“नाम में क्या रखा है? — बहुत कुछ रखा है!”
भाईसाहब, “वॉलपेपर मिल जाएगा?”
“आपके यहाँ प्रेग्नेंसी शूट होता है?”
ऐसे ही दार्शनिक, सांस्कृतिक और कभी-कभी पारिवारिक मूल्यों को झकझोर देने वाले प्रश्न महीने में दस–पंद्रह बार मेरे फोन पर अज्ञात नंबरों से प्रकट होते रहते हैं। अब आप सोच रहे होंगे—“ये वही डॉक्टर-लेखक मुकेश जी हैं ना? इन्होंने कब से ‘वॉलपेपर एवं वंश-वृद्धि फोटोग्राफी’ का स्टार्टअप खोल लिया?”
मैं भी यही सोच रहा हूँ—कब? कहाँ? और सबसे ज़रूरी—किसके कहने पर?
लेकिन इसमें इन बेचारे कॉल करने वालों का क्या दोष! असली अपराधी तो मेरा नाम है—या यूँ कहिए कि मेरा नाम अब मेरा रहा ही नहीं। आजकल आपका नाम वो नहीं होता जो माता-पिता ने बड़े जतन से रखा था, बल्कि वो होता है जो किसी अज्ञात आत्मा ने अपने मोबाइल में आपको सेव कर रखा है।
एक ज़माना था जब इंसान की तीन मूल ज़रूरतें मानी जाती थीं—रोटी, कपड़ा और मकान। अब चौथी और सबसे खतरनाक ज़रूरत जुड़ गई है—“नाम”।
जब ये तीनों पूरी हो जाएँ, तो आदमी के भीतर एक ही आकांक्षा मचलती है—बस अब नाम हो जाए!
बचपन में माता-पिता नाम रखते समय इतनी गहराई में नहीं जाते थे। उन्हें बस इतना ध्यान रहता था कि नाम पुकारने में गला न फटे और मोहल्ले में चार लोग और उसी नाम के मिल जाएँ तो बच्चा समाज में घुल-मिल जाए।
इसलिए उस दौर में नाम बस ऐसे ही—रेंदा-पेंदा, घसीट्या, कल्लू-मल्लू—चल जाते थे। थोड़ा ज़्यादा ध्यान दिया तो धनसुख, मानसुख, रमफूल, रामप्रसाद… और कुछ परिवारों में तो बच्चों का नाम उनकी संख्या के हिसाब से—दूज्या, तीज्या, चौथ्या, पंच्या।
एकदम लोकतांत्रिक नामकरण प्रणाली!
अब तो आ गया है “यूनिक नामों” का युग। अब बच्चे का नाम ऐसा रखा जाता है कि उसे पुकारने से पहले गूगल ट्रांसलेट की मदद लेनी पड़े। नाम कम, पासवर्ड ज़्यादा लगते हैं—ऊपर से न्यूमेरोलॉजी का तड़का—दो extra ‘a’, तीन extra ‘h’, और अंत में silent ‘k’।
बाप रे बाप! बच्चा स्कूल में नाम लिखते-लिखते ही पास आउट हो जाए।
खैर, मेरी समस्या इन आधुनिक प्रयोगों वाली नहीं है। हम तो 70-80 के दशक के साधारण जीव हैं—जहाँ पहले नाम में ‘राम’ का उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर लोग अपने राम नाम लेने की औपचारिकता पूरी कर लेते थे। फिर आया ‘-ेश’ वाला युग—नामों में एक लय थी—दिनेश, महेश, रमेश… और उसी सुर में मुझे भी “मुकेश” मिला।
कुंडली में धर्मचंद जैसा नाम भी कहीं पड़ा था, पर घरवालों ने दया करके मुझे समाज में चलने लायक “मुकेश” ही रहने दिया।
सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था…
तभी आया—मोबाइल और ट्रूकॉलर का युग!
अब मेरा नाम मेरे नियंत्रण में नहीं रहा।
किसी अज्ञात प्रतिभाशाली व्यक्ति ने मुझे अपने फोन में “HD Wallpaper Fotokart” के नाम से सेव कर रखा है।
और तब से मैं समाज में एक चलता-फिरता फोटो स्टूडियो बन चुका हूँ।
परेशानी तो तब और बढ़ जाती है जब मैं खुद किसी को कॉल करता हूँ और जिसने मेरा नंबर सेव नहीं किया होता, उसके स्क्रीन पर “HD Wallpaper” चमक उठता है। सामने वाला पहले तो मुझे स्पैम समझता है, फिर व्हाट्सऐप पर पूछता है—“Who is this?”
मैं लिखता हूँ—“मैं, डॉ. मुकेश।”
वो सोचते हैं—“ऑनलाइन फ्रॉड का नया तरीका है!”
उन्हें यकीन दिलाना किसी ICU के मरीज को समझाने से भी कठिन हो जाता है।
इधर शादी का सीजन आते ही फोन की घंटी ऐसे बजती है जैसे बारात में बैंड।
“भाईसाहब, हल्दी-मेहंदी का शूट है…”
“डबल पैसे देंगे…”
“ट्रांसपोर्टेशन हम देंगे…”
“आप किस शहर से हैं? प्लीज़ मना मत कीजिए, प्री-वेडिंग शूट है… फोटोग्राफर आख़िरी समय पर धोखा दे गया… हम डेस्टिनेशन पर पहुँच चुके हैं…”
मैं कहता हूँ—“भाई, मैं डॉक्टर हूँ।”
वो थोड़ी देर चुप रहते हैं… फिर धीरे से कहते हैं—
“कोई बात नहीं भाईसाहब, इसमें कौन-सी शर्म की बात है! आजकल तो हर कोई साइड बिज़नेस करता है… वैसे भी डॉक्टरी में अब इतना पैसा कहाँ रहा…”
कुछ तो इतने भावुक हो जाते हैं कि मेरे मना करने पर नाराज़ भी हो जाते हैं—
“यार, धंधा ही तो है… कोई illegal तो नहीं कर रहे हो!”
अब आप ही बताइए—एक नाम के साथ आदमी क्या-क्या बन सकता है!
डॉक्टर से फोटोग्राफर, लेखक से वॉलपेपर डीलर, और कब “प्रेग्नेंसी शूट स्पेशलिस्ट” बन जाऊँ, इसका भी भरोसा नहीं।
मैं तो सोच रहा हूँ कि एक शपथ-पत्र बनवाकर पूरी दुनिया में प्रसारित कर दूँ—
“मैं, डॉ. मुकेश, पूरे होशो-हवास में यह घोषित करता हूँ कि मुझे सिर्फ ‘मुकेश’ नाम से ही जाना जाए।
न मैं वॉलपेपर बेचता हूँ, न प्रेग्नेंसी शूट करता हूँ, न ही किसी ‘फोटोकॉर्ट’ का फ्रेंचाइज़ी हूँ।
मेरा एक ही नाम है—और उसी नाम के साथ जीना-मरना चाहता हूँ।”
लेकिन फिर डर लगता है…
कहीं कोई उस शपथ-पत्र को भी अपने फोन में “Legal Consultancy Service” के नाम से सेव न कर ले! 😄
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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