मोबाइल और लाइन का लोकतंत्र : एक व्यंग्यात्मक संस्मरण
इस देश में अगर आप कभी न ख़त्म होने वाली लाइनों में बिना फ्रस्ट्रेट हुए खुद को खपा सकते हैं, तो उसका सिर्फ एक ही तरीका है—इस जीवन-संगिनी ‘मोबाइल’ को अपने पास रखो।
उसी मोबाइल को थामे, टिकट विंडो की अंतहीन कतार में अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए मैं संदेशों की बौछार में डूबा हुआ था।
दिवाली में अभी एक महीना बाकी है, लेकिन मोबाइल की स्क्रीन पर ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे हर कंपनी मुझे इस बार नए कपड़ों में देख लेने को व्याकुल है—मुझे ही नहीं, मेरे बच्चों और पत्नी के लिए भी। “इस दिवाली कुछ मीठा हो जाए” के नाम पर सूखी चॉकलेटों के आकर्षक पैक तैयार हैं जिन्हें पकड़े हुए सुकुमारी का विज्ञापन मेरे व्हाट्सऐप पर दमक रहा है।
हुआ यूँ कि एक दिन डेस्कटॉप पर बैठे-बैठे मुझे यही सुकुमारी का पोस्ट दिखा। ऑफर अच्छा लगा; ऑफर किस चीज़ का था, यह मैं जल्दीबाज़ी में देखना ही भूल गया—पर सुकुमारी के अनुरोध को टाल न सका और मोबाइल नंबर डाल दिया।
तभी से कंपनियाँ इस सुकुमारी के हाथों कभी चॉकलेट, कभी केक, कभी बिस्किट और न जाने क्या-क्या मुझे इस दिवाली पर खिलाने को तुली हुई हैं।
कंपनियाँ चाहती हैं कि आप हमेशा अपने मोबाइल से चिपके रहें, क्योंकि कोई भी कंपनी किसी भी क्षण ‘धमाकेदार सेल’ ला सकती है—वो भी लिमिटेड स्टॉक के साथ। आप यदि इसका लाभ उठाना चाहते हैं तो सोते-जागते, खाते-हँसते बस मोबाइल ऑन रखें।
और हाँ, इस भरोसे में बिल्कुल मत रहिए कि आपका दोस्त सेल की जानकारी देगा।
वो बताना भी चाहे तो नहीं बताएगा—क्योंकि उसकी बीवी ने विशेष आदेश दे रखे हैं कि यह सेल किसी और को न बताई जाए।
सेल का लाभ अकेले उठाने की जो गुदगुदी होती है, उसे सिर्फ पत्नियाँ ही समझती हैं!
नई जेनरेशन को कंपनियों ने इसी सेल-डिस्काउंट-ऑफ़र के भँवरजाल में बाँधकर एक दिशा भी दे दी है। वरना आज का भटका युवक पता नहीं कौन सा उल्टा-सीधा काम कर बैठता—किसी को कोसता, किसी पर भड़ास निकालता।थोथी क्रांति की आग में अपनी लंगोटी जलाता रहता l
अब वह चुपचाप मोबाइल में खोया बैठा है, यह उम्मीद करते हुए कि किसी भी क्षण कोई बड़ा ऑफर क्लिक हो जाएगा और उसके जीवन का अर्थ बदल देगा।
ऑनलाइन गेम्स, लॉटरी, जुआ और सट्टा—सब घर बैठे उपलब्ध है। इस पीढ़ी का खास ख़याल रखा गया है—उन्हें हरदम ‘ऑक्युपाइड’ रखने और उनकी ऊर्जा को किसी दिशा में मोड़ने का कर्तव्य कंपनियों ने उठा रखा है।
उधर, मेरा रिचार्ज दस दिन बाद खत्म होने वाला है—इसका संदेश रोज़ आ रहा है।
इस बार कुछ लुभावने ऑफर भी जुड़े हुए हैं।
कुछ बैंक वाले मुझे लोन देने पर तुले हुए हैं—रोज़ अलग-अलग नंबर से कॉल कर रहे हैं।
उन्हें पता है कि उनका नंबर मैं ब्लॉक कर दूँगा—और ऐसा करने वाला मैं अकेला नहीं हूँ।
क्रेडिट कार्ड ऑफर तो जैसे मन मसोसकर मेरी जेब के नज़दीक आने की कोशिश कर रहे हैं।
कई फाइनेंस कंपनियाँ मुझे इंटरेस्ट-फ्री ओवरड्राफ्ट देने को तैयार हैं।
कुछ कंपनियाँ कार ऑफर कर रही हैं—वो भी छोटी-सी EMI पर।
संदेशों की इस बौछार से मेरा मन-तन सब भीग चुका है—और इस पर रेलवे के गर्म, सुस्त पंखे की धीमी हवा भी किसी तरह का ठंडा अहसास नहीं दे पा रही।
मोबाइल के युग ने आदमी को अकेला कर दिया है या अकेलापन ने आदमी को मोबाइल से जोड़ दिया—फरक करना मुश्किल होता जा रहा है।
कंपनियाँ सब जानती हैं—मेरी कार की EMI, उसकी सर्विस की तारीख—सब मैसेज और कॉल से पहले ही सूचित कर दिया जाता है।
उनके सर्विस सेंटर मेरी कार के लिए पलक-पाँवड़े बिछाए बैठे हैं; उस कार के लिए भी कॉल आता रहता है जिसे बेचे हुए चार साल हो चुके हैं।
मैं कितनी बार बताऊँ कि वह कार अब मेरे पास नहीं—पर कंपनियों को मेरे सच पर हमेशा शंका रहती है।
मेरे भविष्य की चिंता भी कंपनियों ने उठा ली है—सुबह-सुबह कई भविष्यवेत्ता व्हाट्सऐप पर मेरे ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति बताकर मुझे ‘सम्भावित संकट’ से सावधान कर देते हैं।
उधर प्रवचनकर्ताओं का ब्रह्मज्ञान ‘मॉर्निंग कोट’ के नाम पर थोप दिया जाता है।
मस्तिष्क ज्ञान से ओवरलोडेड हो चुका है, पर लाइन में खड़े रहने के अलावा और कोई विकल्प भी तो नहीं।
फिर भी—
इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की लाइफलाइन वही है जो हर जगह लगी लाइनों में धड़कती है।
और उन लाइनों में वक्त काटने का इससे बेहतर साथी, यह जेब में रखा छोटा-सा मोबाइल… सच कहूँ, अभी तक किसी ने नहीं खोजा।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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