नाम में क्या रखा है?
“नाम में क्या रखा है?” । आज के समय में अगर कोई व्यक्ति नाम के पीछे हाथ धोकर पड़ा हो, तो उससे यह सवाल पूछने की भूल मत करना। वह तुरंत पलटकर पूछेगा—नाम से तुम्हें क्या एलर्जी है? नाम में ही तो सब कुछ रखा है। आप जो अपना काम धाम छोड़कर इस नाम के पीछे पड़े लोगों के पीछे पड़े हो ,वो नाम का ही सही लेकिन नाम की ऐसी महिमा गान करेगा की आप अपना नाम और काम दोनों अंटी में दबाये भागते फिरोगे ।
कई लोग काम से नहीं , अपने चाचा विधायक के नाम से जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। और कुछ ऐसे भी हैं जो नाम से काम निकलने के चक्कर में पूछते फिरते हैं —“तू जानता नहीं, मेरा बाप कौन है?” नाम सिर्फ परिचय नहीं रहा, धमकाने के काम आ रहा । नाम ने ‘हम और वो’ की गहरी खाई खोद दी है l नाम को ब्रह्म मान लिया गया है। नाम की महिमा के इतने कीर्तन हो चुके हैं कि लोग इकतारा बजाते-बजाते काम करना भूल गए हैं।
सरकारें तो माया हैं—आती-जाती रहती हैं, नीतियाँ पलटती रहती हैं। पर नाम स्थायी है। वही विकास की गारंटी बनकर जनता के गले में ताबीज़ की तरह टँगा हुआ है। बस नाम का जप करो—सब कुछ हो जाएगा। नाम ही विकास है, नाम ही संस्कार है, नाम ही समाधान है।
योजना चली तो नाम का चमत्कार, और नहीं चली तो कोई बात नहीं—नाम बदल दो। दूसरी बार भी न चली? चिंता क्यों—अब उसे संस्कृत में कर दो। थोड़ा वैदिक रंग चढ़ा दो, संस्कृति से जोड़ दो। योजना नहीं चली तो क्या हुआ, पवित्र तो हो गई। और पवित्र चीज़ों पर सवाल उठाना वैसे भी उचित नहीं माना जाता। फिर क्या—योजना को देवता की तरह प्रतिष्ठित कर दिया जाएगा। फूल-माला चढ़ेगी, साल में एक मेला लगेगा, और योजना शहीद घोषित होकर अमर हो जाएगी।
अब आप शेक्सपीयर को ले आये बीच में । उन्होंने कहा था—गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, उसकी खुशबू वही रहती है। पर हमने गुलाब का नाम बदल दिया और उसकी खुशबू इत्र की शीशी में बंद कर दी। बस अब तो खुश न ।
अब सरकार को देखिए। बिना करनामों के भी सरकार कहलाने की पूरी आज़ादी है। गरीबी हटाना, बेरोज़गारी मिटाना, महँगाई पर लगाम कसना—ये सब बड़े क्रूर काम हैं। संवेदनशील सरकार भला इस तरह समस्याओं को कैसे ठिकाने लगाए? यह तो गुंडागर्दी हो जाएगी। इसके मुक़ाबले नाम बदलना कहीं ज़्यादा सभ्य, शालीन और सस्ता उपाय है। नाम बदला, काम समाप्त। बस साइनबोर्ड बदल दीजिए। चाहें तो किसी ऐतिहासिक पुरुष की तस्वीर भी टाँग दीजिए साथ में ।
यह नामकरण उद्योग है, मित्र—देश का सबसे सफल स्टार्टअप। योजनाएँ पहले पैदा नहीं होतीं, पहले उनका नामकरण होता है। नाम ऐसा कि ग्रह-दशाएँ सुधर जाएँ। फिर काग़ज़ों में दबी सड़कें ज़मीन पर उतर आएँ, सूखे नलों में पानी आ जाए, जंग लगे तारों में बिजली दौड़ने लगे, अस्पतालों में दवाइयाँ और प्राणवायु भर जाए। समस्याओं पर नाम की तलवार चलाओ—समस्या खुद ही आत्महत्या कर लेगी।
नाम के नए कपड़े पहनते ही योजना जवान, सुंदर और राष्ट्रवादी दिखने लगती है। काम चाहे पुराना और घिसा-पिटा हो, पर नाम चमकदार हो—जैसे पुराने इंजन में नए मॉडल की प्लेट लगा दी जाए और उम्मीद की जाए कि खड़खड़ाहट बंद हो जाएगी।
असल समस्या यह नहीं कि मुद्दे पुराने हैं, समस्या यह है कि मुद्दों को ढोना भारी पड़ रहा है। मुद्दों के नाम बदलकर देखिए—वे भी राजदुलारे हो जायेंगे । बेरोज़गारी को रोज़गार नहीं दिया जा सकता, लेकिन उसका नाम बदला जा सकता है। महँगाई कम नहीं की जा सकती, पर उसे “वैश्विक परिस्थिति” कहकर अंतरराष्ट्रीय मंच के माथे मंडा जा सकता है।
दान में मिली बछिया के दाँत नहीं गिने जाते। योजना हाथ आई है न—काम मत देखिए, नाम देखिए। नाम सुनिए, भावुक होइए, ताली बजाइए और अगली घोषणा का इंतज़ार कीजिए।
राजनीतिक पंडित सलाह देते हैं—नाम में राष्ट्र, इतिहास, विरासत और संस्कृति का पूरा मसाला होना चाहिए। नतीजे की ज़रूरत नहीं। नतीजे आँकड़ों में गुम हो जाते हैं, नाम पोस्टरों में चमकता रहता है।
राम से ज़्यादा राम का नाम पूजनीय हो गया है। कर्म से ज़्यादा कीर्तन बिकता है। काम करने वाले पसीना बहाते हैं, इतिहास नाम रखने वाले लिखते हैं।
नाम बदलेंगे तो अंजाम बदलेगा—यह आज का अटल विश्वास है। किसी को गिराना हो, उसका नाम बदल दो। इतिहास अब किताबों में नहीं, नामपट्टिकाओं पर लिखा जा रहा है।
और अगर समस्याएँ अब भी खड़ी हैं, तो क्या हुआ—कम से कम उन्हें नाम का कंबल तो ओढ़ा दो। इस दौर में नाम साधन नहीं, साध्य है। नाम छूट गया ,काम भाग गया है । नाम भागते भूत की लंगोटी ही सही हम पकडे हुए हैं ।
Comments ( 0)
Join the conversation and share your thoughts
No comments yet
Be the first to share your thoughts!