हैं: “अरे, इन दोन राह न पाई”—राह कहाँ है भाई? माला गिनने से मन रंगा नहीं; नमाज़ की आवाज ऊँची हो जाए, तो भी दिल की सतह पर शांति का एक छोटा बुलबुला फूट जाता है। उनका संदेश सीधा है—धर्म का घूँघट मन पर पड़ा है, माथे के तिलक पर नहीं; पट वहीं खोलो जहाँ अँधेरा है—भीतर।

यही घूँघट-फोड़ाई कबीर के अनुष्ठान-विरोध में भी दिखती है। तीर्थ? पानी वही जो घर के मटके में है; मूर्ति? आदर है, पर जीवन नहीं; व्रत? अनुशासन हो तो ठीक, अहं का तमगा बने तो व्यर्थ। कबीर रस्मों की देहरी पर खड़े होकर कहते हैं—रिवाज़ अच्छे हैं, पर वे सीढ़ी हैं, मकान नहीं। सीढ़ी पर चढ़कर कमरे में जाना है, सीढ़ी को ही गले लगाकर रातभर सोना नहीं।

चौथा, प्रश्न की प्रतिष्ठा—कौन? क्या? क्यों? कबीर श्रद्धा तक जाने के लिए संशय की घाटी से उतरते हैं। बिना सवालों की आग में पकाए हुए विश्वास कच्चा होता है, मौक़े पर गल जाता है। इसलिए वे काजी से पूछते हैं—इतना पढ़कर तुम बदले क्यों नहीं? पंडित से पूछते हैं—जन्म से श्रेयस्कर होने का तर्क आखिर क्यों? मुल्ला से पूछते हैं—जो खुदा फुसफुसाहट सुन ले, उसके लिए मिनार से बाँग क्यों? यह तंज नहीं, तर्क का निमंत्रण है—धर्म पर हँसी उड़ाकर नहीं, उसे होश दिलाकर ही बचाया जा सकता है।

पाँचवा, नश्वरता का बोध—जीवन कागद की पुड़िया है, बूंद लगे तो गल जाएगी; सेमल का फूल है, रंग झरते देर नहीं लगती। क्या यह वैराग्य है? नहीं—यह वैराग्य का प्रोटेस्ट है। कबीर पलायन के कवि नहीं; वे संसार को जानने के लिए संसार में ही रहना चुनते हैं—करघा चलाते हैं, रोज़ी कमाते हैं, मेहमान को खिलाते हैं—“मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाए।” उनकी ‘मृत्यु-प्रेम’ कविताएँ भोग और संग्रह के नशे को उतारने की औषधि हैं, भागने का बहाना नहीं। नश्वरता याद रहेगी, तो आसक्ति का बुखार अपने-आप उतर जाएगा; और तब प्रेम स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ेगा—लौकिक से लोकातीत की तरफ़।

इतिहास की जमीन पर आ जाएँ तो तस्वीर और साफ दिखती है। कबीर का समय हिंदू-मुस्लिम तनावों से भरा था—सत्ता, संप्रदाय और संस्कार, तीनों की खींचतान। उन्होंने पहचाना कि असली समस्या ‘धर्म’ नहीं, ‘धर्म के नाम पर खड़े किए गए नकली ढाँचे’ हैं। इसलिए वे प्रतीकों पर प्रहार करते हैं—घूँघट, झंडे, वेश, कीर्तन का शोर, अजान की ऊँचाई—सब पर सवाल। उनका लक्ष्य किसी एक पक्ष को हराना नहीं, दोनों के भीतर की मनुष्यता को जगाना है। उन्हें मालूम था—नदी एक ही है; तुम्हारे घाट अलग-अलग हैं। घाट बदलकर नदी नहीं बदलती; मन बदले तो पानी भी पवित्र लगता है।

तो आखिर क्या चीज कबीर को ‘महान’ बनाती है? उनकी विद्वत्ता नहीं—क्योंकि वे पंडित बनने नहीं निकले; उनका साहस—क्योंकि वे भीड़ की तरफ पीठ करके भी सच बोलते हैं। उनकी भाषा—क्योंकि वह लोक की उजली मिट्टी में गूंधी हुई है; उसमें उपदेश नहीं, अनुभव है; उसमें शास्त्र की परत नहीं, शहद की चिपचिपाहट है। उनकी करुणा—क्योंकि वे “सुखिया सब संसार” को देखते हुए भी “जागे और रोवे” रहते हैं—यह रोना कमज़ोरी नहीं, सजगता का प्रमाण है। उनका प्रेम—क्योंकि वह आशिक़ी नहीं, आत्मा की भूख है; वह ऐसे से प्रेम सिखाता है जो बदलता नहीं—नाम, सत्य, भीतर की आहट।

और हाँ, उनका हास्य—कबीर कटाक्ष में खिलखिला उठते हैं। वे जानते हैं कि नकली गंभीरता सबसे खतरनाक मज़ाक है। इसलिए वे छोटी पंक्तियों में बड़े पहाड़ ढहा देते हैं—दो पाटन के बीच साबुत कोई नहीं बचता; तो फिर अहम और पहचान के दानों का क्या भरोसा? वे एक-एक साखी से हमारा दरवाज़ा खटखटाते हैं: “भाई, बाहर बहुत दौड़ लिया; अब ज़रा अंदर भी चलकर देखो।”

कबीर की खूबी यही है कि वे हमें जटिल सवालों के सरल रास्ते दिखाते हैं—पर रास्ता पकड़ना हमें है। वे कहते हैं: शास्त्र पढ़ो, पर पत्थर मत बनो; रस्म निभाओ, पर बुद्धि मत सुलाओ; धर्म मानो, पर मानव मत भूलो; प्रेम करो, पर आसक्ति में बंध मत जाओ; और सबसे बढ़कर—प्रश्न करते रहो, क्योंकि बिना प्रश्न के मिली श्रद्धा, पहले मोड़ पर साथ छोड़ देती है। कबीर की महानता ‘किसके कवि’ होने में नहीं, ‘कैसे मनुष्य’ होने में है। वे हमें यह हुनर दे जाते हैं कि हम भी अपने भीतर के घूँघट का पट खोलें—और जब पट खुलता है, तो पता चलता है: जिस ‘राम’ को ढूँढ रहे थे, वह तो यहीं था—धड़कन की लय में, करघे की तान में, और उस छोटी-सी, पर सच्ची, ढाई आखर की रोशनी में।

परंपराओं से मेरा पुराना बैर है—कबीर के शब्दों में कहें तो “जहाँ-जहाँ देखूँ तहाँ-तहाँ लाल,” पर लाल रंग से आँखें तभी उजली रहती हैं जब हम उसकी चकाचौंध से मोहित नहीं, सजग रहते हैं। कल कबीर का जन्मदिवस था, कबीर-पंथियों की भाषा में “प्राकट्य उत्सव”—सही भी है, कबीर हर बार नए होकर ही प्रकट होते हैं। पर “कबीर का निर्माण” सचमुच कैसे हुआ? एक जुलाहे से वह कबीर कैसे बने जिनके दोहे आज भी धर्म, दर्शन और समाज की गर्दन पकड़कर पूछते हैं—“साहब, सच्चाई कहाँ खो गई?”

भारत का वैदांतिक संस्कार कहता आया है—रूप से बढ़कर भूमिका है। ‘व्यास’ कोई एक व्यक्ति नहीं, एक पीठ है; ‘शंकराचार्य’ केवल एक नाम नहीं, एक परंपरा है। इसी तरह ‘रामानंद’ भी एक वंशवृक्ष की जड़ हैं—रामानुज की विशिष्टाद्वैत धारा से निकला वह वृक्ष, जिसकी मिट्टी दक्षिण की भक्ति से सिंची, और छाया उत्तर में फैल गई। दक्षिण ने भक्ति को स्वर, लय, मूर्ति, कीर्तन दिए; उत्तर ने उसे बाँसुरी, नगरी और नौका। रामानंद उसी संगम के पुरोधा हैं: पांडित्य की दृढ़ता और मनुष्यता की उदारता—दोनों को साथ रखने वाले। उनके यहाँ शास्त्र की रीढ़ स्टील की है, पर हृदय की खिड़कियाँ खुली हैं। यही वह मन, वही मिट्टी है जिसमें कबीर जैसा बीज रोपा जा सके—एक ऐसा बीज, जो पवन से संवाद करे, पर जड़ों से नाता न तोड़े।

कहानी प्रसिद्ध है—सच हो या न हो, वह सत्य की तरह काम करती है। पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर लेटा बालक, और सीने पर पड़ते हुए रामानंद के चरण; मुख से फूट पड़ा “राम”—और वह ‘शब्द’ सीने में उतरकर ‘जीवन’ बन गया। भारतीयता की सुंदरता यही है कि वह अपनी कथाओं में कठोर तर्क की धार नहीं खोजती; वह अनुभव की आँच में पकती है। भृगु का नारायण के वक्ष पर प्रहार, और प्रभु का पैर सहलाना—यह ईशनिंदा नहीं, ईश्वर-विश्वास का उच्चतम शिष्टाचार है: “जो तुमसे प्रेम करता है, उसके क्रोध में भी तुम्हारी चिंता छिपी रहती है।” कबीर ने यही शिष्टाचार विरासत में पाया—गुस्से में कहा, पर प्रेम से कहा; काटा, पर घाव पर हवा भी की।

कबीर का समय धार्मिक-सांस्कृतिक घर्षण का समय था—अंदरूनी संकीर्णताओं से घिरा समाज, बाहर से सत्ता और मत का दबाव। ऐसे में रामानंद ने भक्ति को ‘सबके अधिकार’ की पगडंडी बना दी—वह पगडंडी शांडिल्य-भक्ति-सूत्र से रोशन थी: “ज्ञान सबका नहीं, पर भक्ति से ज्ञान भी जन्म ले और मुक्ति भी।” इसी सूत्र की उजास में कबीर कह पाए—“पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय; ढाई आखर ‘प्रेम’ का, पढ़े सो पंडित होय।” यह विद्रोह नहीं, विद्या की वापसी थी: ज्ञान का सिर, प्रेम के कंधे पर रख देना।

कबीर का ‘निर्माण’ यहीं से शुरू होता है: गुरु-शिष्य का रिश्ता आचार्य-अर्जुन नहीं, सद्गुरु-एकलव्य बनता है। आचार्य व्यवस्था टिकाने को अंगूठे माँगते हैं; सद्गुरु सूर्य की तरह उगते हैं—किसी एक कमल के लिए नहीं, लाखों के खिलने के लिए। रामानंद ने अर्जुन बनाने की जगह एकलव्य उगाए—रैदास, धनन, नानक की दूर तक जाती कड़ी में कबीर सबसे तीखी, सबसे निर्भीक आवाज़ बनकर उभरते हैं। उनका बनारसपन—साफ, अनगढ़, खरा—उनके दोहों में गालिब की “इश्क़ पर ज़ोर नहीं” की गूँज जैसा आता है: प्रेम भी फाँसी की तरह, अपने फंदे से तुम्हें खींच लेता है; यम का नियम और सूफियों का इश्क़—दोनों का फाँस एक ही गर्दन पर कसता है, और वही कसाव कबीर की आवाज़ को ‘धमक’ देता है।

नीरू-नीमा के आँगन में पला यह बालक अपने भीतर एक मनोवैज्ञानिक आकाश ढोता है: जब सिर पर ‘छत’ का पता न हो, तो मन आकाश को पिता मान लेता है। ईसा ने उसे ‘फादर’ कहा, व्यास ने ब्रह्म में विलय किया, कबीर को उसमें ‘राम’ दिखा—देहधारी दशरथ-पुत्र नहीं, घट-घट व्यापी नाम। कबीर का ‘राम’ इस्लामी संस्कार की निर्गुणता और वैष्णव राग का संगम है—माशूक नहीं, ‘पति’; और वे स्वयं—“राम की बहरिया।” सूफी यहाँ आशिक़ हैं, हिंदु यहाँ आत्मा; कबीर दोनों होकर भी किसी एक में कैद नहीं। यही उनकी स्वाधीनता है—गलियों के हाथी का जंगलवृत्ति: पगडंडी मैं चुनूँगा, दीवारें नहीं।

कबीर का बनना उनकी भाषा से भी होता है। ‘शब्द’ उनके लिए ईंट नहीं, बीज है: बोओ तो अर्थ उगेगा, फेंको तो चोट लगेगी। उनकी तुनक उनकी तासीर है—“कांकर पाथर जोड़ि के मस्जिद लई चुनाय”—यह तर्क का विलोम नहीं, समय के शोर के बीच ‘अंदर की आहट’ को सुनने की युक्ति है। कबीर जानते हैं कि अज़ान खुदा के कान के लिए नहीं, बंदे के दिल के लिए है—पर वे यह भी जानते हैं कि रस्में अक्सर अर्थ को निगल जाती हैं। इसलिए वे रस्म तोड़ते हैं, ताकि अर्थ बचा रहे। यही वजह है कि उन्हें न हिंदू गलियों ने पूरी तरह अपनाया, न मुसलमान मजलिसों ने; वे दोनों की चौखट पर खड़े होकर अंदर की हवा को ताज़ा करते रहे।

कबीर का ‘निर्माण’ केवल अस्वीकार से नहीं, स्वीकार से भी होता है। ‘गुरु’ उनके यहाँ परम है—“गुरु गोविंद दोऊ खड़े…”—यह पंक्ति केवल विनम्रता नहीं, पद्धति का घोषणा-पत्र है: ईश्वर को पाने की तरकीब, ईश्वर को परिभाषित करने से पहले ‘मानवीय प्रकाश’ को स्वीकार करना है। यही ‘सत’ आगे चलकर सिख परंपरा में ‘सतनाम’ बनता है। कबीर कोई पंथ नहीं बनाते, पर पंथों को मानवीय बनाते हैं; वे ईश्वर-अल्लाह की बहस से हटकर ‘नाम’ और ‘गुरु’ को साधते हैं—यह तीसरा स्थान है, जहाँ संवाद बनता है, संप्रदाय नहीं।

कबीर की सबसे बड़ी ईमानदारी यह है कि वे महान बनने नहीं निकले; महान हो गए। ज्ञानी दिखने के लिए तर्क नहीं चिपकाए; जहाँ ग़लतियाँ हुईं, वहाँ भी ‘दिल’ सच बोलता रहा। उनका गुस्सा पाखंड पर है, उनका आलिंगन सद्गुरु के चरणों पर। वे बनारस के हैं—मंच पर शिष्ट, घाट पर खरी बात; शब्द में नमक, आशय में करुणा। “भला हुआ मोरी मटकी फूटी”—यह मृत्यु की स्तुति नहीं, कर्म की थकान से मुक्ति की थाह है; शिवलिंग का काला पिंड उनके लिए ब्लैक-होल नहीं, उजाला है—क्योंकि प्रेम अँधेरे को भी आलोकित कर देता है।

और यही है “द मेकिंग ऑफ़ कबीर”: रामानंद की धैर्यवान दीक्षा; शांडिल्य की भक्ति का विज्ञान; बनारस की बोली का खमीर; सूफियाना इश्क़ का नम; और समय का घर्षण—इन सबको एक करघे पर चढ़ाकर एक ऐसी ‘चादर’ बुनना, जो “जीनी-जीनी” होते हुए भी समूचे समाज को ओढ़ा सके। कबीर ने नई ईंटें नहीं गढ़ीं; उन्होंने पुरानी मिट्टी को नया साँचा दिया। नया पुजारी नहीं बनाए; ‘अंदर के आदमी’ को जगाया। उनके दोहे इसलिए अमर हैं कि वे ‘राय’ नहीं, ‘राह’ देते हैं—राह जो गुरु से शुरू होकर प्रेम पर आ टिकती है, और वहीं से मुक्ति की सीढ़ियाँ उतरती-चढ़ती है।आज भी, जब संवाद का मौन बढ़ रहा है, कबीर की जरूरत सबसे ज्यादा है—पर ‘कबीर-पंथ’ नहीं, ‘कबीर-प्रश्न’ की। कबीर का निर्माण हर उस क्षण होता है जब हम आस्था को आडंबर से बचाते हैं, ज्ञान को अहं से, और भक्ति को भीड़ की तालियों से। जब हम “नाम” को नारे में नहीं बदलते; “गुरु” को देहधारी देवता नहीं बनाते; “राम” को देह की वंशावली से निकालकर हृदय की व्यापकता में रख देते हैं। तब हर जुलाहा, हर मल्लाह, हर पाठक—थोड़ा-थोड़ा कबीर बनता है। और यही था रामानंद का स्वप्न: भारत में कबीर दिखाई दे, और कबीर में भारत। यह स्वप्न अधूरा नहीं; बस हर नए श्वास में फिर से ‘प्राकट्य’ चाहता है—कि हम भी एक दिन “ढाई आखर” पढ़ लें, और सचमुच ‘पंडित’ हो जाएँ।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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