कचरा, कचरा ही रहेगा —
चाहे आसमान में उड़ जाए,
या चाँदी जड़ी थाली में परोस दिया जाए।
वह अवसरवादी पंखों से उड़ेगा,
पर पहली वर्षा में मिट्टी से चिपक
घिसटता जाएगा।
चाहे स्वर्ण-आभूषण पहन ले,
या इत्र-सिंचित हो जाये—
परंतु दुर्गन्ध की नैसर्गिक गन्ध ,
हर हाल में फैलाए ।
सड़क पर बिखरे कणों में नहीं,
अब वह कार्यालयों में भी पसरा है—
नीति की फ़ाइलों में घुसा,
नैतिकता के पेट में मसोसा जा रहा है।
कचरा —
बन बैठा है मानवीय संबंधों का नया व्याकरण।
वह चाय के प्यालों में बहस बन कर उफनता है,
और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘ज्ञान’ में
अवधारणाओं को सड़ा देता है।
कभी संगति बनता है वहशियों की,
कभी संसद की दीवारों पर चढ़ जाता है।
कभी दंगे की चिनगारी बन,
धर्म की आड़ में रंग बदल जाता है।
वह हर उस जगह मिलेगा —
जहाँ मौन बिकता है,
विवेक गिरवी रखा जाता है।
जहाँ आत्मा के कोने में
नियम, मूल्य और विवेक का पोस्टमॉर्टम किया जाता है।

कचरा —
जो केवल सड़कों पर नहीं,
संज्ञा और बोध के मध्य भी उगता है।
जो साहित्य में विचार नहीं,
कंटकीर्ण बनकर पंक्तियों में चुभता है।
उसे उड़ाओ,
तो वह झंडे पर चिपक जाएगा।
उससे मित्रता करो,
तो वह आपकी पहचान निगल जाएगा।
कचरा, कचरा ही रहेगा।
स्वर्णमृग की खाल ओढ़ भी ले,
तो अंततः—
जूतों के नीचे ही दबेगा।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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