सड़कों से गायब हुए फुटपाथ : अतिक्रमण पर आँख बंद करके बैठा प्रशासन
भारत के शहरों में फुटपाथों का गायब होना सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि शहरी नियोजन की विफलता और सामाजिक असमानता का प्रतीक बन चुका है।
India Ki Baat
भारत के शहरों में फुटपाथों का गायब होना सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि शहरी नियोजन की विफलता और सामाजिक असमानता का प्रतीक बन चुका है।
होरमुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जिसके बंद होने से तेल कीमतों में भारी वृद्धि, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और विशेष रूप से ऊर्जा आयातक देशों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
बीमारी से ज्यादा थका देने वाला होता है रिश्तेदारों का हाल-चाल महाकुंभ—जहाँ हर कोई डॉक्टर भी है, जज भी और जांच अधिकारी भी।
क्या राम केवल एक ऐतिहासिक पात्र हैं या हमारे भीतर की एक चेतना? यह लेख राम को देह से तत्व तक समझने की एक गहन यात्रा है, जो बताता है कि राम किसी धर्म तक सीमित नहीं बल्कि मानवता की सर्वोच्च संवेदनशील अवस्था हैं।
धुरंधर फिल्म अंडरकवर एजेंट्स की उस सच्चाई को सामने लाती है, जिसे सिनेमा अक्सर नजरअंदाज कर देता है। आदित्य धर ने यहाँ मिशन नहीं, बल्कि उस मनुष्य की यात्रा दिखाई है, जो दर्द, अन्याय और संघर्ष से गुजरकर एक ऑपरेटिव बनता है। यह फिल्म ग्लैमर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और त्याग की कठोर सच्चाई कहती है।
“मक्खनमहापुराण” चापलूस्योपनिषद् का उत्तर-आधुनिक संस्करण है, जहाँ प्रशंसा और चाटुकारिता के बीच की महीन रेखा पर तीखा व्यंग्य किया गया है। यह रचना दिखाती है कि कैसे ‘मक्खनयोग’ आज के दफ्तर, साहित्य, राजनीति और सामाजिक जीवन का अनिवार्य शास्त्र बन चुका है—जहाँ योग्यता से ज्यादा ‘लोचदार जीभ’ और सही समय पर किया गया लेपन ही सफलता की असली कुंजी है।
आज का मंचीय कवि सम्मेलन कविता का नहीं, प्रदर्शन का उत्सव बन गया है—जहाँ कविता घूंघट में सिमटी रहती है और चुटकुले, अभिनय और जुगाड़ का नाच चलता रहता है।
आज का बच्चा कहानियों से नहीं, एल्गोरिद्म से सीख रहा है। क्या हम सुविधा के नाम पर उसके भावनात्मक विकास से समझौता कर रहे हैं?
“भाइयो-बहनो, आज अगर हम रपट जाएँ… तो हमें न उठइयो।” लोकतंत्र के इस विचित्र महोत्सव में हर वर्ग अपनी-अपनी शैली में फिसल रहा है—कोई वादों पर, कोई सच्चाई पर, कोई सिद्धांत पर… और आम आदमी, वह तो रोज़ की आदत से फिसल ही रहा है।
कृत्रिम मेधा शिक्षा को तेज़, व्यक्तिगत और सुलभ बना रही है, लेकिन इसके साथ ही रचनात्मकता, नैतिकता और समानता जैसी चुनौतियाँ भी सामने आ रही हैं। इस बदलते दौर में शिक्षक की भूमिका समाप्त नहीं, बल्कि और अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है—एक मार्गदर्शक और संवेदनशील निर्माता के रूप में।