महँगी फ्लाइट, मनमाना किराया और एयरपोर्ट पर बस अड्डे जैसे हालात

हवाई जहाज़ के टिकट बुक करते समय हम लोग बड़े भोले होते हैं। वेबसाइट पर लिखा होता है – “ऑन टाइम इज़ अ वन्डरफुल थिंग” और हम मान लेते हैं कि यह कोई वादा नहीं, वेद मंत्र है। क्रेडिट कार्ड से पैसा कटते ही हमें लगता है कि हमने अपने भाग्य पर भी एक “कन्फर्म टिकट” बुक कर लिया है। लेकिन दिसंबर 2025 के पहले हफ्ते ने साबित कर दिया कि भाग्य, मौसम और इंडिगो – तीनों किसी की नहीं सुनते।

उस सुबह देश भर के हज़ारों यात्री बड़े सजे-धजे, चमकते ट्रॉली बैग और सपनों से लबालब बोर्डिंग पास लिए घरों से निकले थे। किसी की शादी में जाना था, किसी को इंटरव्यू देना था, कोई बस नॉर्मल वीकेंड मनाने जा रहा था। एयरपोर्ट पहुँचे तो पता चला कि आज का सबसे बड़ा “फ्लाइट मोड” उनके मोबाइल पर नहीं, इंडिगो के दिमाग पर लगा हुआ है। स्क्रीन पर लाल-लाल अक्षरों में लिखा था – CANCELLED। बाहर बोर्ड पर इंडिगो लिखा था, भीतर माहौल बिल्कुल जनरल रेलवे डिब्बा था – लोग ज़मीन पर बैठे, बच्चे रो रहे, बुज़ुर्ग दीवार से टिके हुए, और बीच में खड़ा स्टाफ वही पुराना डायलॉग दोहरा रहा था – “हम असुविधा के लिए खेद व्यक्त करते हैं…”

कहते हैं न, बुमेरांग फेंको तो एक दिन लौटकर आपके ही सिर पर लगता है। इंडिगो ने सालों तक जिस रफ्तार, जिस कुशलता और जिस ‘काटो तो चिंगारी निकले’ वाली एफिशिएंसी से दूसरों को मैदान से बाहर किया, वही रफ्तार अब उसके पैर में बाँधी हुई बेड़ी बनकर लौट आई। जिस कंपनी ने 100–200–300 विमानों की हर सेंचुरी पर किसी न किसी प्रतिद्वंद्वी की अर्थी निकाल दी – जेट, गो फर्स्ट, किंगफिशर, स्पाइस जैसी एयरलाइनों को इतिहास में धकेल दिया – वही आज अपने ही रिकॉर्ड के बोझ से कराह रही है।

कहानी बहुत रूमानी तरह से शुरू हुई थी। दो दोस्त – एक देसी सिस्टम-जाँनू कारोबारी, जिसे पता था कि बाबूजी कौन-सा फाइल कितने रुपए में ऊपर भेजते हैं; दूसरा आसमान की बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम कर चुका कॉस्ट-कटर, जो जहाज़ के इंजन से लेकर बैलेंस शीट तक हर स्क्रू का खर्चा जानता था। दोनों ने मिलकर एक ऐसा मॉडल बनाया जिसने विमान को सिर्फ उड़ने वाली मशीन नहीं, चलती-फिरती कमाई बना दिया। एयरबस से सस्ते में विमान खरीदना, उसे महँगे में लीज़र को बेच देना, फिर उसी से किराए पर लेकर उड़ाना – विमान अभी रनवे पर टायर रखने से पहले ही इंडिगो की जेब में मुनाफ़ा खनक जाता था।

फिर आया उनका दर्शन – “स्वेट द एसेट।” मतलब, जहाज़ तब तक पैसे नहीं कमाता जब तक वह आसमान में न हो। ज़मीन पर खड़ा विमान उनके लिए वही था जो सरकारी दफ़्तर में ईमानदार अफ़सर – खर्चा और शक दोनों पैदा करता है। सो टर्न-अराउंड टाइम काटकर 30 मिनट कर दिया गया। जहाज़ रुका नहीं कि सफ़ाईवाले, ग्राउंड-स्टाफ, क्रू – सब उस पर ऐसे टूट पड़ते जैसे पिट-स्टॉप पर फार्मूला वन की कार हो। यात्रियों के लिए सीढ़ी नहीं, रैम्प लगा दिए गए कि चलो भाई, दौड़ते-भागते निकलो, अगली खेप चढ़ानी है।

विमान का वजन कम करने के लिए भी उन्होंने भारतीय माँ जैसा जुनून दिखाया। ओवन निकाल फेंके – खाना ठंडा दे देंगे, पर जहाज़ हल्का रखेंगे। इन-फ्लाइट मैगज़ीन के पन्ने पतले, पानी की भारी बोतलें गायब, हल्के कप, पेंट भी कम – जैसे कोई कह रहा हो, “कपड़े इतने पतले करो कि धोने में साबुन बचे।” सैकड़ों विमानों पर कुछ-कुछ किलो बचाकर उन्होंने करोड़ों का ईंधन बचा लिया। यह एयरलाइन कम और उड़ता हुआ चार्टर्ड अकाउंटेंट ज़्यादा हो गई।

ये सब चल रहा था, और दूसरी तरफ़ बाकी एयरलाइंस अपने-अपने नाटक में उलझी थीं। कोई जहाज़ को उड़ते-उड़ते पार्टी बना रहा था, कोई बिज़नेस क्लास के करारे कबाब में नफ़ासत ढूँढ रहा था, कोई कई तरह के विमान रखकर लॉजिस्टिक को भूत बना चुका था। इंडिगो ने सोचा – “भाई, हमें शेर से नहीं, पड़ोसी से तेज़ भागना है।” एक मॉडल, एक तरह का विमान, एक ट्रेनिंग, एक स्पेयर पार्ट – सादगी की ऐसी मिसाल कि साधु-संत भी शरमा जाएँ।

समस्या वहीं शुरू हुई जहाँ ये सारी कामयाबी ‘परफेक्शन’ में बदल गई। परफेक्शन वो काँच का गिलास है जिसमें चाय तो बहुत सुंदर लगती है, लेकिन ज़रा-सी चोट पर चकनाचूर हो जाता है। इंडिगो ने अपने सिस्टम को इतना टाइट, इतना मशीननुमा बना दिया कि उसमें इंसान की थकान, बीमारी, गलती, मौसम, कोहरा – किसी के लिए जगह नहीं छोड़ी। रोस्टर ऐसे बने कि पायलट कानून की सीमा तक काम करें; बस उससे ज़्यादा नहीं। बैकअप पायलट? “अरे वो तो बैठे-बैठे पैसे खाएँगे!” स्टैंडबाय क्रू? “अरे हमारा एक्सेल शीट देखिए, सब ऑप्टिमाइज़्ड है।”

फिर आया 2 दिसंबर 2025। उत्तर भारत में कोहरा, शादी का मौसम, यात्रियों की भीड़, और ऊपर से सरकार ने पायलटों के आराम के नियम सख़्त कर दिए – एफडीटीएल। अब पायलटों को ज़्यादा रेस्ट चाहिए, उड़ान के बाद उन्हें सचमुच सोने दिया जाएगा, सिर्फ वॉट्सऐप ग्रुप में नहीं। इंडिगो का पूरा गणित यहीं आकर उलझ गया। रोस्टर पहले ही कानून की आख़िरी लाइन तक खींचे हुए थे, उसमें नया नियम घुसा तो पूरा तंबू खिसक गया। ऊपर से डिजिटल सिस्टम भी सुस्त पड़ गया – चेक-इन धीमे, कतारें लंबी, बोर्डिंग गेट पर अफ़रा-तफ़री।

एक उड़ान देरी से चली, तो अगली में पायलट का ड्यूटी टाइम खत्म। नियम कहता है – अब वह नहीं उड़ सकता। नया पायलट चाहिए। नया पायलट है नहीं, क्योंकि एक्सेल शीट में “खाली बैठने वाला आदमी” अनुत्पादक खर्च माना गया था। नतीजा – एक फ्लाइट कैंसिल, फिर दूसरी, फिर तीसरी। जैसे डोमिनो की पहली गोटी गिरती है और देखते ही देखते पूरी लाइन धड़ाम हो जाती है। दिल्ली से पटना, पटना से बेंगलुरु, बेंगलुरु से हैदराबाद – हर जगह स्क्रीनों पर एक ही शब्द चमकने लगा – CANCELLED

जिस एयरलाइन ने कभी पटना के बाहुबलियों की बंदूक से नहीं डरी, जिसने ग्राउंड हैंडलिंग के कॉन्ट्रैक्ट को भी धमकी देकर नहीं, अपने नियम से चलाया, वही आज यात्रियों के गुस्से के सामने हाथ जोड़कर माफ़ी माँग रही है। डीजीसीए के सामने मानना पड़ गया कि “हमसे मिसजजमेंट हुआ, प्लानिंग में गैप था।” हालात सामान्य होने की तारीख भी बता दी – 10 फरवरी। यानी यात्रियों से साफ़-साफ़ कहना पड़ा – “दो महीने आप भी धैर्य रखिए, हम भी सीखने का नाटक करते हैं।”

पूरी घटना में सबसे दिलचस्प बात यही है कि इंडिगो अपने ही गुणों से घायल हुआ है। कॉस्ट कटिंग में इतने मगन हो गए कि इंसान को भी ‘कास्ट’ समझ लिया – चलाने वाला पुरज़ा, जिसे आराम, बीमारी, निजी जीवन की सुविधा की जगह न दी जाए। एफिशिएंसी की मूर्ति को इतना चकाचौंध बना दिया कि उस पर एक खरोंच भी पड़ जाए तो पूरी मूर्ति दरकने लगे।

अब सवाल सिर्फ इंडिगो का नहीं, हमारे पूरे समय का है। हम हर चीज़ में “परफेक्ट” सिस्टम, “ज़ीरो वेस्ट”, “मैक्सिमम प्रोडक्टिविटी” की बात तो करते हैं, पर भूल जाते हैं कि सिस्टम के सबसे नाज़ुक हिस्से का नाम इंसान है। मशीन अगर खाँसे तो ग्रीस लगाकर चुप करा सकते हैं; इंसान अगर थक जाए तो एक्सेल शीट से बाहर निकलकर उसे भी कभी आराम देना पड़ता है।

शायद दिसंबर 2025 का यह हफ्ता भारतीय एविशन के इतिहास में सिर्फ इसलिए नहीं याद रखा जाएगा कि 1000 से ज़्यादा उड़ानें रद्द हुईं; बल्कि इसलिए भी कि देश की सबसे सफल, सबसे सख़्त, सबसे “ऑन टाइम” एयरलाइन को पहली बार ज़बरन रुककर सांस लेना पड़ा। अब देखना यह है कि इंडिगो इस रुकावट को “सीख” बनाती है या सिर्फ एक और प्रेस रिलीज़, जिस पर लिखा होगा –
“हम असुविधा के लिए खेद व्यक्त करते हैं, अगली बार हम और तेज़ भागेंगे।”

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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