🌼 नव संवत्सर गीत 🌼
नव संवत्सर मंगलमय हो,
जन-जन में नव ऊर्जा संचय हो।
छंटे कुहासा, सूरज निकले,
मन का हर अंधकार पिघले।
अरुण किरण जब धरती छू ले,
जीवन का हर पथ फिर फूलें।।
नयी कोंपलें फूटें वन में,
रस बरसे हर एक कण-कण में।
खलिहानों में गंध सुनहरी,
हँसी गूँजे हर देहरी।।
कंठों में मधुरिम स्वर लय हो,
नव संवत्सर मंगलमय हो।।
शब्दों का सच्चा नूर बहे ,
झूठ-प्रपंच सब दूर रहे ।
धर्म बने मानवता का सूरज ,
लहराये स्वर्णिम भगवा ध्वज ।
गुरु ग्रंथों में प्रेम उजाला,
हर दिल ओढ़े प्रेम की माला ।।
मंदिर, मस्जिद, गिरजा सारे,
बनें प्रेम के पावन द्वारे।
कट्टरता का हर पल क्षय हो,
नव संवत्सर मंगलमय हो।।
सूरज रश्मि तम भगाए ,
विवेक बुद्धि राह दिखाए।
खुशहाली हर गाँव नगर में,
शुद्ध हवा हो हर एक घर में
जड़ता न रोके जीवन गति को,
सुगम बनाएं हर इक पथ को।।
हिंदी का मान बढ़े जग में,
आत्मबोध का राग हर रग में।
भाषा में फिर से सहज विनय हो,
नव संवत्सर मंगलमय हो।।
लेखक मन से लिखना सीखें,
सरोकार शब्दों में दीखें।
आत्मबोध आलोकित सारे ,
भावों के दीपक उजियारे ।
भाषा में शुचिता फिर आए,
साहित्य नया मार्ग दिखाए।।
जुल्म ना कोई सत्ता का सहना ,
सत्य बने हर लेखन का गहना।
स्वर में निर्भयता का उदय हो,
नव संवत्सर मंगलमय हो।।
धरती हँसे, गगन मुस्काए,
हर प्राणी सुख-शांति पाए।
नव विचारों का संचार हो,
हर जीवन नव विस्तार हो।
मन से मन का सेतु बने फिर,
वसुधा एक कुटुंब लगे फिर।।
राग-द्वेष सब दूर तलक हो ,
उजास उर्जित हर फ़लक हो ।
हर दिन नव आरंभमय हो,
नव संवत्सर मंगलमय हो।।
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