कितनी टुच्ची है मंचीय कवियों की यह दुनिया! बुरा न मानो आखिर आप कवी हैं , बुरा मानने की फुर्सत यहाँ भला आपको कहाँ होगी । सबको अपने-अपने मंच, लिफाफे, निमंत्रण और अगली जुगाड़ से ही फुर्सत कहाँ! कविता तो बीच में कहीं घूंघट काढ़े बैठी हुई है, बाहर चुटकुलों, इशारों, अभिनय और आत्मप्रदर्शन की बारात नाचती गंधाती रहती है।
आज का कवि सम्मेलन किसी साहित्यिक गोष्ठी से अधिक अखाड़ा मालूम पड़ता है। यहाँ कवि पहले कविता नहीं सुनाता, पहले अपनी शक्ल-सूरत, आवाज़, कमर, हाथ और हाव-भाव का जिम्नास्टिक दिखाता है। कभी नेता बनता है, कभी अभिनेता, कभी सास, कभी बहू। बीच-बीच में ऐसे पुराने चुटकुले दोहराए जाते हैं कि लगता है मानो हास्य नहीं, कचरा प्रबंधन का कोई सरकारी मॉडल चल रहा हो—रीसाइक्लिंग आधारित मनोरंजन। जनता हँस दे, तालियाँ बजा दे, बस वही कविता की सफलता का प्रमाणपत्र है।
अश्लीलता को अब कई मंचीय कवि प्रगतीशील खुलापन मान बैठे हैं और भोंडेपन को लोकप्रियता। दूसरे कवियों पर व्यक्तिगत टिप्पणियाँ करना तो जैसे साहित्यिक तीरंदाजी का अनिवार्य अंग हो गया है। मंच पर बैठे कवि एक-दूसरे पर मुस्कान के फूल नहीं, कटाक्ष के तीर चलाते रहते हैं। कविता बेचारा कवि के मुँह की चौखट पर नई नवेली दुल्हन की तरह सिमटी खड़ी रहती है, पर बाहर चुटकुले और फूहड़ अभिनय के बाजे-गाजे बजते रहते हैं।
सच पूछिए तो आज का कवि सम्मेलन “मैंने तुझे बुलाया, तू मुझे बुला” का सांस्कृतिक संस्करण बन चुका है। यह एक प्रकार का साहित्यिक बार्टर सिस्टम है—कविता के बदले निमंत्रण, निमंत्रण के बदले मंच, मंच के बदले मानदेय, और मानदेय के बदले अगली सेटिंग। कविता कम, कबीलाई राजनीति अधिक दिखाई देती है। हर कवि ने अपना-अपना कुनबा बना लिया है। कोई किसी का कार्यक्रम कटवाता है, कोई किसी की सिफारिश रोकता है, कोई किसी की लाइन काटकर खुद की लाइन सेट करता है ।
कवि भी आखिर इंसान ही हैं, किसी दूसरे लोक से उतरे देवदूत नहीं। उनके बीच भी घात-प्रतिघात, चुगलखोरी, खींचतान, प्रतिस्पर्धा और जोड़-तोड़ चलती रहती है। इस पतनशील युग में कवि बनने के लिए कविता करने से अधिक ‘खट-कर्म’ करने पड़ते हैं। जूते घिसिए, फोन मिलाइए, रिश्ते निभाइए, आयोजकों के आसपास परिक्रमा कीजिए, तब कहीं जाकर मंच का प्रसाद मिलता है। तालियाँ भी यूँ ही नहीं बजतीं, उनके लिए भी मंचीय साधना करनी पड़ती है।
तो आइए, अब दृश्य देखिए। देवियो और सज्जनो, साहित्यप्रेमियो, तालियों के ठेकेदारों और “वाह-वाह” पर ठेके से आए श्रोताओ! आपका स्वागत है इस भव्य, दिव्य, बहुउद्देशीय, बहुअर्थी और प्रायोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन महोत्सव में—बहु-अर्थी का अर्थ सीधा सा है .. अर्थ का प्रबंध उन सभी लोगों के लिए जिनका कविता से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं।
मंच सजा हुआ है। पीछे बैनर है, सामने कुर्सियाँ हैं, और बीच में कुछ ऐसे मालामुंडित जीव विराजमान हैं जिनका कविता से उतना ही संबंध है जितना चुनाव के बाद घोषणापत्र का नेता से। वे मंच को साहित्य का आसन नहीं, राजनीति की सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने आए हैं। “विराट कवि सम्मेलन” लिखा है, पर विराट यदि कुछ है तो आयोजकों का पेट, जो वर्षों से ऐसे आयोजनों का प्रसाद पाकर लगातार विकसित होता रहा है।
कुर्सियाँ भी कैसी विराज रही हैं—मानो विरहिणी नायिकाएँ अपने-अपने भर्तार की प्रतीक्षा में तपस्या कर रही हों। इतने में मुख्य अतिथि पधारते हैं और कवि सम्मेलन का घूंघट उठता है। आयोजक की दाँत-निपोरी मुस्कान, स्वागत के नाम पर निजी स्वार्थों का समर्पण, और सरकारी कृपा की आकांक्षा—सब मिलकर ऐसा राग दरबारी छेड़ते हैं कि सरस्वती भी किनारे खड़ी तमाशा देखती रहें।
और अब प्रवेश होता है उद्घोषक महोदय का। वे वही प्राणी हैं जिन्हें कविता पाठ का अवसर कम मिलता है, इसलिए उदार कम उदास ज्यादा मन से दूसरों को बुलाते-बुलाते अपना काव्यत्व जीवित रखते हैं। माइक पकड़ते ही उनका स्वर फूटता है—“देवियो और सज्जनो! आज की यह अनुपम, अद्वितीय, ऐतिहासिक संध्या…” और इस घोषणा के साथ वे अपनी दो-चार कुटी-पिटी पंक्तियाँ भी परोस देते हैं, ताकि कवियों के इस आतंकवाद का आघाज उसकी प्रथम कविता रुपी गोली से हो । संचालक का काम इस खून के आंसू रुलाने वाले खेल में तालियाँ बजवाने का है l वह कविता की दुनाली बन्दूक की नोक पर ,अगले जन्म की धमकी और ‘अब आ ही गए हो तो बिना बजवाये तो नहीं जाने देंगे की’ वार्निंग पर बजवा ही लेते हैं l
उधर कवियों की रेलमपेल है। श्रोता कुछ सो रहे हैं , कुछ ऊँघ रहे हैं, कुछ बिना सुने “वाह-वाह” का अलाप ले रहे हैं l कवी कुछ मुख्य अतिथि की नज़र में आने को व्याकुल हैं। माइक बीच-बीच में रूठी हुई सास की तरह जवाब दे देता है—“हेलो, हेलो, टेस्टिंग…” चलता रहता है। श्रोताओं का धैर्य टूटने लगता है। समझ में नहीं आता कि श्रोता आ रहे हैं या जा रहे हैं। उन्हें जगाने के लिए तालियों के भाले चलाए जाते हैं, आग्रहों के डंडे फटकारे जाते हैं, और कविता अभी भी मंच के किसी कोने में बैठी यही सोच रही होती है—यह कवि सम्मेलन है या मेरे नाम पर आयोजित कोई सार्वजनिक गलतफहमी l
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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