(आचार्य प्रशांत जी के विचारों से प्रेरित है यह लेख )
मनुष्य अपने को बहुत स्वतंत्र समझता है। वह कहता है—यह मेरी थाली है, मेरा स्वाद है, मेरी परंपरा है, मेरा धर्म है। लेकिन क्या सचमुच यह “मेरा” है? या यह सब पीढ़ियों से चली आ रही आदतों का एक ऐसा सिलसिला है जिसे हमने बिना सवाल किए स्वीकार कर लिया है?
प्रश्न सरल है—क्या जानवर खाना सही है या गलत? और प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना ही असहज है। हर वर्ष दुनिया भर में अरबों स्थलीय जानवर भोजन के लिए मारे जाते हैं। मछलियों की संख्या जोड़ दीजिए तो यह आँकड़ा सैकड़ों अरब तक पहुँच जाता है। यह कोई भावुक करने वाला कथ्य नहीं, बल्कि औद्योगिक पैमाने पर चल रही व्यवस्था है—फैक्ट्री फार्मिंग, भीड़भाड़, सीमित गतिशीलता, कृत्रिम आहार, और अंत में वध। हम सुपरमार्केट की साफ-सुथरी पैकिंग देखते हैं, पर उसके पीछे की यात्रा से अनजान बने रहते हैं। शायद जानबूझकर।
वैश्विक मांस-उपभोग के कुछ कठोर तथ्य हैं जो सोचने पर मजबूर करते हैं
जब हम मांसाहार पर नैतिक या दार्शनिक बहस करते हैं, तो अक्सर बात संवेदना, करुणा और व्यक्तिगत पसंद तक सीमित रह जाती है। पर जैसे ही आँकड़े सामने आते हैं, चर्चा का स्वर बदल जाता है। भावनाएँ एक भाषा बोलती हैं, लेकिन संख्याएँ दूसरी—और कभी-कभी कहीं अधिक कठोर ।
दुनिया की आबादी लगभग आठ अरब के आसपास है। इनमें से अनुमानतः 85 से 90 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में मांस या मछली का सेवन करते हैं। पूर्ण शाकाहारी और वीगन समुदाय अभी भी वैश्विक स्तर पर अल्पसंख्यक हैं—क्षेत्र के अनुसार 3 से 15 प्रतिशत के बीच। इसका सीधा अर्थ यह है कि पृथ्वी की विशाल आबादी नियमित या अवसरानुसार मांस का उपभोग करती है। यह कोई हाशिये का व्यवहार नहीं, बल्कि मुख्यधारा की जीवनशैली है।
अब ज़रा प्रति व्यक्ति खपत पर नज़र डालिए। वैश्विक औसत लगभग 40 से 45 किलोग्राम मांस प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष है। विकसित देशों—जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई हिस्सों—में यह आँकड़ा 80 से 100 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष तक पहुँच जाता है। विकासशील देशों में यह कम है, पर आय बढ़ने के साथ उपभोग भी तेज़ी से बढ़ रहा है। यदि इसे भोजन में बदलकर समझें, तो औसतन सप्ताह में कई बार मांस-आधारित भोजन हर व्यक्ति की थाली में पहुँच रहा है।
अब आते हैं सबसे असहज हिस्से पर—इस मांग को पूरा करने के लिए हर साल कितने जानवर मारे जाते हैं। केवल भूमि पर पाले जाने वाले जानवरों की बात करें तो अनुमान है कि हर वर्ष लगभग 80 से 90 अरब स्थलीय जानवर भोजन के लिए मारे जाते हैं। इनमें लगभग 70 से 80 अरब केवल मुर्गियाँ हैं। सूअरों की संख्या लगभग डेढ़ अरब के आसपास है। गाय-बैल लगभग 30 करोड़। भेड़-बकरी 60 करोड़ से अधिक। और यह सूची यहीं समाप्त नहीं होती—बतख, टर्की और अन्य पोल्ट्री अलग से।
लेकिन कहानी यहीं पूरी नहीं होती। मछलियों की गिनती तो संख्या में नहीं, बल्कि टन भार में होती है। अनुमान है कि हर साल 1 से 3 ट्रिलियन (एक से तीन हजार अरब) मछलियाँ पकड़ी या पाली जाती हैं और मारी जाती हैं। यदि जलीय जीवों को शामिल कर लें, तो यह पैमाना लगभग खगोलीय हो जाता है—इतना विशाल कि कल्पना भी थक जाए।
अब इसे समय में बाँटकर देखिए। यदि हम केवल स्थलीय जानवरों का औसत लें—80 अरब को 365 दिनों में बाँटें—तो लगभग 22 करोड़ जानवर प्रतिदिन। यानी हर दिन 20 से 25 करोड़ जीवन केवल भूमि-आधारित पशुपालन से समाप्त हो रहे हैं। इसे घंटों में बाँटें तो लगभग 90 लाख प्रति घंटा। और मिनटों में? लगभग डेढ़ लाख प्रति मिनट।
अर्थात जब आप यह लेख पढ़ रहे हैं, हर मिनट लगभग 1,50,000 जानवर मारे जा रहे हैं। यदि इस लेख को पढ़ने या लिखने में 10 मिनट लगते हैं, तो उस दौरान लगभग 15 लाख से अधिक स्थलीय जानवर कहीं न कहीं दुनिया में मारे जा चुके होंगे। और यह आँकड़ा मछलियों को शामिल किए बिना है।
यह केवल संख्या का खेल नहीं है। इन संख्याओं के पीछे है एक विशाल औद्योगिक ढांचा—फैक्ट्री फार्मिंग, बड़े पैमाने पर जल उपयोग, भूमि का व्यापक दोहन, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, एंटीबायोटिक का भारी प्रयोग, और संस्थागत स्तर पर व्यवस्थित वध। यह एक संगठित, वैश्विक प्रणाली है जो हमारी सामूहिक मांग पर चल रही है।
जब उपभोग इस स्तर तक पहुँच जाता है, तो यह केवल “मेरी थाली, मेरा स्वाद” का मामला नहीं रह जाता। यह पारिस्थितिकी का प्रश्न बन जाता है। यह संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का प्रश्न बन जाता है। यह नैतिकता का प्रश्न बन जाता है।
सबसे रोचक और शायद सबसे असहज क्षण वही है—जब हम यह स्वीकार करते हैं कि इस पूरे समय, जब यह लेख लिखा जा रहा है, संख्याएँ बढ़ती जा रही हैं। हमारी घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही हैं, और उनके साथ वध-लाइनें भी चल रही हैं।
ये तथ्य किसी को दोषी ठहराने के लिए नहीं हैं। वे केवल पैमाना दिखाते हैं। क्योंकि जब समस्या का आकार इतना बड़ा हो, तो समाधान की आवश्यकता भी उतनी ही गंभीर हो जाती है। प्रश्न केवल यह नहीं कि हम क्या खाते हैं। प्रश्न यह है कि उस चुनाव का सामूहिक प्रभाव कितना व्यापक है—और क्या हम उसे देखने का साहस रखते हैं।

मनुष्य जब अपनी थाली का बचाव करता है तो तर्कों की पूरी बारात ले आता है। कोई प्रोटीन की दुहाई देता है, कोई परंपरा की, कोई प्रकृति की। और फिर एक अत्यंत लोकप्रिय तर्क आता है—“हमारे पूर्वज गुफाओं में मांस खाते थे… शेर भी तो मांस खाते हैं… तो हम क्यों न खाएँ?” सुनने में यह तर्क बड़ा प्राकृतिक और दमदार लगता है, मानो इतिहास और जंगल दोनों हमारे पक्ष में खड़े हों।
लेकिन ज़रा ठहरिए।
मांसाहार के पक्ष में सबसे पहला तर्क आता है—प्रोटीन। “प्रोटीन कहाँ से आएगा?” जैसे शरीर केवल चिकन और मटन से ही चलता हो। जबकि दालें, चना, राजमा, सोया, मेवे, बीज—सब मिलकर पर्याप्त प्रोटीन दे सकते हैं। हाँ, कुछ पोषक तत्वों के लिए सावधानी और कभी-कभी सप्लीमेंट की आवश्यकता हो सकती है, पर यह एक प्रबंधनीय तथ्य है, कोई असंभव चुनौती नहीं। सवाल यह नहीं कि विकल्प हैं या नहीं; सवाल यह है कि हम विकल्प अपनाना चाहते हैं या नहीं।
दूसरा तर्क परंपरा का है—“हम सदियों से खाते आए हैं।” लेकिन इतिहास में बहुत कुछ सदियों से चलता आया, जो आज हमें अस्वीकार्य लगता है। परंपरा सम्मान की पात्र है, पर अंतिम नैतिक सत्य नहीं। यदि आज हमारे पास अधिक जानकारी, अधिक संसाधन और अधिक विकल्प हैं, तो क्या हमें अपने निर्णयों को भी अद्यतन नहीं करना चाहिए?
तीसरा तर्क बड़ा रोचक है—“जानवर खाने के लिए ही बने हैं।” यह वाक्य मनुष्य को सृष्टि का केंद्र मान लेता है। पर प्रकृति में कोई भी जीव “किसी के लिए” नहीं बना होता। हर जीव अपने अस्तित्व के लिए बना है। शक्ति हमें अधिकार नहीं देती, जिम्मेदारी देती है। यदि हम चुन सकते हैं, तो हमारी नैतिक परीक्षा भी वहीं से शुरू होती है।
कुछ लोग कहते हैं—पौधे भी तो जीवित हैं। बिल्कुल हैं। पर पीड़ा की क्षमता का स्तर भिन्न है। यदि हमें जीवित रहना है, तो कम-से-कम पीड़ा का मार्ग चुनना अधिक तर्कसंगत है। और यह भी एक तथ्य है कि एक किलो मांस पैदा करने के लिए कई किलो अनाज पशुओं को खिलाया जाता है। यानी कुल मिलाकर अधिक संसाधन और अधिक जीवन-हानि।
हा एक बात और सामने आती है,आपने भी सुना होगा.. “केवमैन” का प्रसंग। बोले केवमैन भी तो यही करते थे…अरे आप केव मैंन नहीं हो मित्र l हाँ, आदिम मानव शिकार करता था। उसके पास खेती की तकनीक नहीं थी, रेफ्रिजरेटर नहीं था, दाल-चना-सोया की खेती का व्यवस्थित ज्ञान नहीं था। उसके सामने विकल्प सीमित थे—या तो शिकार करो, या भूखे रहो। वह जीवित रहने की जद्दोजहद में था। अब प्रश्न यह है—क्या हम आज भी उसी अवस्था में हैं? क्या हम अभी भी गुफाओं में रहते हैं? क्या हमारे पास कृषि, विज्ञान, पोषण-ज्ञान और वैश्विक खाद्य-विकल्प उपलब्ध नहीं हैं?
यदि केवमैन तर्क ही अंतिम सत्य है, तो हमें बहुत कुछ और भी वापस ले लेना चाहिए—कपड़े, दवा, न्याय-व्यवस्था, शिक्षा। क्योंकि वह सब भी तो तब नहीं था। सभ्यता का अर्थ ही यह है कि हम अपनी सहज प्रवृत्तियों से ऊपर उठते हैं। हम केवल “जो संभव है” वही नहीं करते, बल्कि “जो उचित है” उसे चुनते हैं।
अब शेर का उदाहरण लीजिये । “लायन भी तो नॉनवेज है।” बिल्कुल है। पर क्या हम शेर हैं? शेर के पास नैतिक विवेक नहीं है, न ही वह विकल्पों के आधार पर भोजन-चयन कर सकता है। उसका शरीर, उसका पाचन-तंत्र, उसके दाँत और पंजे—सब शिकार के लिए बने हैं। वह यदि घास खाएगा तो जीवित नहीं रहेगा। पर मनुष्य सर्वाहारी संरचना वाला है; वह पौध-आधारित भोजन पर स्वस्थ रह सकता है। सबसे बड़ा अंतर यह है कि मनुष्य के पास चॉइस है।
शेर जंगल के नियम से चलता है। मनुष्य नैतिकता के नियम गढ़ता है। शेर भूख से प्रेरित है; मनुष्य स्वाद, सुविधा और आदत से भी प्रेरित है। और जब हमारे पास विकल्प हो, तब हमारी जिम्मेदारी भी शुरू होती है।

यह तर्क देना कि “प्रकृति में तो ऐसा होता है” स्वयं में अधूरा है। प्रकृति में हिंसा भी है, बलशाली का वर्चस्व भी है, पर क्या हम सभ्य समाज में वही नियम लागू करते हैं? यदि “प्राकृतिक” होना ही अंतिम कसौटी है, तो हमें कानून और करुणा दोनों छोड़ देने चाहिए। पर हमने ऐसा नहीं किया। हमने न्याय, दया और सह-अस्तित्व की संकल्पनाएँ विकसित कीं—क्योंकि हम केवल जैविक प्राणी नहीं, सामाजिक और नैतिक प्राणी भी हैं।
सभ्यता का अर्थ केवल ऊँची इमारतें और तेज इंटरनेट नहीं है। सभ्यता का अर्थ है—संयम। अपनी क्षमता का उपयोग केवल अधिकार के लिए नहीं, जिम्मेदारी के लिए करना।
और फिर एक और बात—केवमैन के पास विकल्प नहीं था, इसलिए उसका निर्णय नैतिक बहस का विषय नहीं बनता। पर हमारे पास विकल्प हैं। हम सुपरमार्केट में खड़े होकर दाल, अनाज, फल, सब्जी, प्लांट-प्रोटीन सब चुन सकते हैं। ऐसे में यदि हम केवल आदत या स्वाद के कारण उसी दिशा में जाते हैं जहाँ कम-से-कम पीड़ा नहीं, बल्कि अधिक पीड़ा है—तो यह निर्णय अब “मजबूरी” नहीं, “चॉइस” कहलाता है।
यहाँ मुद्दा किसी पर आरोप लगाने का नहीं है। मुद्दा यह समझने का है कि हम शेर नहीं हैं, हम गुफावासी नहीं हैं। हम वह प्राणी हैं जो अंतरिक्ष में उपग्रह भेज सकता है, जो जीन संपादन कर सकता है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता बना सकता है। यदि हम इतनी प्रगति कर चुके हैं, तो क्या अपनी थाली के प्रश्न पर भी थोड़ा आगे नहीं बढ़ सकते?
सभ्य मनुष्य होने का अर्थ है—सवाल पूछना। यह देखना कि जो हम करते आए हैं, क्या वह आज भी आवश्यक है? या केवल सुविधा और आदत का विस्तार है?
यह केवल नैतिकता का प्रश्न नहीं, पर्यावरण का भी है। औद्योगिक पशुपालन ग्रीनहाउस गैसों का बड़ा स्रोत है। जल और भूमि का व्यापक उपयोग इससे जुड़ा है। एंटीबायोटिक का अत्यधिक प्रयोग भविष्य की दवाओं को कमजोर कर रहा है। हम केवल एक प्लेट नहीं भर रहे, हम पृथ्वी पर एक दबाव भी बढ़ा रहे हैं।
धर्म की बात करें तो अधिकांश परंपराओं में करुणा का मूल्य सर्वोपरि है। यदि ईश्वर सर्व-जीवों में व्याप्त है, तो क्या करुणा का दायरा हमारी थाली पर आकर रुक जाना चाहिए? आस्था केवल अनुष्ठानों तक सीमित रहे या व्यवहार में भी उतरे? यह प्रश्न असुविधाजनक है, इसलिए हम अक्सर इसे टाल देते हैं।
स्वाद एक आदत है। आदत बदली जा सकती है। हमने मोबाइल बदले, फैशन बदले, जीवनशैली बदली—तो भोजन की आदत क्यों नहीं? आज प्लांट-बेस्ड विकल्प केवल सलाद तक सीमित नहीं हैं। रसोई की संभावनाएँ विस्तृत हैं। बात त्याग की नहीं, दिशा की है।
यह भी आवश्यक नहीं कि कोई व्यक्ति रातों-रात पूर्ण परिवर्तन कर ले। हर कदम मायने रखता है—सप्ताह में एक दिन मांस न खाना, लाल मांस कम करना, डेयरी के विकल्प अपनाना। नैतिकता पूर्णता की परीक्षा नहीं, प्रगति की प्रक्रिया है।
प्रश्न अब ही भी हमारे सामने खड़ा है -क्या हम सच में चुन रहे हैं, या केवल चुने हुए विकल्पों के भीतर घूम रहे हैं? यदि विकल्प उपलब्ध हैं, यदि पोषण संभव है, यदि पर्यावरणीय लाभ स्पष्ट हैं—तो कम-पीड़ा वाला विकल्प चुनना अधिक तर्कसंगत नहीं होगा?
मनुष्य स्वयं को स्वतंत्र समझता है। शायद स्वतंत्रता का पहला प्रमाण यह हो कि वह अपने स्वाद से ऊपर उठकर करुणा को चुन सके।
क्या इस पैमाने पर होने वाली हत्या केवल “व्यक्तिगत स्वाद” की श्रेणी में रखी जा सकती है?
या यह वह बिंदु है जहाँ हमें पुनर्विचार करना चाहिए?
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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