लोकतंत्र का नया स्तंभ : चालीस प्रतिशत
इस देश में अगर विकास की इमारत को सचमुच मज़बूत बनाना है, तो ज़रूरी है कि उसकी नींव प्रतिशत के गाढ़े सीमेंट से डाली जाए, उसमें लोहे की छड़ें भी प्रतिशत वाली ही हों और ऊपर से प्लास्टर ऐसा हो कि हर कोण से “चालीस प्रतिशत” झलके। लोकतंत्र के चारों स्तंभ तभी स्थिर रह सकते हैं, जब उन पर प्रतिशत का मजबूत लेप चढ़ा दिया जाए। सड़कें बनें, ज़रूर बनें, लेकिन उन सड़कों पर प्रतिशत के टोल नाके न हों—ऐसा विकास भला किस काम का?
अगर किसी विधायक से पूछ लिया जाए कि विकास की पहली ईंट रखने में क्या हम भी सहभागी बन सकते हैं, तो वे बिना पलक झपकाए मुस्कराते हुए कहेंगे—“ज़रूर, बस चालीस प्रतिशत।” अभी तक इस रहस्योद्घाटन के लिए पत्रकारों को स्टिंग ऑपरेशन करना पड़ता था, लेकिन जो खुलासा हुआ है, वह यह नहीं बताता कि यह भ्रष्टाचार है, बल्कि यह साबित करता है कि यह विधायिका द्वारा गढ़ा गया न्यू नॉर्मल है।
नेताओं के सपाट बयानों के आगे अच्छे-अच्छे व्यंग्यकार भी शरमा जाएँ। जो लोग अब तक शपथ-बयानों के लाठी से व्यंग्य को हाँक रहे थे, उन्हें भी स्वीकार करना पड़ेगा कि इतना आत्मविश्वास तो व्यंग्यकारों में भी नहीं होता, जितना इन विधायक महोदयों में है। भ्रष्टाचार अब आत्मनिर्भर हो चुका है। वह अब चोरी-छिपे परदों के पीछे, बंद लिफ्टों में, गूँगा-बहरा बनकर नहीं रहता। वह खुलकर बोलता है, पूरे आत्मविश्वास के साथ। पहले इशारों में प्रार्थना-निवेदन होता था—अब सीधा सवाल बन चुका है: “हमें कितना प्रतिशत मिलेगा?”
योजना की ज़रूरत है या नहीं, स्कूल में दरी चाहिए या बच्चे ज़मीन पर बैठकर भी राष्ट्र निर्माण कर सकते हैं—इन गौण प्रश्नों पर कोई विधायक समय नष्ट नहीं करता। असली प्रश्न वही है, जो हर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आत्मा बन चुका है—प्रतिशत।
पत्रिका के रिपोर्टर ने जब डमी फर्म का चोला पहनकर विधायकों से संपर्क किया, तो किसी ने यह नहीं पूछा कि फर्म असली है या नकली। सबको बस यह जानना था कि प्रतिशत असली है या नहीं। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड का नाम सुनते ही गांधी जी के रामराज्य की याद नहीं आई, बल्कि गांधी छाप की संभावनाएँ जाग उठीं। खादी का चरखा अब चरित्र नहीं कातता, कमीशन कातता है।
विधायक जी ने बिना किसी भूमिका बाँधे साफ़ कर दिया—चालीस प्रतिशत दो, पचास लाख का काम ले जाओ। यह कोई सौदेबाज़ी नहीं, बल्कि सीधा-सपाट राष्ट्रवाद है। लो इन्वेस्टमेंट, हाई रिटर्न की नीति। थोड़ा खिलाओ, ज़्यादा खाओ। लोकतांत्रिक उदारता का परिचय देते हुए किसी ने पचास हज़ार लिए और बदले में अस्सी लाख का लेटर थमा दिया। इसे सेक्युलर कमीशन कहा जा सकता है—थोड़ा नक़द, थोड़ा काग़ज़।
एक विधायक ने तो विधायक पति (VP) के ज़रिये डील फाइनल कर दी। यह वही पारिवारिक मूल्य हैं, जिनकी दुहाई चुनावों में दी जाती है। तीनों मामलों में जिला परिषद के सीईओ के नाम अनुशंसा-पत्र भी जारी हो गए। यानी भ्रष्टाचार भी पूरी फाइलिंग के साथ हुआ—कोई अनौपचारिकता नहीं, कोई अव्यवस्था नहीं। सब कुछ सिस्टम में, नियम से, फॉर्मेट में। इससे बड़ा लोकतांत्रिक प्रमाण और क्या होगा?
राजस्थान में हर विधायक को सालाना पाँच करोड़ मिलते हैं। पाँच करोड़ सुनकर आम आदमी भावुक हो जाता है, लेकिन विधायक नहीं। वे इसे बजट नहीं, संभावनाओं की खान मानते हैं। यहाँ सड़क नहीं बनती, हिस्सेदारी बनती है। यहाँ स्कूलों में दरी नहीं बिछती, कमीशन की परतें बिछती हैं।
सुखद यह है कि शर्म और हया का पर्दा हट चुका है। ठेकेदार और विधायिका के बीच की दूरी कम हो गई है। बिचौलियों की ज़रूरत नहीं रही, इसलिए कमीशन बाँटने का झंझट भी नहीं। न शर्म, न डर, न झिझक। बाकायदा रेट कार्ड जारी हैं। भ्रष्टाचार में ऐसी पारदर्शिता—और कितना विकसित भारत चाहिए आपको?
इस पूरे प्रकरण में किसी ने यह नहीं पूछा कि बच्चों को दरी चाहिए या नहीं। शायद इसलिए कि बच्चे वोट देने लायक नहीं होते। वोट देने लायक होते हैं ठेके, फाइलें और कमीशन। और हम जनता? हम हर पाँच साल में मतदान कर यह साबित करते हैं कि हमें सब पता है—फिर भी हमें सब मंज़ूर है।
सड़कों के गड्ढों में, सरकारी इमारतों के उखड़े प्लास्टर में, हर विकास कार्य में संभावनाएँ ही संभावनाएँ हैं—दुधारू गाय जैसी योजनाएँ, जिन्हें दुहाने का मौका कभी नहीं जाता। लोकतंत्र अब चार स्तंभों पर नहीं टिका, बल्कि चालीस प्रतिशत पर टिका है। और जब तक यह प्रतिशत सुरक्षित है, तब तक देश सुरक्षित है—कम से कम उन लोगों के लिए, जो देश को फ़ाइलों में चलाते हैं।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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