कदमोपाख्यान : देवसभा में कड़े क़दमों पर कशमकश
एक दिन देवलोक में अचानक हलचल मच गई। देवराज इंद्र इधर-उधर चिंतित-से भारी कदमों से टहल-कदमी कर रहे थे।कर रहे थे। चिंता का कारण था मृत्युलोक में उठाए जा रहे “कड़े कदम”। देवराज इंद्र इन कदमों के सही इस्तेमाल और मृत्युलोक की इस विद्या के गूढ़ रहस्य को जानने के लिए अत्यंत उत्सुक थे।
इसकी तहकीकात के लिए उन्होंने नारद मुनि को बुलाया। नारद मुनि देवलोक में एक प्रकार से विदेश मंत्रालय संभालते हैं। उनके मृत्युलोक के दौरों को इंद्रलोक द्वारा ही प्रायोजित किया जाता है। मृत्युलोक और देवलोक के बीच रणनीतिक लॉबिंग का काम भी वही देखते हैं। इंद्रदेव मृत्युलोक पर कड़ी नजर रखे हुए थे। यह “कड़ी नजर” भी दरअसल मृत्युलोक की ही तकनीक थी—हालात पर नजर रखने के लिए बनाई गई। देवराज ने उस तकनीक पर विधिवत हस्ताक्षर करके उसे देवलोक में भी उत्पादन के लिए स्वीकृति दे दी थी।
अब देवलोक की नजर कदमों के सही इस्तेमाल कि इस नई तकनीक पर थी।
युद्ध, अशांति, लूटपाट, बलात्कार, भगदड़, हताहत, मौतें, अकाल, बाढ़—इन सभी परिस्थितियों में सरकारों द्वारा उठाए जाने वाले “कड़े कदमों” की तकनीक का मृत्युलोक में भरपूर उपयोग किया जा रहा था। देवराज इंद्र की नजर जब इस स्वदेशी तकनीक पर पड़ी तो उन्हें लगा कि यदि यह सचमुच इतनी प्रभावशाली है, तो इसका अधिकार देवलोक को भी होना चाहिए। देवताओं का पुराना सिद्धांत है—जो भी चीज सर्वश्रेष्ठ प्रतीत हो, उस पर अंततः देवताओं का ही अधिकार होना चाहिए।
नारद मुनि आज इसी “कदम तकनीक” पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट लेकर इंद्रसभा में उपस्थित थे।
जैसे ही उन्होंने देवर्षि नारद को आते देखा, उनके चेहरे की चिंता मानो क्षण भर में उड़नछू हो गई।
“नारायण नारायण!”
“आइए देवर्षि!” इंद्रदेव बोले,
“मैं तो बस आपका ही इंतज़ार कर रहा था। आशा है आप मृत्युलोक से कुछ सुखद समाचार लेकर आए होंगे।”
फिर थोड़े गंभीर स्वर में बोले—
“अब तक तो मुझे मृत्युलोक की कड़ी नजर और जुगाड़ तकनीक के बारे में ही पता था, पर यह कदमों की तकनीक तो उससे भी अधिक उन्नत प्रतीत होती है।”
इंद्र चौंककर बोले—
“कड़े कदम? यह क्या कोई नया अस्त्र है? क्या यह मेरे वज्र से भी अधिक शक्तिशाली है?”
नारद मुस्कुराए।
“देवराज, यह अग्निशामक यंत्र से भी अधिक प्रभावशाली है। नेता और अधिकारी आजकल उसी के भरोसे जनता में भड़की किसी भी तरह कि आग को बुझाने के लिए काम लेते है । उनसे यही अपेक्षा की जाती है कि वे अपने क़दमों में से कम से कम एक कदम तो हमेशा तैयार ही रखें ,हर दम तैनात जनता कि खपड़ी पर ताकि जब भी चाहें अपने कदम को उठा लें—और जब भी उठाएं कड़ाई से उठाये । ढीले-ढाले कदमों से जनता संतुष्ट नहीं होती।”
नारद आगे बोले—
“दरअसल इस तकनीक का आविष्कार बहुत पहले क्रिकेट में हो चुका था। जब बल्लेबाज़ कदमों का सही इस्तेमाल करते हुए बल्ला चलाता था, तो हिट-विकेट होने के खतरे कम हो जाते थे और मैदान में चौके-छक्के लगाना भी आसान हो जाता था। बस उसी से प्रेरणा लेकर राजनेताओं ने कदमों के इस्तेमाल को राजनीति के मैदान में उतार दिया।”
“सही कदम का सही समय पर इस्तेमाल कर लेने से टिकट, मंत्रिपद, विपक्ष को पछाड़ना, जनता को संतुष्ट रखना—सारी कमान अपने हाथ में रहती है। महत्वाकांक्षा का रथ भी फिर सरपट दौड़ता है।”
नारद ने अपनी वीणा के तार हल्के से छेड़े और आगे बोले—
“मृत्युलोक में कहीं पुल गिर जाए, सड़क हादसे में लोग मर जाएँ, रैली में भगदड़ मच जाए, अकाल पड़ जाए, भूख से लोग मरने लगें, दंगे हो जाएँ—हर परिस्थिति में जनता की सरकार से बस एक ही अपेक्षा रहती है कि वह कदम-कदम पर कड़े कदम उठाने का वादा करती रहे।”
“कब कदम आगे रखना है, कब कदमताल करनी है, कब कदम पीछे खींच लेने हैं, कब किसी और के कदम उखाड़ने हैं, कब अपने कदम कमल बनेंगे—इन सबका समय और जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करने की कला मृत्युलोक ने सीख ली है।”
नारद ने निष्कर्ष स्वर में कहा—
“देवराज, मृत्युलोक को अब ‘कदमशास्त्र’ का शास्त्रसम्मत उपयोग आ गया है। वहाँ के नेता जानते हैं कि सही समय पर सही कदम उठाने से जनता आश्वस्त हो जाती है—चाहे समस्या वहीं की वहीं क्यों न खड़ी रहे।”
इंद्रदेव गंभीर हो गए।
देवलोक की सभा में एक पल के लिए मौन छा गया।
फिर इंद्र ने धीरे से कहा—
“देवर्षि… यदि यह तकनीक सचमुच इतनी कारगर है, तो इसे देवलोक में भी लागू करना चाहिए। नारद जी, आप कोई जुगाड़ लगाइए ताकि यह तकनीक हमें भी मिल सके। आप तो जानते ही हैं—देवलोक में भी अमृत आवंटन को लेकर देवगणों में असंतोष है। हमारे पुष्प वितरण मंत्रालय पर पुष्प-खरीद में लाखों के घोटाले का आरोप लगा है। स्वर्ग में मृत्युलोक से आए कुछ वी-आई-पी पास धारकों के आवंटन का मामला भी गर्म है। चुनाव भी नज़दीक हैं। देवगणों के बीच किस मुँह से जाएँ? सोचा है कि इस तकनीक का इस्तेमाल करके उन्हें थोड़ा-बहुत भ्रमित ही कर दिया जाए।”
नारद ने मुस्कुराकर कहा—
“देवराज, एक छोटी-सी समस्या है। अगर यह तकनीक यहाँ आ गई, तो देवलोक को मृत्युलोक बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। कहीं ऐसा न हो कि मृत्युलोक के ये कड़े कदम आकर देवलोक के कदम ही उखाड़ दें।”यह सुनते ही इंद्रदेव के कदम एक क्षण के लिए लड़खड़ा गए। बड़ी मुश्किल से स्वयं को संभालते हुए वे सिंहासन पर आकर बैठ गए और इस नई समस्या के समाधान के लिए कुछ सही कदमों के इस्तेमाल का जुगाड़ बिठाने में पुनः विचारमग्न हो गए।
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