सोचिए, वह पहली रात जब मनुष्य ने सिर्फ़ आग नहीं जलाई थी, बल्कि एक-दूसरे की आँखों में देखकर बोलना शुरू किया था। जंगल की नमी भरी हवा, दूर से आती अनजान आवाज़ें और बीच में सुलगती आग—उसी आग के चारों ओर बैठे वे लोग अभी समाज नहीं थे, बस एक-दूसरे के सहारे जीवित रहने की कोशिश करते प्राणी थे। तभी किसी ने हाथों के इशारे और अधूरी भाषा में कुछ कहना शुरू किया। उसने बताया कि उस पहाड़ी के पीछे क्या हुआ था, किस झाड़ी में खतरा छिपा है और क्यों रात में अकेले नहीं निकलना चाहिए। वह विवरण नहीं था, वह कहानी थी। और उसी क्षण मनुष्य ने पहली बार यह समझा कि अनुभव अगर कहानी बन जाए, तो वह केवल आज का नहीं रहता, वह कल तक पहुँच जाता है। यहीं से मानव सभ्यता की असली यात्रा शुरू होती है, क्योंकि सभ्यता औज़ारों से नहीं, स्मृति से बनती है और स्मृति को जीवित रखने का सबसे भरोसेमंद तरीका कहानी ही है।

कहानी ने मनुष्य को समय से लड़ने की ताक़त दी। जो देखा, जो झेला, जो सीखा—सब कुछ कहानी के रूप में अगली पीढ़ी तक पहुँचता गया। उस समय न कोई पुस्तक थी, न कोई विद्यालय, लेकिन जीवन का पाठ्यक्रम पूरी स्पष्टता के साथ मौजूद था। माँ बच्चे को सुलाते हुए जो कथा सुनाती थी, वह केवल कल्पना नहीं होती थी; उसमें मौसम का ज्ञान होता था, संबंधों की समझ होती थी और यह चेतावनी भी कि कौन-सा रास्ता जीवन की ओर जाता है और कौन विनाश की तरफ़। इस तरह कहानी धीरे-धीरे केवल मनोरंजन नहीं रही, वह समाज की सामूहिक स्मृति बन गई।
जैसे-जैसे मनुष्य समूहों में रहने लगा, कहानियों का स्वर भी बदलने लगा। अब सवाल केवल जीवित रहने का नहीं था, साथ रहने का था। कौन-सा व्यवहार स्वीकार्य है, कौन-सा नहीं—यह तय करने के लिए नियमों से पहले कहानियाँ आईं। किसी न्यायप्रिय राजा की कथा, किसी अहंकारी शासक के पतन की कहानी, किसी साधारण व्यक्ति के सही निर्णय की गाथा—इन सबने मिलकर समाज को यह सिखाया कि शक्ति से बड़ा कुछ और भी है। कानून लिखे जाने से बहुत पहले कहानी ने मनुष्य के भीतर नैतिकता का बीज बो दिया था, क्योंकि मनुष्य तर्क से पहले भावना से सीखता है और कहानी सीधे उसी भावना से बात करती है।

सभ्यता आगे बढ़ी तो कहानियाँ भी परतदार होती चली गईं। अब वे सिर्फ़ उत्तर नहीं देती थीं, प्रश्न भी उठाने लगी थीं। सही क्या है, सत्य किसे कहें, कर्तव्य और इच्छा के बीच चुनाव कैसे हो—इन सब दुविधाओं को कहानी ने सुरक्षित रखा। मनुष्य जब खुद को समझ नहीं पाता था, तब वह कथा में अपना प्रतिबिंब देखने लगता था। राजा उसमें अपना भय पहचानता था, योद्धा अपनी थकान और साधारण मनुष्य अपनी असहायता। इस तरह कहानी समाज का दर्पण बन गई, जिसमें हर वर्ग अपना चेहरा देख सकता था।
फिर लेखन आया, लिपि बनी, ग्रंथ रचे गए, लेकिन कहानी का स्वभाव नहीं बदला। वह अब भी बहती रही—कभी महाकाव्य के रूप में, कभी लोकगीत में, कभी दादी-नानी की आवाज़ में। हर पीढ़ी ने कहानी को अपने समय के अनुसार ढाला, पर उसकी आत्मा को बचाए रखा। यही निरंतरता संस्कृति कहलाती है। संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं, बल्कि कहानी का जीवित प्रवाह है, जो समय के साथ बदलता है लेकिन टूटता नहीं।
जैसे ही सत्ता को यह समझ में आया कि कहानी सबसे प्रभावी माध्यम है, उसने उसे अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की। राजाओं ने अपनी विजयगाथाएँ लिखवाईं, साम्राज्यों ने अपने मिथक रचे, धर्मों ने अपने आख्यान गढ़े। कहानी अब केवल समाज को जोड़ने का साधन नहीं रही, वह शासन का औज़ार भी बन गई। लेकिन कहानी की एक खासियत है—वह कभी पूरी तरह किसी एक की नहीं होती। जहाँ सत्ता की कहानी होती है, वहीं उसके समानांतर प्रतिरोध की कहानी भी जन्म लेती है। कवि, कथाकार और व्यंग्यकार उसी कथा में दरार डालते हैं, उसी कथानक को पलट देते हैं। इसीलिए सभ्यता कभी ठहरती नहीं, वह निरंतर गतिशील रहती है।

आज हम स्वयं को आधुनिक कहते हैं, वैज्ञानिक कहते हैं, डेटा और तर्क की दुनिया में जीने का दावा करते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि आज भी जो बात हमें भीतर तक हिलाती है, वह आँकड़ों की तालिका बनकर नहीं आती, वह कहानी बनकर आती है। किसी एक बच्चे की कहानी पूरे समाज को झकझोर देती है, किसी एक जीवन की गाथा पूरे आंदोलन का आधार बन जाती है। राजनीति से लेकर विज्ञापन तक, शिक्षा से लेकर तकनीक तक—हर जगह कहानी ही काम कर रही है। फर्क बस इतना है कि अब आग की जगह स्क्रीन है और कबीले की जगह नेटवर्क।
और शायद भविष्य में भी यही होगा। मशीनें गणना करेंगी, निर्णय लेंगी, लेकिन वे भी वही सीख रही हैं जो मनुष्य ने सबसे पहले सीखा था—कहानी। क्योंकि सभ्यता का सबसे गहरा कोड तर्क में नहीं, कथानक में छिपा है। इसलिए जब यह प्रश्न उठता है कि मानव सभ्यता संस्कृति इस मुकाम तक कैसे पहुँची, तो उत्तर किसी एक आविष्कार में नहीं मिलता। वह उत्तर उस क्षण में छिपा है जब अँधेरे में बैठे एक मनुष्य ने दूसरे से कहा था—सुनो, एक कहानी है। उसी कहानी के साथ मनुष्य ने डर से अर्थ तक, अकेलेपन से समाज तक और अस्तित्व से संस्कृति तक की यात्रा पूरी की, और शायद आगे भी करता रहेगा।
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