माँ का लाडला
ड्रॉइंगरूम में रात के साढ़े दस बजे बहस का प्राइम टाइम शुरू हो चुका था। बच्चा अभी-अभी सोया था और पति-पत्नी दोनों ऑफिस की थकान को किनारे रखकर अपनी-अपनी कुंठाओं और स्वार्थों की फाइलें खोलकर बैठ गए थे।
पत्नी रसोई से पानी का गिलास लाकर पति के हाथ में थमाती है और खुद निढाल-सी सोफे पर गिर पड़ती है। लगभग हाथ-पाँव पटकते हुए कहती है—
“ये जिंदगी है या 24 घंटे की ड्यूटी? ऑफिस जाओ, घर संभालो, बच्चा संभालो… आखिर इंसान हूँ, मशीन नहीं!”
इतने में बच्चा फिर से रोने लगता है।
पत्नी झल्लाकर बोलती है—
“और बच्चा कौन संभालेगा? तुम? ऑफिस से लौटते ही लैपटॉप खोल लेते हो। मैं भी कमाती हूँ। नैनियाँ मिल नहीं रहीं। जो मिलती हैं, वो दो दिन में छुट्टी पर चली जाती हैं—‘भइया, गाँव जाना है’ कहकर। कामवाली बाई तो ऐसे छुट्टी मारती है जैसे सरकारी कर्मचारी हों!”
थोड़ा रुककर फिर जोड़ा—
“कॉलोनी की एक नर्सरी से बात की थी। उसके तो भाव ऐसे हैं जैसे बच्चा नहीं, शेयर मार्केट में निवेश कर रहे हों। अभी छोटा है, कहाँ डालें? कोई समाधान है?”
पति बात को अनसुना करते हुए अपना सिर और गहराई से लैपटॉप में घुसा लेता है, मानो स्क्रीन ही उसका आश्रय हो।
पत्नी और चिढ़ जाती है—
“देखो, बात सीधी है। जैसा तुमने वादा किया था, माँ को गाँव से बुला लोगे । तुम बात क्यों नहीं करते? माँ से बात करने में तुम्हारे मुँह में दही क्यों जम जाता है?”
पति धीमे स्वर में कहता है—
“तुम जानती हो, कितनी बार फोन किया है मम्मी को। वही राग—‘शहर की हवा-पानी सूट नहीं करती।’ अब तो जिद पकड़ ली है कि कुआँ पूजन भी गाँव में ही होगा।”
पत्नी तकिया ठीक करते हुए प्रत्युत्तर देती है—
“बहाना है ये सब! यहाँ का पानी पीते ही ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है—अरे, ये भी कोई तर्क है? समझती ही नहीं कि हम दोनों नौकरी करते हैं। गाँव में न ढंग से बिजली आती है, न पानी। और पापा को गए दो साल हो गए। उन्हें तो बस उस हवेली से लगाव है।”
पति भुनभुनाता है—
“अब मैं क्या करूँ? कोशिश तो कर रहा हूँ ना!”
फिर धीमे से जोड़ता है—
“लगाव होना स्वाभाविक है। उन दीवारों में पुरानी यादें चिपकी हैं।”
पत्नी आँखें तरेरकर कहती है—
“यादें? वहाँ तो ताले में भी जाले लग गए हैं। हम यहाँ किराये के इस फ्लैट में घुट रहे हैं और वहाँ पक्की हवेली खड़ी है—बस ‘कुल-परंपरा’ का पोस्टर चिपकाकर। समझती ही नहीं माँ!”
पति थोड़ा संभलकर बोलता है—
“तुम क्या समझती हो, मैं सोच नहीं रहा? सिर्फ बच्चे के लिए थोड़े ही माँ को बुला रहा हूँ। एक बार माँ आ जाएँ, तो हवेली बेचने की बात भी धीरे-धीरे समझा देंगे। उस पैसे से पॉश कॉलोनी में नया लक्ज़री फ्लैट लेंगे। क्लब हाउस, जिम, स्विमिंग पूल… बच्चा इंटरनेशनल स्कूल जाएगा। लाइफ सेट!”
पत्नी व्यंग्य से मुस्कुराती है—
“कह तो ऐसे रहे हो जैसे श्रवण कुमार की सेवा से प्रसन्न माँ तुरंत ‘हाँ’ कर देंगी और साथ में हवेली की चाबी भी ले आएँगी।”
पति नरमी से कहता है—
“धैर्य रखो। माँ आ जाएँ तो बच्चा भी संभल जाएगा और आगे की बात भी हो जाएगी। आखिर वो भी चाहती हैं कि हम आगे बढ़ें।”
फिर धीरे से जोड़ता है—
“तब तक तुम अपनी मम्मी से कह दो, कुछ दिन आ जाएँ। मुंबई उन्होंने देखी भी नहीं है।”
पत्नी तुरंत भड़क उठती है—
“बस! मेरी माँ को मत घसीटो। तुम्हें पता है हमारे यहाँ बेटी के घर रहना तो दूर, वहाँ का पानी भी नहीं पीते। और तुम कह रहे हो बुला लो!”
कमरे में कुछ पल सन्नाटा छा जाता है। बच्चे की हल्की-सी आवाज फिर गूँजती है। पत्नी उठने लगती है, तभी पति रोक लेता है—
“रुको, तुम रहने दो। मैं संभाल लूँगा। आखिर ‘पापा’ का फर्ज भी तो है।”
उस रात बहस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँची। हवेली अब भी गाँव में खड़ी थी, पॉश कॉलोनी का सपना भी जिंदा था। । एक ओर जिद्दी माँ थी, जो यादों को छोड़ना नहीं चाहती थी; दूसरी ओर आधुनिक दंपती, जो भविष्य को सुविधाओं में तौल रहा था।
हवेली वहीं खड़ी थी—दो पीढ़ियों की जिद का शांत स्मारक।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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