**काहे का महिला दिवस… उसे कहाँ फुरसत है जी!
महिला दिवस वापस आ गया जी… मुझे आज पता लगा! लो यार, फिर चूक गए… अरे, अगर चार-पाँच दिन पहले पता लग जाता तो इस पर कुछ लिख डालते। किसी अख़बार या पत्रिका को भेज देते, तो शायद छप भी जाता। शायद इस बार संपादक द्वारा ‘खेद है’ की पुनरावृत्ति न होती!
अब करें क्या, लेखक हैं तो महिला दिवस बस कुछ लिखकर ही मना सकते हैं… और कर भी क्या सकते हैं? हाँ, अगर मंच मिले, माइक मिले, माला मिले, तो कुछ बोल भी दें… महिला विमर्श पर!
अभी कुछ दिन पहले की घटना है। एक ठरकी महाशय सरकारी संस्था में कार्यरत थे। वे न जाने कितने दिनों से महिला उत्थान के लिए बड़ा काम कर रहे थे! वहाँ उनकी मातहत जितनी भी महिला कर्मचारी थीं, सभी को अपने फ्लैट पर बुलाकर आतिथ्य देना चाहते थे… उनकी कुछ आर्थिक मदद भी करना चाहते थे! वैसे तो शादीशुदा हैं, लेकिन इनकी बीबी इनसे अपना उत्थान नहीं करा पाई, राम जाने! इसलिए ये निकल पड़े, जहाँ भी मौका मिले… अब सड़क पर हर किसी का करेंगे, तो शायद कोई महिला तैयार नहीं हो!
इसलिए इन्होंने अपने पद-प्रतिष्ठा का हवाला देते हुए अपनी संस्था की महिलाओं को यह ऑफर दिया। लेकिन पता नहीं क्यों, महिलाओं को यह रास नहीं आया। एक दिन पकड़कर इनकी ठुकाई कर दी… और वो साहब जबरदस्त!
अब ऐसा महिला दिवस अगर महिलाएँ खुद मना लें, तो फिर हमें क्या ज़रूरत है जी? इसी बीच कुछ पुरुष लोग भी आ गए। बोले, “बहन जी, दो-चार हाथ हम भी मार लें?”
महिलाओं ने विरोध किया, “नहीं! तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं… हम ही मनाएँगे महिला दिवस! तुम बस फोटो बना लो, रील बना लो…”
अच्छा हुआ, यह तो नहीं कहा कि चूड़ियाँ पहन लो!
लेकिन हम पुरुष लोग हैं न, अभी भी महिला शक्ति को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए। हम चाहते हैं कि महिलाओं के प्रति सम्मान केवल महिला दिवस मनाकर ही व्यक्त कर सकते हैं… बाकी सब में टाइम व्यर्थ सा लगता है जी! तो एक दिन के लिए बड़े-बड़े मंच सजा दिए हैं, फूल बरसाए जा रहे हैं, नारों की गूंज में ‘नारी शक्ति’ का जयघोष किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर महिलाओं की उपलब्धियाँ पोस्ट कर दी गई हैं, सम्मान पत्रों की बारिश कर दी गई है… और क्या चाहिए!
इधर पुरुष गला फाड़-फाड़कर चिल्ला रहे हैं, “देखो महिलाओं, हमने तुम्हारे लिए क्या किया!” और तुम हो कि फुर्सत ही नहीं है, एक बार नज़र भर देख भी नहीं रही हो…
बड़े शहरों में तो महिला दिवस की अलग ही छटा है, साहब!
“इसका मैसेज, उसकी कॉल… कहाँ जाऊँ, किसकी कॉल उठाऊँ?” महिला एक और कॉल दस संस्थाओं से! किसको अनुग्रहित करूँ? संस्थाओं को तो सिर्फ साहब की अफसर बीवी ही महिला दिवस के लिए उपयुक्त नज़र आती है!
अलग-अलग संस्थाओं के निमंत्रण, सम्मान समारोह, उपहारों के अंबार में महिलाएँ दबी हुई हैं। दिन ढलते ही सब भूलकर फिर उलझ रही हैं अपनी दिनचर्या में… फेंक दिए सम्मान-पत्र, पुरस्कार और गुलदस्ते बेड पर! निढाल हो गईं, लेकिन अभी तो — खाना बनाना है, बच्चों को देखना है, सास दवाई के लिए चिल्ला रही है, ससुर को चश्मा नहीं मिल रहा! बिस्तर पर स्मृति-चिह्न पड़े हैं उपेक्षित से, लेकिन शुक्र है , अख़बारों में कल छप तो जाएँगे, जनाब देखा नहीं जब महिला के हाथ में थे तभी इनको कैमरे में कैद कर लिया कवर स्टोरी के लिए…..
महिला दिवस गाँव में भी मन रहा है अपने ढंग से!
महिला ने हुक्का भरा, कुट्टी काटी, फसल बोई, फसल काटी… बेटा जो शहर से आया है छुट्टियों में, बोला — “मैया, आज महिला दिवस है, तुम्हारे लिए!”
महिला शर्मा गई, अपने साड़ी के पल्लू को चेहरे पर और खींच लिया। कुछ तो है शायद महिला से जुड़ा हुआ…
“अच्छा बेटा, आज तेरे लिए स्पेशल खीर बनाई है… खाएगा? तेरी पसंद की!”
कोई दिवस है न, तो उसका फर्ज़ बनता है कि आज उसके परिजन इस दिवस को खास महसूस करें।
उत्सव उसके लिए अपने परिवार की खुशियाँ बढ़ाने का मौका है। उनके लिए कोई मंच नहीं, कोई सम्मान नहीं, कोई नारे नहीं। उनके हिस्से में केवल श्रम है, संघर्ष है, और दिन-रात चलने वाला चक्र…
देखो… दफ़्तर में…भी –सभी निजी और सरकारी दफतरों में महिला दिवस की धूम है ..
महिला आज हर क्षेत्र में अपने पाँव पसार रही है… तो भला यहाँ क्यों नहीं माने जाएगा? महिला दिवस का भव्य स्वागत हो रहा है—फूलों के गुलदस्ते, चाय-कॉफी, बॉस का भाषण, ‘हैप्पी वुमेन्स डे’ की गूँज।
घर आ गई है वह… थकी-सी, निढाल… सोच रही थी, काश! आज कम से कम एक दिन की छुट्टी होती, शायद वह ज़्यादा अच्छा होता। लेकिन फिर भी खुश है… आज के दिन बस में किराया नहीं लगा। इसी बीच पति का फरमान गूँजता है—
“यार, हैप्पी वुमेन्स डे! आज तो खुशी का दिन है… खाने में क्या बना रहे हो आज? सुनो, पनीर लाया हूँ, पनीर टिक्का बना लेना आज तो!”
सुबह से ही घर में एक अलग माहौल है। सास-बहू दोनों खुश हैं। पति भी अचानक अच्छे व्यवहार करने लगे हैं। वाह! क्या चमकता हुआ दिन है!
वह सोच रही है… काश! हर दिन ऐसा होता, हर दिन प्यार का महिला दिवस होता!
साहित्यकारों के लिए कच्ची सामग्री है महिला दिवस…
देखो न! एक नई कविता लिखी गई, छंद-अलंकारों से सजी। वाह-वाह मिली, सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। कागज़ों पर महिला सशक्तिकरण की इबारत कितनी ख़ूबसूरती से सजा दी गई है!
देखो इन रील वीरों को… अपनी-अपनी बहन, प्रेमिका, माँ, जो भी महिला मिली, उसके साथ एक सेल्फ़ी खींची, ‘हैप्पी वुमेन्स डे’ का टैग डालकर डाल दिया। ट्रेंड कर रहा है हैप्पी वुमेन्स डे…
न्यूज़ चैनल वाले…
निकल पड़े अपने-अपने माइक लेकर! आज उन महिलाओं को लाइमलाइट में लाएँगे, जो सालभर अंधेरे में रहती हैं… जिन्हें कोई नहीं पूछता। न्यूज़ चैनल वाले दावा कर रहे हैं कि सिर्फ वो ही हैं जो ग्राउंड रिपोर्टिंग देंगे…महिलाओं की असली स्थति दिखायेंगे..वे ही हैं जो हाशिये पर धकेली गयी महिलाओं को पूछ रहे हैं!
देखो, कुछ मज़दूर महिलाएँ ईंट के भट्टे पर दिहाड़ी पर काम कर रही हैं। एक महिला, जिसने अपना दूध पीता बच्चा एक तरफ़ बैठा रखा है,उसे एक एक टूटा-फूटा खिलौना दे रखा है ,बच्चा अभ्यस्त है और आश्वस्त भी की माँ आ जाएगी अभी थोड़ी देर में ,उसे दूध पिलाने । पत्रकार पास जाकर पूछता है—
“तुम्हें पता है, आज कौन-सा दिन है?”
वह हँसी, पर कुछ नहीं बोली।
“आज महिला दिवस है!”
हाँ, उसे मालूम है कि वह महिला है… रोज़ उसे यह एहसास कराया जाता है! क्योंकि उसका पति भी यहाँ दिहाड़ी पर लगा हुआ है,दोनों के काम के घंटा सेम हैं , लेकिन मजदूरी उसे कम मिलती है… क्योंकि वह महिला है। बच्चा भी उसे ही संभालना पड़ता है। फिर यहाँ से घर जाकर खाना भी बनाएगी… बीच में बच्चे को दूध भी पिलाना है… बीड़ी-चाय भी पुरुष मज़दूरों को ही मिलेगी।
पत्रकार को अचानक एक आइडिया आया। उसने कहा—
“ऐसा करो, ये बच्चा अपनी पीठ पर झोली में रखो… और यह गट्ठर सिर पर… मैं तुम्हारी फोटो खींचूँगा… कैमरे की तरफ़ मत देखना, बस चलते रहना।”
बहुत शानदार फोटो आया है! महिला दिवस की कवर स्टोरी पर यह तस्वीर लेख में जान डाल देगी! पत्रकार मन ही मन मुस्करा रहा है… आश्वस्त है कि उसके प्रोबेशन पीरियड की नौकरी अब पक्की हो जाएगी… इस ‘आंदोलनकारी’ तस्वीर के साथ धाँसू कवर स्टोरी तैयार है!
फोटो खींच ही रहे थे कि उधर ठेकेदार आ धमका—
“अरे! चलो काम पर… भागो यहाँ से! क्यों आए हो यहाँ? कोई बाल मजदूरी करा रहे हैं क्या हम… जो हमारे ख़िलाफ़ उल्टी-सीधी ख़बरें छापोगे?”
आज महिला दिवस है?
अरे, काहे का महिला दिवस…
भागो यहाँ से!
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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