सब लिखा-लिखाया लेकर ही आए हैं जी—सीधे ललाट पर।
बचपन से यही सुनते चले आए हैं कि बच्चा पैदा होता है, माँ की बगल में निश्चिंत पड़ा रहता है और रात के अँधेरे में भवानी मइया चुपचाप आती हैं, माथे पर किस्मत की इबारत लिख जाती हैं। वही ललाट-लिपि पूरी उम्र चलती रहती है—ऐसी लिपि जिसे न आदमी लिख सकता है, न पढ़ सकता है, न समझ सकता है।
मतलब साफ़ है—जो चल रहा है, जैसा चल रहा है, सब पहले से लिखा हुआ है। ऊपरवाले का संविधान! ग़ज़ब की व्यवस्था है—बिना इंसान की सहमति लिए, बिना अंगूठा लगवाए, सीधा पत्थर की लकीर। न अपील, न पुनर्विचार, न ‘चैलेंज’।
बीच-बीच में कुछ स्वयंभू भविष्यवक्ता आ जाते हैं, जो इस लिखे को पढ़ने का दावा करते हैं। मगर इनकी अपनी ज़िंदगी में जो लिखा गया है, उसने जो उथल-पुथल मचा रखी है—वो अगर ज़रा भी दिख जाए, तो कोई इनसे अपनी किस्मत पढ़वाने की हिम्मत न करे।
अब शिकायत भी किससे करें? भगवान से?
कि प्रभु! कुछ पन्ने खाली भी छोड़ देते। थोड़ा-सा हमें भी भरने को देते। सब कुछ आपने ही लिख दिया, फिर बार-बार ज़िंदगी की परीक्षा क्यों लेते हैं? और जब परीक्षा में बैठते हैं, तो हर बार फेल क्यों?
नकल-वकल की भी गुंजाइश नहीं। ज़रा-सी टीप-टाप पकड़ी जाए, तो परीक्षक ऐसा कहर ढाते हैं मानो अपराध सिद्ध हो गया हो। सवालों पर सवाल, और जवाब लिखो तो ऐसा लगता है जैसे ऊपरवाला मुस्करा रहा हो—इंसान की बेबसी पर।
कहते हैं, भाग्यविधाता के अक्षर पत्थर पर खुदे होते हैं, बदले नहीं जा सकते। अरे बदलने की ज़िद किसे है! कम से कम समझ में तो आए कि लिखा क्या है। ऐसी लिपि तो मोहनजोदड़ो की खुदाई में भी नहीं मिली। पढ़ ही लें, तो शायद थोड़ा सँभल जाएँ।
वैसे पढ़ भी लिया तो क्या—बदल तो नहीं सकते, तो क्यों माथा पीटना?
यह भी समझाया गया है कि “दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है।”
नाम तो पढ़ लिया, पर दानों तक पहुँचना भी तो एक कला है। दाने दिखा दिए गए हैं, थालियों में लिखे भी हैं, मगर इससे भूख नहीं मिटती। ज़्यादातर दाने किसी अमीर की कोठी के गोदाम में कैद हैं।
कहते हैं—हर फूल पर उसके माली का नाम लिखा है।
तो काँटों का क्या? फूलों के दस-दस हकदार और काँटों का कोई नहीं। काँटे क्या सिर्फ राहों में बिछाने के लिए हैं और फूल हाथों में मसलने के लिए?
दुनिया इसी “लिखा-लिखी” के खेल में उलझी हुई है।
मज़दूर मज़दूरी करेगा, नेता घोटाला करेगा, गुंडा गुंडागर्दी करेगा और बहू सास से दहेज उत्पीड़न झेलेगी—क्योंकि सब लिखाकर लाए हैं।
जो इस लिखे को मिटाने की कोशिश करता है, उसे मोहल्ला तुरंत बागी, पागल, सिरफिरा, बदचलन, क्रांतिकारी घोषित कर देता है।
“बाप के काम में हाथ नहीं बँटाता और चला कलेक्टर बनने! अरे, ऐसे ही बन जाते हैं क्या कलेक्टर? वो ही बनते हैं जो लिखाकर लाए हैं।”
“फलाने की लड़की पढ़ने लगी है! ज़्यादा पढ़-लिख गई तो पढ़ा-लिखा दूल्हा चाहिए होगा। गरीब की लड़की तो चूल्हा-चौका लिखाकर लाई है—ये पढ़ाई अमीरों के शौक़ हैं।”
“भगवान को चैलेंज कर रहा है क्या? जो लिखा है, वही भोगेगा।”
गरीब क्यों है?—भाग्य में लिखा है।
अमीर क्यों है?—वो भी लिखाकर लाया है।
कलेक्टर बन गया?—किस्मत में लिखा था।
नहीं बना?—नहीं लिखा था।
“अब क्या करें?”
“कम से कम अगले जन्म का लिखा सुधार लो।”
इसी उम्मीद में बाबा-बैरागियों की दुकानों पर कतारें लगी हैं।
“गुरुजी! मेरा लिखा बहुत गड़बड़ है।”
गुरुजी ताश के पत्ते फेंटते हैं—“बदल सकते हैं, बस दक्षिणा ज़्यादा लगेगी।”
लोग इस जन्म का लिखा झेलते हुए परलोक सुधारने निकल पड़े हैं।
हम जैसे साहित्यकार भी क्या करें? हमारे भाग्य में लिखा है—लिखते रहें। लक्ष्मी जी रूठी हैं और सरस्वती जी हाथ धोकर पीछे पडी हैं ।
श्रीमती जी रोज़ माथा देखकर प्रार्थना करती हैं—
“हे भगवान! इस जन्म में तो लेखक बाँध दिया, अगले सात जन्मों में कुछ और लिख देना—पर लेखक मत लिखना।”
अब आप इस चक्रव्यूह में खुद को कहाँ फिट पाते हैं—यह आपकी ही लिखी पर निर्भर करता है।
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