मेरा नाम करेगा रोशन
उचाना कलां की इस खबर पर नजर पडी क्या आपकी ? 38 साल की महिला ने 9 बेटियों के बाद बेटे को जन्म दिया है। बेटे पैदा करके अपने परिवार का नाम रोशन करवाने के चक्कर में परिवार ने इतिहास लिख दिया—कम से कम अपने मोहल्ले में ही सही । मैं तो इस पूरे प्रकरण को परिवार की निजी खुशी नहीं, देशहित का एक छोटा-सा, पर दृढ़ प्रयास मानता हूँ। आखिर कोई यूँ ही दस संतानों का प्रोजेक्ट थोड़े शुरू करता है! अख़बार वाले कह रहे हैं कि बेटे पैदा करने की अटल इच्छा ने दस बेटियों को जन्म दिलवा दिया। मुझे तो यह एक सुविचारित दीर्घकालीन योजना लगती है—घर में ही पूरी क्रिकेट टीम तैयार कर लेने की । हरियाणा वैसे भी खेल के लिए जाना जाता है; पहले पहलवान कुश्ती में आज़माए गए, अब क्यों न क्रिकेट की पूरी टीम मैदान में उतार दी जाए! वैसे भी हरियाणा की छोरियाँ भी क्या छोरो से कम हैं।
माता-पिता शायद ‘करण-अर्जुन’ फिल्म की तर्ज़ पर इंतज़ार कर रहे हों—आएगा, देख लेना, एक दिन करण या अर्जुन ज़रूर आएगा।
जब से गर्भ में ही बच्चियों को मार देने वालों के खिलाफ सरकार सख़्त हुई है, पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत खुलेआम चल रहे कन्या स्लॉटर हाउस सरीखे अल्ट्रासाउंड केंद्रों पर लगाम लगी है, तब से वंशावली आगे बढ़ाने की अदम्य इच्छा का रास्ता बदल गया है। अब जो बाप मरणोपरांत अस्थि-विसर्जन की क्रिया बेटे से ही करवाना चाहता है (वैसे जीते जी हो जाए ऐसा प्रावधान नहीं है ), जो बाप बेटे के हाथों गंगा नहाने,दादा, पोते के हाथों स्वर्ग कि सीढियां चढ़ने का स्वप्न देखते है—वे क्या करे? चलो, कम से कम उसने बेटियों को बाहर तो आने दिया, सांस तो लेने दी। बाकी सरकार है न—काग़ज़ों में बेटियों के लिए योजनाओं का पुलिंदा है; ‘लाड़ली’ से लेकर जाने क्या-क्या। किसी को तो खुशी हो रही है—सरकार को सही, परिवार को नहीं तो जलनखोर पड़ोसी को ही सही –ले बेटा एक और झेल ।
भ्रूण-परीक्षण बंद हो गए, पर माँ का परीक्षण शुरू हो गया, मित्र। अब माँ का माइलेज पूछा जा रहा है—कितनी बार, किस गति से। यार, नौ महीने का समय कुछ ज़्यादा नहीं है? क्या कोई ऐसी तकनीक नहीं कि तीन महीने में ही ‘फिनिश्ड प्रोडक्ट’ निकल आए? “अबकी बार क्या हुआ?”—बाप के लटके चेहरे से और माँ के अपराध बोध से भरे चहरे से ज्ञात नहीं होता क्या । माँ क्या करे—मजबूर है। किसी आंसी जन्म का कर्मफल है रे —वह बेटा नहीं जन सकती। और आप क्या सोच रहे हैं—बाप की मर्दानगी पर भी सवाल उठ रहा है। “कैसा मर्द है, एक बेटा नहीं जन सका!”—गांव के ताऊ-काकी-मौसाओं की सामूहिक सांत्वना बरस रही होंगी है जैसे खराब चुनाव परिणाम पर —सांत्वना का पुलंदा दरवाजे पर हर बार -लगे रहो ,बाप अगली बार जीत पक्की होगी।भगवान् के घर देर है अंधेर नहीं ”

शायद पंडित जी ने कुंडली देखकर पहले ही बता दिया होगा कि बेटे की भाग्य-कुंडली दसवें पायदान पर है। घर में जैसे ही दसवीं बार किलकारी गूंजी, शायद सबसे पहले माँ ने ही रहत की सांस ली होगी —“चलो, भगवान ने सुन ली।” माँ तो बस माध्यम है, मित्र—जैसे बच्चे पैदा करने की मशीन; जरूरी नहीं हर बार ‘प्रोडक्ट’ मानक पर खरा उतरा हो।
ख़बर लिखने वाले ने बड़ी मासूमियत से जोड़ दिया कि बेटे के इंतज़ार में छोटी बेटियों के नाम ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ रखे गए। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’—इन नामों में एक बाप की दशा पढ़ी जा सकती है। ‘काफ़ी’ यानी अब बस करो—शायद भगवान से शिकायत कर रहा है बाप । ‘माफ़ी’ यानी अब तो माफ़ कर दो—पिछले जन्मों के पापों का गड्ढा अब भर गया होगा। ये नाम बेटियों के नहीं, समाज के लिए छोड़े गए नोट्स हैं—“हमें माफ़ कर दीजिए, हम कोशिश में लगे हैं।” बेटा आया ,खुशियाँ आयी जैसे नौ बेटियाँ कोई प्राकृतिक आपदा हों और बेटा एनडीआरएफ की टीम। अब सब ठीक है—वंश बच गया। वंश हाहाहा !
पूरी व्यवस्था प्रसव-पीड़ा में है, मित्र—सोच की, मानसिकता की प्रसव-पीड़ा। यह दर्द सिर्फ़ पेट का नहीं, सोच का है। 38 साल की उम्र में दसवां प्रसव—इसे सामाजिक ज़िद का साइड-इफेक्ट मान लीजिए। अब घरवाले चैन से सो पाएँगे और माँ को भी सोने देंगे कि “वारिस” आ गया है। अब बेटियाँ बेटियाँ रह सकेंगी, वरना उनसे भी अपना लड्कीपन भूलकर वारिस बनकर घर संभालने की उम्मीद रखी जाती है।
हरियाणा, जहाँ बेटियों का टोटा बताया जाता है—चलो, इस बहाने कुछ बेटों के हाथ पीले हो जाएँगे। उन्हें दूसरे राज्यों में कुंवारापन काटने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। मंचों से महिला सशक्तिकरण पर ज़ोरदार भाषण चल रहे हैं—“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।” पर पढ़ाओ किसलिए? ताकि वह अगली पीढ़ी में बेटे के इंतज़ार को और बेहतर ढंग से निभा सके?
अजीब-सी थकान हो गई है लिखते-लिखते। लगता है समाज अभी भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा है, हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?” और डॉक्टर चुपचाप फाइल में लिख रहा है—“क्षमा कीजिए, इस बार भी हम बेटा डिलीवर नहीं कर पाए।”
रचनाकार –डॉ मुकेश असीमित
गंगापुर सिटी राजस्थान
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