हे शंभो! शत्रु का विनाश करो!
एक नेताजी, भोलेनाथ के अनन्य भक्त, का चुनावी रणभूमि में प्रवेश करने से पहले शंकर भगवान को लगाए गया प्रार्थना पत्र लीक हो गया… पब्लिक डोमेन में आ गया…
पढ़िए उनका प्रार्थना पत्र, जो अर्ज़ी उन्होंने शंकर भगवान को लगाई…
ॐ नमः शिवाय!
हे नटराज, हे त्रिपुरांतक, हे शब्दब्रह्म के अधिष्ठाता!
मैं, लोकसभा का वानरवीर,
अपने आख़िरी अस्त्र — “प्रार्थना पत्र” को लेकर आया हूँ।
वोट बिना आपके वरदान के संभव प्रतीत नहीं होता, शंभो… त्राहिमाम… त्राहिमाम!
हे शिव! हे नीलकंठ! इस लोकसभा चुनाव में मैं बार-बार हारा हूँ, पर हार मानना मेरी प्रवृत्ति नहीं है। यह तो तुम्हारा ही वरदान है —
“ज्यों-ज्यों संकट बढ़त है, त्यों-त्यों बल मन में आत है!”
अब मैं तुम्हारी शरण में हूँ। हे नटराज! नृत्य करो — ऐसा नृत्य जो विरोधियों की मेरुदंड हिला दे।
हे भोलेनाथ! रुद्र, नटराज, भैरव, त्रिपुरांतक, महाकाल! तुम गजानन के पिता हो, बुद्धि के स्वामी!
तो सुनो, ये मेरे शत्रुओं की सूची —
जिन पर तुम्हारे त्रिशूल की धार चाहिए:
पहला शत्रु है – ‘जनता की स्मृति’।
इतनी महँगाई में भी पता नहीं क्या बादाम खाती है कि स्मृति इसकी इतनी तेज़ है — मेरे सारे कुकर्मों को भूलती ही नहीं।
हे भोलेनाथ! तुम तथ्यों के तांडव से इस जनता की स्मृति को झकझोर दो।
विस्मृति की भभूति से इनकी मति हर लो प्रभो!
दूसरा शत्रु है – ‘लोकपाल की आत्मा’।
वो बार-बार मेरे घोटालों के नीचे से निकलकर चिल्लाती है — “जाँच चाहिए!”
उसे तुम अपने त्रिनेत्र की ज्वाला से जला दो।
उसे “योजना जाँच आयोग” के चक्रव्यूह में फँसाकर ऐसा सम्मोहित करो कि वह स्थायी नींद में सो जाए।
तीसरा शत्रु है – ‘ईमानदार अफ़सर’।
हे महादेव! उन्हें ऐसे विभागों में पदस्थ करो, जहाँ वे फाइलें उलटते रहें, लेकिन कोई निष्कर्ष न निकाल सकें।
उन्हें ‘नोटशीट’ में बाँध दो।
उन्हें अप्सरा सरीखी ‘पीए’, विदेशी भ्रमण का तामझाम और शॉपिंग मॉल के डाटा से लबरेज़ कर दो, कि उन्हें फुर्सत ही न मिले।
चौथा शत्रु है – ‘न्यायपालिका का विवेक’।
हे शंभो, हे नटराज! इसे भ्रमित कर दो — तर्कों के दायरे में इतना उलझा दो कि निर्णय की घड़ी कभी आए ही नहीं।
उसे “स्थगन आदेश” की तपस्या में लीन कर दो।
उसकी तराज़ू में “नकद और वस्तु” का वज़न भर दो।
पाँचवाँ शत्रु है – ‘डिबेटवीर एंकर’।
हे पशुपतिनाथ!
ये एंकर अब नारद नहीं, दु:शासन से हो गए हैं —
जो मेरे चरित्र का चीर-हरण कर रहे हैं।
तुम्हारे डमरु से उनका माइक चुप कराओ!
मंत्र: “ॐ वाक्-चाल-विनाशकाय नमः”
हे कालों के काल!
अब मेरे पास सिर्फ़ तुम हो —
मेरे वोट बैंक बिखर रहे हैं,
मेरा जातीय समीकरण रिस रहा है,
मेरे घोषणा-पत्र पुंगिया बनकर उड़ाए जा रहे हैं।
हे नटराज!
तुम्हारा तांडव ही अब मेरी आशा है।
मेरे शत्रु अब शकुनि की चालों से भी तेज़ हैं —
कोई जातीय समीकरण में उलझाता है,
कोई महिला आरक्षण के नाम पर मेरा पुरुषार्थ लूटता है।
हे भूतभावन, रुद्र, महाकालेश्वर!
राजनीति अब कुरुक्षेत्र नहीं रही,
यह अब सोशल मीडिया की मायावी लीला है।
🌑 हे शिव!
तुम नीले कंठ वाले हो,
हर विष को पी जाने वाले।
अब मेरा विष ये जनादेश है,
जिसमें वोट कम, सवाल ज़्यादा हैं।
तुम्हारे बिना इस लोकतंत्र का तांडव अधूरा है।
तुम्हारे बिना मेरे घोषणा-पत्र सिर्फ़ पन्ने हैं।
तुम्हारे तांडव से ही विपक्ष विचलित होगा,
और मेरी कुर्सी — स्थिर।
हे शिव! हे पशुपति! हे त्रिपुरांतक!
अब तुम ही मुझे “इलेक्ट्रॉनिक मतदाता मशीन” में गड़बड़ी का वरदान दो।
मेरे प्रचार में वह ‘दैविक लहर’ चलाओ जिसकी कोई व्याख्या न हो।
मेरे हर झूठ को आधा सच बनाओ और हर सवाल पूछने वाले को ‘देशद्रोही’ घोषित करो।
हे भोलेनाथ!
मेरे लिए ‘धर्म’ को हथियार बनाओ,
‘राष्ट्र’ को कवच बनाओ,
‘टेलीविजन बहसों’ को युद्धभूमि बनाओ,
‘एंकरों’ को मेरे लिए अर्जुन बनाओ —
जो मेरे लिए लड़ें, भिड़ें, लठियाएँ, गालियाँ दें।
हे शिव! हे नटराज! हे त्रिपुरांतक!
हर-हर बम बम!
मेरे नाम का जयघोष हो,
मेरे विरोधियों की ज़ुबान सूख जाए,
और मेरी सभा में जनता वैसे ही झूमे —
जैसे काशी में सावन झूमता है।
हे त्रिपुरारी! इसीलिए मैं कहता हूँ —
मतदाताओं को मोहित करो,
विपक्षियों को विमूढ़ करो,
और मेरी गद्दी फिर से स्थापित करो!
हे विश्वनाथ!
सर्वसंहारी!
तुम तो चराचर की समस्त मति के स्वामी हो।
मुझे इस माया में भ्रष्टाचार की माया का मेवा प्रदान करो।
मेरे पापों को ‘सेवा योजना’ में
और विपक्ष के पापों को ‘घोटाला’ में बदल दो।
ॐ नमः शिवाय।
— आपका सेवक,
नागराज वोटेश्वरानंद
चुनाव क्षेत्र क्रमांक 420 से
भावी प्रत्याशी
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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