मेरी कविता “मिटा कभी कोई” व्यक्ति के सहस और विवेक की बात करती है की कैसे एक व्यक्ति सहस और विवेक से साधन हीन होते हुए भी कर्मशील बन जाता है और जीवन में सफल हो सकता है.
“मिटा कभी कोई”(कुण्डली 8चरण)
मिटा कभी कोई नहीं,जो साधन से हीन,
मिटता वह संसार से,जो साहस से दीन,
जो साहस से दीन,ना सूझे कोई धंदा,
शुरू करै कोई काम,लगे फंदा ही फंदा,
साहस विन साधन,भी कोइ काम न आवे,
हो जाये बेकार,कोई भी जुगत लगावें,
“प्रेमी” साहस कर्म, बने तव ही सव कोई,
साधन हीन विवेक,नही मिटा कभी कोई ।
रचियता -महादेव प्रेमी
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