मक्खनमहापुराण
“चापलूस्योपनिषद्” का उत्तर आधुनिक खंड है।
कुछ भी कहिए जनाब, शब्दों के भी अपने-अपने संस्कार होते हैं। “प्रशंसा” कह दीजिए तो लगता है जैसे कोई सज्जनता का शॉल ओढ़े बैठा है, पर “मक्खन लगाना” कहिए तो वही शॉल फिसलकर सीधे फर्श पर आ गिरती है और भीतर से चमचागिरी का कुर्ता झलकने लगता है। जैसे “नेता” और “लीडर” में वही अंतर है जो घर की रोटी और होटल के बफे में—दोनों पेट भरते हैं, पर स्वाद और संस्कार अलग-अलग हैं।
अब इस मक्खन की महिमा क्या कहें! इसे केवल दुग्धोत्पाद न समझें, यह जंबूद्वीप अखंड भारत भूमि में सर्वत्र व्याप्त एक दिव्य तत्त्व है—जिसे जहाँ लगाया जाए, वहाँ घर्षण कम, संबंध नम और अवसर नरम हो जाते हैं। मक्खन बहुउद्देशीय है—यह संबंधों में पिघलकर लगे तो तेल लगाने का भी काम करे। कई बार इसके सफेद रंग को देखकर इसे चूना भी समझ लिया जाता है; यह जिस पर लगाया गया है, वह उसे किस भाव में लेता है, उस पर निर्भर करता है।
मेरी भेंट ऐसे ही एक कुख्यात, अहोरात्र स्मरणीय मक्खनाचार्य से होती रहती है। अपने मक्खन लपेटने की कला का बीभत्स प्रदर्शन वे मेरे ऊपर कई बार कर चुके हैं, लेकिन मैं हूँ कि गैंडे जैसी मोटी खाल वाला —कभी इतना पिघला भी नहीं कि फिसल सकूँ।
लेकिन चूँकि उन्हें पता लग गया कि इसे मक्खन लगाना बेकार है—वेस्टेज ऑफ मनी एंड टाइम है—अब वे मुझसे कन्नी काटने लगे। एक दिन मैंने उन्हें रंगे हाथों कन्नी काटते पकड़ लिया।
मैंने दीनभाव से निवेदन किया—
“हे चाटुकारचूड़ामणि! आप की इस मक्खन लपेटन की गूढ़ विद्या के रहस्य, कृपया मुझे बताइए। चूँकि आप अब इस कला से बहुत पहुँचे हुए इंसान हो गए हैं, इससे पहले कि आप हमारी पहुँच से दूर परलोक गमन हो जाएँ, इस कला को हमें सुपुर्द कर जाएँl ”
वे मंद-मंद मुस्कराए। उन्होंने गला खंखारा, इधर-उधर देखा, और मुझे थोड़ा किनारे ले जाकर बोले—“वत्स, तुमने बड़ी गूढ़ विद्या पूछ ली। यह साधारण कला नहीं, यह लोकसेवा, आत्मरक्षा, पद-सुरक्षा, वेतन-वृद्धि, पुरस्कार-प्राप्ति, अनुशंसा-सिद्धि और अवसर-साधना का समन्वित शास्त्र है। इसे ही हम लोग ‘मक्खनयोग’ कहते हैं। इसके बिना आजकल न दफ्तर चलता है, न संस्था, न समिति, न साहित्य, न राजनीति, न पारिवारिक व्हाट्सऐप समूह।”
मैंने श्रद्धा से पूछा—“गुरुदेव, क्या यह विद्या जन्मजात होती है या अभ्यास से आती है?”
वे बोले—जन्मजात भी होती है और अर्जित भी की जा सकती है । मक्खनाचार्य वही होता है जो जीभ को इतना साध ले कि सामने वाले के अहंकार पर ऐसे फेरे जैसे गरम परांठे पर अमूल का क्यूब। ध्यान रखो—मक्खन कभी सीधे पदार्थ पर नहीं लगाया जाता, पहले तापमान देखा जाता है। आदमी ठंडा हो तो आदर की आँच दो, गरम हो तो विनम्रता की फूँक मारो, और यदि पद पर बैठा हो तो उसके चारों ओर चक्कर लगाते हुए ऐसा वातावरण बनाओ कि उसे अपनी ही साधारण बात वेदवाक्य प्रतीत होने लगे।”
मैंने कहा—“लेकिन आचार्यवर, साधारण प्रशंसा और माखन लेपन में भेद कैसे किया जाए?”
वे फाइल के कोने से घूस की पुरानी गंध जैसी हंसी हँसे । बोले—“प्रशंसा सत्य पर आधारित होती है, मक्खन संभावना पर। प्रशंसा कहती है—‘आपने अच्छा काम किया।’ मक्खन कहता है—‘आप जैसा दूरदर्शी मनुष्य इस युग में दुर्लभ है, आपकी कृपा न होती तो सूर्य भी शायद पूर्व से न निकलता।’ प्रशंसा में तथ्य का नमक होता है, मक्खन में आशा की मलाई। प्रशंसा सुनकर आदमी प्रसन्न होता है, मक्खन लेपन से अपने बारे में भ्रमित।”
मैंने जिज्ञासा की—“तो क्या हर किसी पर मक्खन लगाया जा सकता है?”
वे गंभीर हो गए। बोले—“नहीं वत्स, यह सबसे बड़ी भूल है। कुछ लोग होते हैं जिनकी चमड़ी तुम्हारी ही तरह गैंडे की होती है; उन पर मक्खन लगाना निवेश की विफल योजना है। ऐसे लोगों पर समय नष्ट करना, सूखी दीवार पर चूना पोतने जैसा है। मक्खन वहीं लगाओ जहाँ से कुछ फिसलकर तुम्हारी थाली में आ सके। यह विद्या निस्वार्थ नहीं है; निस्वार्थता तो संतों के लिए छोड़ी गई थी, हम लोग अवसरवादी गृहस्थ हैं।”
मैंने पूछा—“गुरुदेव, इस शास्त्र के अंग कौन-कौन से हैं?”
उन्होंने उँगलियाँ गिनीं और ऐसे बताने लगे मानो गीता के अठारह अध्यायों का सार सुना रहे हों—“प्रथम अंग है मुखमुद्रा। चेहरा ऐसा हो जैसे सामने वाले की उपस्थिति मात्र से तुम्हारे जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो गया हो। द्वितीय अंग है संबोधन। आदमी चाहे मुहल्ले का छुटभैया संयोजक हो, उसे ‘दूरदर्शी व्यक्तित्व’, ‘विचारपुरुष’, ‘साहित्य-मनीषी’, ‘जनप्रिय नेतृत्व’ कहकर पुकारो। तृतीय अंग है अवसर-बोध। मक्खन लेपन वही सफल है जो सही समय पर लगाया जाए—जन्मदिन, पदोन्नति, मंचारोहण, पुस्तक-विमोचन, जांच-समिति गठन, टिकट वितरण, पुरस्कार-घोषणा और तबादले के समय यह विशेष फलदायी होता है। चतुर्थ अंग है मात्रा-नियंत्रण। अधिक लगा दिया तो चाटुकारिता पकड़ में आ जाएगी, कम लगाया तो लगेगा नहीं । पंचम अंग है प्रत्यावर्तन। सामने वाले का एक वाक्य सुनकर उसके तीन गुण बताओ। वह छींक दे तो कहो—‘क्या सशक्त फेफड़े हैं!’ वह देर से आए तो कहो—‘महान लोग समय से नहीं, समय महान लोगों से चलता है।’”
मैंने कहा—“किन क्षेत्रों में यह विद्या सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध होती है?”
वे बोले—“वत्स, जहाँ मनुष्य है, वहाँ अहंकार है; जहाँ अहंकार है, वहाँ मक्खन का बाजार है। दफ्तर में बाबू से लेकर साहब तक, साहित्य में प्रकाशक से लेकर संपादक तक, राजनीति में कार्यकर्ता से लेकर शिखरपुरुष तक, धर्म में प्रवचनकर्ता से लेकर उनके चरण-धूलि-वितरकों तक—सब अपने-अपने तापमान के साथ उपस्थित हैं।
मैंने थोड़ा साहस कर पूछा—“पर आचार्य, क्या कभी ऐसा भी हुआ कि मक्खन उल्टा पड़ गया हो?”
वे एक पल को चुप हुए। शायद पुराने घाव पिघल उठे थे। बोले—“हाँ, यह विद्या जितनी दिव्य है उतनी जोखिमपूर्ण भी। मक्खन लगाने से पहले पात्र की ही नहीं, उसकी हीनभावना की भी जाति पूछ लेनी चाहिए।”
मैंने कहा—“तो क्या सच्ची योग्यता का कोई स्थान नहीं?”
मक्खनाचार्य ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने भरी सभा में उनके बिजली के मीटर से छेड़छाड़ की बात कह दी हो। बोले—“वत्स, योग्यता का अपना सम्मान है, पर उसकी चाल बैलगाड़ी जैसी है। मक्खन लेपन फरारी है। योग्यता तुम्हें लाइन में खड़ा रखती है, मक्खन लेपन तुम्हें फ़ास्ट लाइन देता है।
मैंने दीन होकर पूछा—“गुरुदेव, क्या इस शास्त्र का कोई व्रत, नियम, आचार-संहिता भी है?”
वे बोले—“अवश्य। पहला नियम—जिससे लाभ न हो, उससे दूरी रखो। दूसरा—जिसकी शक्ति घटने लगे, उसके प्रति आदर की मात्रा क्रमशः कम करते जाओ। तीसरा—एक समय में अनेक तवों पर मक्खन लपेटो , ताकि कहीं न कहीं कुछ न कुछ सिकता रहे। चौथा—पुराने स्वामी के पतन पर तुरंत नए स्वामी के गुण खोज निकालो। पाँचवाँ—कभी स्वीकार मत करो कि तुम मक्खन लगा रहे हो; हमेशा कहो कि तुम तो केवल सत्य भाष कर रहे हो ।”
मैंने फिर पूछा—“और शिष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है?”
वे बोले—“आरंभ में उसे छोटी-मोटी जगहों पर अभ्यास करना चाहिए—मुहल्ले की समिति, विद्यालय का मंच, साहित्यिक गोष्ठी, दफ्तर की बैठक, विवाह समारोह के मुख्य अतिथि। वहाँ से स्वर, शब्द और शारीरिक झुकाव का अभ्यास होता है। जब जीभ में लोच आ जाए, आँखों में दीनता और चेहरे पर समयानुकूल श्रद्धा उतर आए, तब बड़े अखाड़ों में प्रवेश मिलता है। फिर शिष्य एक दिन स्वयं किसी का ‘विश्वस्त’, ‘प्रिय’, ‘करीबी’, ‘अनुजवत’, ‘पुत्रवत’, ‘विशेष कृपापात्र’ कहलाने लगता है। यही दीक्षा का उच्च चरण है।”
इतने में मैंने देखा कि उनके मोबाइल पर घंटी बजी। उन्होंने स्क्रीन देखी, और उनके चेहरे पर वैसी ही भक्ति उतर आई जैसी किसी भक्त पर मंदिर के पट खुलते ही उतरती है। वे वहीं दंडवत साष्टांग से झुक गए, आवाज़ को घी में डुबोया और बोले—“प्रणाम सर! नहीं-नहीं, आप तो इस युग के अनुपम व्यक्तित्व हैं… हमने तो बस आपसे सीखा है… जी, आपकी कल की सारगर्भित टिप्पणी ने तो मानो विचार-जगत में क्रांति ला दी…” मैं स्तब्ध खड़ा सुनता रहा। अभी जो पुरुष मेरे सामने मक्खनपुराण का दार्शनिक व्याख्यान कर रहा था, वही क्षण भर में प्रयोगशाला से निकलकर मैदानी प्रदर्शन में उतर आया था।
फोन समाप्त हुआ। उन्होंने मुझे देखकर हल्की लाज के साथ कहा—“वत्स, यही जीवन है। शास्त्र पढ़कर क्या होगा, जब तक उसका आचरण न हो?”
मैंने अंतिम प्रश्न किया—“गुरुदेव, यदि कल ऐसा समय आ जाए कि लोग मक्खन से ऊब जाएँ, तब आपका क्या होगा?”
वे क्षणभर मौन रहे। फिर ऐसी करुण मुस्कान बिखेरी कि लगा मानो रेफ्रिजरेटर में रखा आखिरी मक्खन बिजली जाते ही अपने भाग्य पर विचार कर रहा हो। बोले—“वत्स, यह चिंता व्यर्थ है। मनुष्य जब तक अपने बारे में सच सुनने से डरता रहेगा, तब तक मक्खन का भविष्य उज्ज्वल रहेगा। सच रोटी की तरह सादा होता है, मक्खन उसे निगलने योग्य बनाता है। हमारी परंपरा पर संकट नहीं आएगा।”
यह कहकर वे चल पड़े। जाते-जाते भी उनका साधक-स्वभाव नहीं गया। सामने से एक नए अधिकारी आते दिखे। मक्खनाचार्य ने क्षणार्ध में अपनी चाल बदली, मुख पर विनम्रता का लेप चढ़ाया, दोनों हाथ जोड़े और इतनी दूर से झुक गए मानो लोकतंत्र की रीढ़ उन्हीं के सुपुर्द हो। मैं उन्हें दूर तक देखता रहा।
तब से मैं जब भी किसी सभा, गोष्ठी, कार्यालय, विमोचन, अभिनंदन, सम्मान या शोकसभा में अत्यधिक स्निग्ध शब्दों की महक पाता हूँ, श्रद्धा से समझ जाता हूँ कि कहीं न कहीं मक्खनमहापुराण का अखंड पाठ जारी है
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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