क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं — या केवल प्रोग्राम्ड जीवन जी रहे हैं?

क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं — या केवल प्रोग्राम्ड जीवन जी रहे हैं?

मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र समझता है, पर क्या वह सचमुच स्वतंत्र है? हम अपने निर्णयों को “मेरी पसंद”, “मेरा विचार”, “मेरा लक्ष्य” कहकर गर्व अनुभव करते हैं। पर यदि थोड़ी देर रुककर अपने जीवन को देखें, तो एक असहज प्रश्न उठता है—क्या हम सच में चुन रहे हैं, या केवल चुने हुए विकल्पों के भीतर घूम रहे हैं?

हमारा जीवन अक्सर एक मशीन की तरह चलता है। सुबह उठना, फोन देखना, वही प्रतिक्रियाएँ, वही शिकायतें, वही इच्छाएँ, वही भय। हम परिस्थितियों पर उसी प्रकार प्रतिक्रिया देते हैं, जैसे पहले देते आए हैं। किसी की प्रशंसा मिली तो प्रसन्न, आलोचना मिली तो विचलित। सफलता मिली तो अहंकार, असफलता मिली तो अवसाद। मानो कोई अदृश्य प्रोग्राम हमारे भीतर पहले से स्थापित हो—और हम उसी स्क्रिप्ट के अनुसार अभिनय कर रहे हों।

सबसे रोचक और सबसे खतरनाक बात यह है कि हमें लगता है कि हम स्वतंत्र हैं। यही भ्रम हमें गहरी नींद में रखता है। हम सोचते हैं कि यह क्रोध मेरा निर्णय है, यह महत्वाकांक्षा मेरी मौलिक प्रेरणा है, यह जीवन-शैली मेरी पसंद है। पर यदि हम ईमानदारी से देखें, तो पाएँगे कि हमारी अनेक इच्छाएँ उधार की हैं—समाज से, विज्ञापनों से, तुलना से, परिवार की अपेक्षाओं से। हमारी प्रतिक्रियाएँ भी सीखी हुई हैं—बचपन के अनुभवों से, संस्कारों से, भय से।

जरा ठहरकर देखिए—आपकी दिनचर्या कितनी स्वचालित है? आप कब और क्यों क्रोधित होते हैं? आप किस प्रकार के लोगों से आकर्षित होते हैं? किस बात से तुरंत असुरक्षित महसूस करते हैं? इन सबके पीछे कोई गहरी, अनदेखी स्क्रिप्ट काम कर रही होती है। और जब तक हम उसे देख नहीं लेते, तब तक हम मशीन की तरह ही चलते रहते हैं।

पर आशा यहीं से जन्म लेती है। जिस क्षण हम इस यांत्रिकता को देख लेते हैं, उसी क्षण कुछ वास्तविक शुरू होता है। जागरूकता मशीन को तोड़ती नहीं; वह उसे पहचानती है। जब हम अपनी आदतों, अपने भय, अपनी उधार की महत्वाकांक्षाओं को ईमानदारी से देखते हैं, तब पहली बार स्वतंत्रता की संभावना बनती है।

यह “देखना” आसान नहीं है। क्योंकि इसमें हमारे अहंकार को चोट लगती है। हम स्वयं को मौलिक, स्वतंत्र और सचेत समझना पसंद करते हैं। पर जब हम स्वीकार करते हैं कि हमारे अनेक निर्णय केवल प्रतिक्रियाएँ हैं, तब एक विनम्रता जन्म लेती है। और वही विनम्रता परिवर्तन का द्वार है।

वास्तविक स्वतंत्रता चुनाव करने में नहीं, बल्कि यह देखने में है कि हम कैसे चुनते हैं। यदि हमारा चयन भय से संचालित है, तो वह स्वतंत्र नहीं। यदि वह तुलना से जन्मा है, तो वह मौलिक नहीं। यदि वह केवल मान्यता पाने के लिए है, तो वह आत्मिक नहीं।

जब हम अपनी स्क्रिप्ट को पहचान लेते हैं, तब पहली बार हम उसे बदलने की क्षमता पाते हैं। तब हम प्रतिक्रियाओं के स्थान पर उत्तरदायित्व चुन सकते हैं। तब हम उधार की इच्छाओं के स्थान पर अपने भीतर की सच्ची आकांक्षा खोज सकते हैं।

मनुष्य मशीन की तरह जी सकता है—पर वह मशीन बने रहने के लिए बाध्य नहीं है। जिस क्षण वह स्वयं को देख लेता है, उसी क्षण चेतना का जन्म होता है। और उसी ईमानदार देखने में, कुछ वास्तविक, कुछ जीवंत, कुछ स्वतंत्र आरंभ होता है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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