लेखक की साहित्यिक होली
होली का मौसम है। चारों तरफ रंगों की राजनीति, पानी की किल्लत और भावनाओं की अधिकता फैली हुई है। मैंने सोचा इस बार होली थोड़ी विशेष हो जाए। क्यों न इस बार साहित्य की पवित्र गंगा में डुबकी लगा ली जाए। आखिर लेखक का असली रंग तो साहित्य में ही खिलता है।
सबसे पहले मैंने एक संपादक महोदय के दरवाज़े पर दस्तक दी। लेखक के लिए संपादक तो “त्वमेव माता च पिता त्वमेव” ही होते हैं। सोचा रंग के बहाने थोड़ा मक्खन भी लगा देंगे तो छपने में सुविधा हो जाएगी। वे दरवाज़ा खोलते ही बोले—“आइए, आइए! लेकिन होली ‘थीम बेस्ड’ होगी। इस बार हम केवल ‘समकालीन स्त्री-विमर्श में अंतर्निहित रंग-राजनीति’ पर आधारित गुलाल ही स्वीकार कर रहे हैं। बाकी रंग अगले अंक के लिए रोक रखिए।”
मैंने जेब से लाल गुलाल निकाला। बोले—“यह तो कम्युनिस्ट विचारधारा का रंग है।”
हरा निकाला—“यह सांप्रदायिक है।”
नीला निकाला—“यह अंबेडकरवादी है।”
अंततः उन्होंने मेरी पूरी थैली रख ली और बोले—“देखिए, आप छोड़ जाइए सारे रंग। वक्त-ज़रूरत हिसाब से लगा लेंगे।”
मैं बाहर निकला तो लगा जैसे रंग नहीं, पांडुलिपि जमा करके आया हूँ।
फिर मैंने समीक्षक महाशय को फोन लगाया। अपने रंग लगाने की इच्छा का इज़हार किया। वे बोले—“आइए, लेकिन पहले बताइए आपकी होली उत्तर-आधुनिक है या उत्तर-संरचनावादी?”
मैंने कहा—“जी बस सर्वहारा रंग है, साधारण सा गुलाल है।”
वे हँसे—“साधारण? तो फिर उसमें विमर्श की गुंजाइश कहाँ है? प्रतीक कहाँ है? अंतर्ध्वनि कहाँ है?”
उन्होंने मेरे गाल पर रंग लगाने से पहले ही एक लंबा आलेख पढ़ दिया कि मेरा रंग ‘परंपरागत’ है और उसमें ‘नवोन्मेष की कमी’ है। मैं रंगा कम, धुला ज़्यादा महसूस कर रहा था।
आलोचक से मिलने गया तो वे पहले से रंगे हुए थे—अपनी ही प्रशंसा के केसरिया रंग में। बोले—“मैं होली उन्हीं रंगों से खेलता हूँ जिनमें कालजयी होने की संभावना हो।”
मैंने विनम्रता से पूछा—“वह संभावना कैसे तय होती है?”
वे बोले—“जिस रंग को मैं लगाने दूँ।”
मैंने हाथ जोड़े और चुपचाप निकल लिया। कालजयी बनने से पहले कालिख पोत दी जाती, यह खतरा मुझे साफ़ दिख रहा था।
सोचा, चलो किसी मठाधीश के यहाँ चलते हैं। वहाँ रंग कम से कम सामूहिक तो होगा। पहुँचा तो देखा कि दरवाज़े पर पहले से कतार है—नवोदित कवि, स्थापित कवि, स्वयंभू कवि और कवि-पत्नी सब लाइन में।
मठाधीश जी भीतर से आवाज़ दे रहे थे—“पहले मेरे चरणों में गुलाल अर्पित कीजिए, तभी रंग लगेगा।”
मैंने सोचा होली है या दीक्षा? वहाँ रंग से ज़्यादा राग था और रंगरसियों से ज़्यादा दरबारी राग-गायन में मस्त थे।
थक-हारकर एक प्रसिद्ध महिला लेखिका के पास पहुँचा। उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा—“आपकी हिम्मत कैसे हुई अंदर आने की?”
मैंने कहा—“देखिए, आप इंसानी रंगों की पक्षधर हैं। एक इंसान के नाते आया हूँ आपको इंसानी रंग से सराबोर करने।”
वे बोलीं—“यह अस्पष्ट उत्तर है। हम स्पष्टता के पक्षधर हैं।”
मैंने गुलाल आगे बढ़ाया तो बोलीं—“पहले यह स्वीकार कीजिए कि आपकी अब तक की समस्त रचनाएँ पितृसत्तात्मक संरचना की उत्पाद हैं।”
मैंने अपने पुरुषत्व का चरम हनन होने दिया और अपने रंगीन मिजाज हौसले को जेब में कुत्ते की पूँछ की तरह दबाकर वहाँ से निकल आया।
आख़िर में पाठक से मिलने का विचार आया। सोचा लेखक के रंग में तो पाठक ही रंग सकता है । पाठक एक पहुँचे हुए सरकारी अधिकारी थे , जिनके पढ़ने के शौक का लाभ उठाकर मैंने कभी कुछ किताबें उन्हें ऑनलाइन मँगवा दी थीं।
उन्होंने दरवाज़ा खोला और बोले—“अरे, अच्छा किया आप आ गए। मैं भी आपसे ही मिलने आने वाला था।”
उन्होंने अपनी शेल्फ से दो किताबें निकालीं—“ये मैंने लिखी हैं। बस आपकी ही प्रेरणा से लिखने लगा हूँ । अभी हाल ही प्रकाशित हुई हैं। आप ऑनलाइन खरीदेंगे तो महँगी पड़ेंगी, डिलीवरी चार्ज भी लगेगा।”
ख़ैर, उनसे किताबें लीं और भुगतान घर से भिजवाने का वादा किया। गया था रंग लगाने, उनसे चूना लगवाकर वापस लौटा।
दिन ढल चुका था। मैं जेब टटोलता घर लौटा—गुलाल मलने का हौसला ख़त्म हो चुका था, साथ ही आत्मसम्मान भी लगभग ख़त्म सा ।
दरवाज़ा खोला तो श्रीमती जी सामने थीं। उन्होंने पूछा—“कहाँ-कहाँ रंग बिखेर आए साहित्यकार महोदय?”
मैंने थकी आवाज़ में कहा—“रंग लगाने गया था, हर जगह धुलाई करवा कर लौटा हूँ।”
उन्होंने मुस्कुराकर बाल्टी बढ़ाई—“पहले हाथ-मुँह धो लीजिए। रसोई में रंग नहीं चलेगा।”
तभी न जाने कहाँ से जेब के कोने में बचा हुआ थोड़ा सा गुलाल निकल आया। मैंने ढिठाई दिखाते हुए उनके गाल पर हल्का सा गुलाल लगा दिया।
वे बोलीं—“आप भी न, रंगबाज़ कहीं के! और जगह तो अवसर नहीं मिला, यहाँ तो बिना प्रस्तावना और भूमिका के रंग लगा दिया।”
बेरंग चेहरे पर थोड़ी रंगत उतर आई।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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