नाग पंचमी हर पल: दूध पिलाने की परंपरा पर एक तीखा व्यंग्य गीत
जब विश्वास के बदले बार-बार विष मिले, तो प्रश्न साँपों से नहीं—दूध पिलाने वालों से भी पूछा जाना चाहिए। इसी सामाजिक विडंबना को स्वर देता है नया व्यंग्य गीत “नाग पंचमी हर पल”। नागपंचमी के परिचित प्रतीकों—नाग, दूध, विष, फुफकार और केंचुली—के माध्यम से यह रचना अवसरवाद, छल और बार-बार दोहराए जाने वाले अंधविश्वास पर करारा कटाक्ष करती है।
▶️ पूरा गीत YouTube पर सुनें: नाग पंचमी हर पल – दूध पिलाया, विष ही पाया
यह केवल नागपंचमी का गीत नहीं है
गीत का मुखड़ा पहली ही पंक्ति में अपनी बात साफ कर देता है:
नाग पंचमी हर पल, हर दिन
मनाते आए हैं,
हम साँपों को दूध हमेशा
पिलाते आए हैं।
यहाँ “साँप” किसी जीव विशेष का नाम नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति का प्रतीक है। वह प्रवृत्ति जो भरोसा पाकर भी धोखा देती है, संरक्षण पाकर भी डसती है और समय आने पर रंग या केंचुली बदल लेती है। हम जीवन में कई बार ऐसे लोगों और व्यवस्थाओं को अपने विश्वास, समर्थन तथा संसाधनों का “दूध” देते रहते हैं, जिनसे बदले में हमें पीड़ा ही मिलती है।
इसीलिए शीर्षक में आया “हर पल, हर दिन” महत्वपूर्ण है। रचना संकेत करती है कि नागपंचमी केवल वर्ष में एक दिन नहीं मनाई जाती; प्रतीकात्मक रूप से हम इसे तब-तब मनाते हैं, जब किसी छल को पहचानने के बाद भी दोबारा उसी पर विश्वास कर लेते हैं।
श्रद्धा के बदले डसने का प्रसाद
पहले अंतरे में आस्था और अनुभव के बीच का विरोधाभास उभरता है:
शंकर का आभूषण समझा,
पूजा सच्चे मन से,
डसने का प्रसाद मगर हम
पाते आए हैं।
शिव के गले का नाग भारतीय संस्कृति में शक्ति, नियंत्रण और निर्भयता का प्रतीक है। लेकिन गीत धार्मिक आस्था पर प्रश्न नहीं उठाता; वह उस मानवीय भूल पर व्यंग्य करता है जिसमें हम हर विषैले व्यवहार को पवित्रता का आवरण देकर स्वीकार कर लेते हैं। सच्चे मन से की गई पूजा जब बदले में “डसने का प्रसाद” दे, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।
धोखा बार-बार मिले तो वह चेतावनी है
गीत आगे कहता है:
इन्होंने विष ना छोड़ा अब तक,
ना छोड़ी अपनी रीति,
बार-बार के धोखे हमको
समझाते आए हैं।
व्यंग्य की धार यहाँ और तीखी हो जाती है। बार-बार मिलने वाला धोखा केवल दुर्भाग्य नहीं होता; वह व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था की वास्तविक प्रकृति का प्रमाण भी हो सकता है। फिर भी समाज चेहरे बदलने को चरित्र बदलना समझ बैठता है। यही हमारी सामूहिक भूल है—हम पुराने विष को नई पैकिंग में पहचान नहीं पाते।
बिल किसी का, अधिकार किसी और का
रचना की सबसे चुटीली पंक्तियों में से एक है:
खुद ना खोदें बिल ये अपना,
यह इनका काम नहीं,
चूहों के घर पर अपना हक
जमाते आए हैं।
इन पंक्तियों में परजीवी अवसरवाद का सटीक चित्र उपस्थित होता है। श्रम कोई और करे, व्यवस्था कोई और बनाए और लाभ पर अधिकार कोई तीसरा जमा ले—यह दृश्य राजनीति से लेकर कार्यालय, संस्था और सामाजिक जीवन तक अनेक जगह दिखाई देता है। हास्यपूर्ण शब्दों में कही गई बात भीतर तक चुभती है, और यही सफल व्यंग्य की पहचान है।
रंग अनेक, विष एक
गीत जाति, वर्ग, दल या बाहरी पहचान से आगे बढ़कर मूल प्रवृत्ति को लक्ष्य बनाता है:
भिन्न-भिन्न हैं जाति-प्रजाति,
भिन्न-भिन्न हैं रंग,
विष लेकिन एक-सा सब पर
आजमाते आए हैं।
अवसरवाद अलग-अलग वेशों में सामने आ सकता है। चेहरे, झंडे, भाषा और दावे बदल सकते हैं, लेकिन यदि आचरण शोषण और छल का है तो परिणाम वही रहता है। इस अर्थ में गीत किसी एक व्यक्ति या समूह का आरोप-पत्र नहीं, बल्कि सार्वजनिक और निजी जीवन में मौजूद विषैली मानसिकता पर व्यापक टिप्पणी है।
बधाई में छिपा करारा कटाक्ष
अंतिम अंतरे की कथित “बधाई” वास्तव में व्यंग्य का सबसे तीखा प्रहार है:
नागों को भी आज बधाई,
उनके सभी भक्तों को,
व्यग्र भाव से तुमने पूजा,
वे फुफकारते आए हैं।
यहाँ प्रश्न केवल डसने वालों से नहीं, उन्हें बार-बार प्रतिष्ठा और संरक्षण देने वालों से भी है। कोई भी विषैली व्यवस्था अकेले नहीं फलती; उसे मौन स्वीकृति, अंधसमर्थन और लाभ की आशा में पूजा करने वाले “भक्त” भी मजबूत बनाते हैं।
आधुनिक संगीत में व्यंग्य की नई अभिव्यक्ति
गीत की संगीत-शैली पारंपरिक नागपंचमी धुन की सीधी पुनरावृत्ति नहीं करती। इसमें moody alt-pop, नियंत्रित post-punk tension, धड़कता bass, muted kick, dry snare, atmospheric electric guitar और dark synth textures का आधुनिक संसार है। इसके साथ बीन, बाँसुरी, खंजरी, खड़ताल और ढोलक के संकेत गीत को भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़े रखते हैं।
बीन की व्यंग्यात्मक धुन और अचानक आने वाला विराम शब्दों में छिपी फुफकार को संगीत में बदल देते हैं। आधुनिक और लोकधर्मी वाद्यों का यह मेल रचना को केवल उत्सवी गीत नहीं रहने देता; इसे एक समकालीन सामाजिक टिप्पणी बना देता है।
अंतिम प्रश्न हमारे लिए है
गीत के अंत में आने वाली पंक्ति पूरी रचना का निष्कर्ष बन जाती है:
जितना हमने दूध पिलाया,
उतना विष ही पाए हैं…
यदि विश्वास का उत्तर लगातार विश्वासघात हो, तो केवल डसने वाले को दोष देकर बात पूरी नहीं होती। हमें यह भी देखना होगा कि हम किसे दूध पिला रहे हैं, क्यों पिला रहे हैं और पिछला अनुभव जानने के बाद भी वही भूल क्यों दोहरा रहे हैं।
“नाग पंचमी हर पल” मनोरंजन के साथ आत्ममंथन कराता है। इसकी फुफकार किसी साँप की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना की आवाज है।
🎧 पूरा व्यंग्य गीत सुनिए: YouTube पर “नाग पंचमी हर पल” देखें
गीत सुनने के बाद अपनी प्रतिक्रिया अवश्य लिखें—क्या हम सचमुच साँपों को पहचान नहीं पाते, या पहचानकर भी दूध पिलाते रहते हैं?
स्वर: विशम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’
गीतकार एवं रचनात्मक परिकल्पना: डॉ. मुकेश ‘असीमित’
प्रस्तुति: Dr Mukesh Aseemit Creations | Music with Mukesh
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