कवी भूषन – “कविता में रणभेरी

कवी भूषन – “कविता में रणभेरी “

कवि भूषण—वीररस के ओजस्वी शिल्पी, भाषा के बाजीगर और अलंकार-विधान के विलक्षण साधक—का नाम लेते ही आँखों के सामने युद्ध-डमरू की ध्वनि, नगाड़ों की गड़गड़ाहट, तोपों का गर्जन और अश्वारोही सेनाओं का प्रवाह जाग उठता है। यही तो वह काव्य-संसार है जहाँ

“साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि।

सरजा सिवाजी जंग जीवन चलत है।।

भूषन भनत नाद बिहद नगारन के।

नदी नद मद गैबरन के रलत हैं।।

ऐल फैल खैल भैल खलक में गैल गैल,

गाजन की ठेल-पेल सैल उसलत हैं।

तारा सों तरनि घूरि धरा में लगत जिम,

धारा पर पारा पारावार ज्यों हलत हैं।”

—जैसी कुछ पंक्तियाँ ही पूरे युद्ध-दृश्य का सिनेमाई पैनोरमा खींच देती हैं। इतने कम शब्दों में युद्ध का विस्तार, सेना का उत्साह, वातावरण का स्पंदन—यह सघनता, यह वेग, यह ध्वनि-चित्रण—भूषण की ही विशिष्टता है।

यमुना के तट पर त्रिविक्रमपुर नामक गाँव में जन्मे भूषण तीन भाइयों में से एक थे; बड़े भाई चिंतामणि भी कवि थे और दिल्ली दरबार (औरंगज़ेब के समय) में आते-जाते थे। घर-परिवेश की एक मार्मिक कथा लोकप्रसिद्ध है—भूषण अपेक्षाकृत निष्कंटक, स्वच्छंद स्वभाव के थे; इससे भाभी क्षुब्ध रहतीं। एक दिन भोजन परोसकर भाभी ने टोका—कहिए, अपनी कमाई से कभी घर के लिए नमक भरवा पाएँगे? स्वाभिमानी कवि के कलेजे में यह वाक्य तीर की तरह उतर गया। भूषण ने संकल्प लिया—“जिस दिन अपनी कमाई से नमक भरवा दूँगा, उसी दिन इस घर में भोजन करूँगा।” यही व्यंग्य-प्रहार उनका जीवन-परिवर्तन बना: वे निकले—पहले दिल्ली, बड़े भाई के सहारे औरंगज़ेब के दरबार तक। ओजस्वी वाणी सुनी गई, पर भूषण का स्वभाव ‘सत्’ के पक्ष में था—राज-सत्यों की परख और असत् पर चोट। प्रसिद्ध आख्यायिका के अनुसार, जब शहंशाह ने कवियों से अपनी खूबियाँ नहीं, खामियाँ सुनाने को कहा, तब भूषण ने निर्भीक होकर वही कहा जो इतिहास के अँधेरे पन्नों पर लिखा था—“किबले की ठोर बाप बादशाह सांहजहा, ताको कैद कियो मानो मक्के आग लायी हे,

बडो भाई दारा को पकरीके मारी दारियो, मेह रहू नाही माको बडो सगा भाई हे !!

बंधू तो मुरादबक्ष बादी चुक करिबे को, बिच ले कुरान खुदा की कसम खाई हे,

भूषण सुकवी कहे सुनो नवरंग जेब , ये तो काम किन्ने तेयु पादशाही पाई हे !!

दरबार में यह निर्भीक सत्य सुनना आसान न था; कथा कहती है, क्रोध भड़का, पर उससे पहले भूषण तीर की तरह निकल लिए। यद्यपि इतिहास-शोध में एक धारा यह भी कहती है कि वे औरंगज़ेब के दरबार पहुँचे ही नहीं; भाभी के ताने के बाद वे पहले चित्रकूट नरेश के पास गए, वहाँ से विभिन्न राजसभाओं में प्रतिष्ठित हुए—पर भूषण के हृदय-सिंहासन पर वास्तव में आरूढ़ हुए छत्रपति शिवाजी।

शिवाजी से प्रथम भेंट की कथा भी उतनी ही कवित्व-पूर्ण है। भूषण महीनों पहाड़ों में भटकते रहे—“जब तक दर्शन न कर लूँ, लौटूँगा नहीं।” संध्या-पर्व में एक छोटे-से गाँव में ठहराव—तभी सादा-सा एक मराठा सरदारसा व्यक्ति निकट आया। भूषण ने कहा—“मैं वीर-रस का कवि हूँ; तलवार नहीं, कविता से सेना में ज्वाला भर दूँगा, एक-एक सैनिक को दस का पराक्रम दे दूँगा।” आग्रह हुआ—“कुछ सुनाओ।” भूषण की जिह्वा पर वज्र-लय दौड़ पड़ी—

“इंद्र जिम जंभ पर बाड़व ज्यौं अंभ पर रावन सदंभ पर रघुकुलराज है।

पौन बारिबाह पर संभु रतिनाह पर ज्यौं सहस्रबाहु पर राम द्विजराज है।

दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुँड पर भूषन बितुंड पर जैसे मृगराज है।

तेज तम-अंस पर कान्ह जिम कंस पर यौं मलेच्छ-बंस पर सेर सिवराज है॥

और फिर अर्थ-संकेत: जैसे इंद्र असुरों पर, दावानल जंगल पर, राम रावण पर, पवन बादलों पर, शिव कामदेव पर, परशुराम सहस्त्रबाहु पर, चीता झुंड पर, सिंह हाथी पर, प्रकाश अँधेरे पर, कृष्ण कंस पर—उसी प्रकार म्लेच्छ-व्यूह पर शिवराज (शिवाजी) का पलड़ा निर्णायक है। श्रोता ने वाह-वाह की और परिचय कल सिंहगढ़ में देने को कहा। अगली सुबह भूषण ने पहचाना—वही तो छत्रपति स्वयं थे! शिवाजी ने स्वर्ण, हाथी-घोड़े, गाँवों का दान देकर कवि का अभिनंदन किया। भूषण ने सबसे पहले गाड़ी-भर नमक भिजवाया—भाभी के घर। यह केवल प्रतिशोध नहीं, आत्मसम्मान की काव्यात्मक परिणति थी—जैसे कविता जीवन में उतरकर व्यवहार बन जाए।

भूषण ने शिवाजी पर अद्भुत कृतियाँ रचीं—जिनमें कवित्त और सवैया छंदों की धड़कन सबसे अधिक सुनाई देती है। उनकी पंक्तियाँ ध्वन्यात्मकता से भरपूर हैं—नगाड़ों का “नाद”, टापों का “धम”, टकराहट का “धड़”—ये मात्र शब्द नहीं, ध्वनि-अलंकृति के प्राण हैं। “वीर रंगंम तुरंग चढ़ी सरजा”—में ‘र’, ‘ट’, ‘ज’, ‘ग’ की ठक–ठक–ठक अनुप्रास है; “नाद बेहद नगार के”—में ‘न’–‘न’–‘न’ की गूंज है; “धावा, धम, दंड”—आघात–अनुकरण (Onomatopoeia) का खिलंदड़ा कौशल है। भूषण का वीर-रस केवल भाव नहीं—संगीतात्मक लय है, जो सैनिक के रक्त में ढोल की थाप की तरह भरती है।

भूषण ने शिवाजी पर अद्भुत कृतियाँ रचीं—जिनमें कवित्त और सवैया छंदों की धड़कन सबसे अधिक सुनाई देती है। उनकी पंक्तियाँ ध्वन्यात्मकता से भरपूर हैं—नगाड़ों का “नाद”, टापों का “धम”, टकराहट का “धड़”—ये मात्र शब्द नहीं, ध्वनि-अलंकृति के प्राण हैं। “वीर रंगंम तुरंग चढ़ी सरजा”—में ‘र’, ‘ट’, ‘ज’, ‘ग’ की ठक–ठक–ठक अनुप्रास है; “नाद बेहद नगार के”—में ‘न’–‘न’–‘न’ की गूंज है; “धावा, धम, दंड”—आघात–अनुकरण (Onomatopoeia) का खिलंदड़ा कौशल है। भूषण का वीर-रस केवल भाव नहीं—संगीतात्मक लय है, जो सैनिक के रक्त में ढोल की थाप की तरह भरती है।

अलंकार-बानगी उनके काव्य-स्वभाव का हृदय है।

(1) अनुप्रास: एक ही ध्वनि/वर्ण का लयात्मक पुनरावर्तन। “धावा धम दंड पर, चीता मृग झुंड पर”—ध/द/ज/झ की टकराहट से ध्वनि-चित्र उभरता है।

(2) उपमा: शक्ति-संतुलन समझाने को सटीक तुलनाएँ—अँधेरे पर प्रकाश, झुंड पर चीता, हाथी पर सिंह; ये उपमाएँ युद्ध-फल को बिना दलील सिद्ध करती हैं।

(3) रूपक: शिवाजी को धर्म-शौर्य की मूर्त छवि बनाना—जहाँ “शिवराज” केवल व्यक्ति नहीं, नीति का प्रतिरूप हो जाता है।

(4) अतिशयोक्ति: वीर-रस में अनिवार्य; पर भूषण की अतिशयोक्ति दृश्य-सत्य रचती है—इतनी प्राणवान कि पाठक उसे शाब्दिक नहीं, अनुभवात्मक सत्य मान लेता है।

(5) यमक/श्लेष: “बंड”—विद्रोही/व्यूह, “ले-वंश”—लय/वंश—जैसी ध्वनि-क्रीड़ाएँ अर्थों की बहुरंगी परतें खोलती हैं।

(6) ध्वन्यात्मक अनुकरण: “नाद, नगाड़ा, धम”—आघात-ध्वनि से काव्य में ऑडियोस्केप बनता है; यह मंचोपयोगी काव्य की पहचान है।

(7) क्रियाशील बिंब: भूषण स्थिर चित्र नहीं बनाते; उनके बिंब गतिशील हैं—अश्व के टाप, धूल का गुबार, पताकाओं का फहराना—सब आँखों के सामने चलता-सा है।

भूषण का दूसरा प्रेम छत्रसाल बुंदेला थे। महोबे के इस वीर के लिए भूषण ने जो कवित्त कहे, उनमें शौर्य की वह दीप्ति है जो पराक्रम को जन-आस्था बना देती है“राजत अखंड तेज छत, सुजस बड़ो गाजत गाना गजनाल को; जाहि के प्रताप स मलिन आपता, होत ताप तज दुर्जन करत बहु ख्याल को; साज सज गज तुरी, कोतल कतार दीने; भूषण भन, ऐसो दीने प्रतिपाल को; और राजा राव मन एक कहन लाऊ—अब शिवा को सराहौ, सराहौ छत्रसाल को।” यहाँ अनुप्रास का लड़ीदार वैभव देखिए—“गाजत–गनि–गजनसाल”, “ताप–तज”—ध्वनियाँ अर्थ को ठेलती चलती हैं; “साज–सज–गज–तुरी”—शस्त्र–अश्व–दल–व्यूह का दृश्य-कोलाज खड़ा हो जाता है। “अब शिवा को सराहौ, सराहौ छत्रसाल को”—यह तुलनात्मक वक्रोक्ति भी है: शिवाजी की महिमा अपराजेय है, पर उस दीप्ति में छत्रसाल का तेज भी नप्प-तौला नहीं; यह वीर-परंपरा का उत्तराधिकार है।

भूषण की जीवन-कथा का शेष भाग भी उनके स्वभाव जैसा ही तेजस्वी है—सम्मान/दान/अन्न-घोड़े/ग्रामों की वर्षा हुई, पर वे दरबारी चाटुकारता के कवि नहीं बने; वे कर्तव्य और स्वाभिमान के कवि रहे। उनकी भाषा ब्रह्मांड-विस्फोट की तरह फैलती है—ब्रह्मांड इसलिए कि उनमें धर्म, नीति, पराक्रम, देशज चेतना, सब एक साथ बोलते हैं; विस्फोट इसलिए कि उनके शब्द शस्त्र-प्रहार-से लगते हैं, पर भीतर नैतिक करुणा की धार भी बहती है—वे वीरता को उन्माद नहीं बनने देते; उसे धर्म-संयम में बाँधते हैं।

भूषण की छंद-साधना मंचीय-प्रभाव के अनुकूल है—कवित्त और सवैया का सम-सम संतुलन, दीर्घ–ह्रस्व का निर्बाध प्रवाह, तुक–लय–गति की नाल। इसीलिए उनका काव्य पढ़ने से अधिक सुनने की माँग करता है; श्रोता के कान के रास्ते रगों तक पहुँचता है। वे वीर-रस के सूत्रधार हैं—ओज (ऊर्जा), प्रसाद (सरलता), सम तथा माधुर्य का खास मिश्रण रचते हैं। “नदी-नद मद गैबरण के रलत हैं”—यहाँ विभाव–अनुभाव–व्याभिचारी का नाटक है: प्रकृति तक सेना के उल्लास में सम्मिलित हो उठती है—यही तो रस-निष्पत्ति है। भूषण की काव्य-नैतिकता भी स्पष्ट है—वे शौर्य को अधर्म का औज़ार नहीं, धर्म का कवच मानते हैं; इसलिए उनके यहाँ पराक्रम का अर्थ केवल पराजय-दर्शन नहीं, उद्देश्य की पवित्रता भी है।

जीवन-परिचय की लोक-परंपरा में नमक-रथ का प्रसंग जितना लोकप्रिय है, उतना ही लोकप्रिय है उनका सहज, बेबाक, निर्वैर स्वभाव—जो सत्य को दरबार में भी कह सकता था और पर्वत-वन में भी। वे लोक–कवि हैं, पर राज–कवि भी; वे ध्वनि–कवि हैं, पर अर्थ–कवि भी; वे अलंकार–अर्चक हैं, पर रस–साधक भी। यही समग्रता उन्हें कालजयी बनाती है।

भूषण की कविता का संक्षिप्त सूत्र में कहें तो —शब्दों में शस्त्र, लय में ललकार, अलंकार में आचार। उनकी उपमा तर्क नहीं माँगती, उनकी अतिशयोक्ति झूठ नहीं लगती, उनका अनुप्रास खेल नहीं लगता—ये सब मिलकर उस यथार्थ को गढ़ते हैं जिसे सुनते ही हृदय कह उठता है—“हाँ, ऐसे ही तो उठता है पराक्रम!” इसलिए जब भी वीरता को भाषा चाहिए होती है, भूषण की पंक्तियाँ अपने आप होंठों पर आ जाती हैं—नगाड़ों की नाद-लय के साथ, धूल और ध्वजा के संग, और उस आस्था के साथ कि कविता, यदि सच्ची हो, तो सैनिक की नसों में भी शौर्य का रक्त बनकर दौड़ सकती है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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