पराधीनता का प्रश्न

पराधीनता का प्रश्नइतिहास का नहीं, मानसिकता का

“भारत बार-बार पराधीन क्यों हुआ?”—यह सवाल सुनते ही हमारे भीतर एक तैयार-सा उत्तर उठता है: “बाहरी आक्रमणकारी ताक़तवर थे… हमारे पास हथियार नहीं थे… हमारी सेनाएँ कमज़ोर थीं… हम तकनीक में पीछे थे…”। ये सारे उत्तर आंशिक रूप से सही हैं, पर पूर्ण नहीं। क्योंकि दुनिया में बहुत-से देश रहे हैं जिनके पास संसाधन कम थे, फिर भी उन्होंने अपने समाज के भीतर एक ऐसी एकता, विवेक और आत्मसम्मान बनाया कि बाहर की तलवार उन्हें लंबे समय तक झुका नहीं सकी। दूसरी तरफ़, कुछ सभ्यताएँ ऐसी भी रही हैं जिनके पास ज्ञान-परंपरा, संस्कृति और जनसंख्या—सब कुछ था; फिर भी वे धीरे-धीरे भीतर से खोखली हुईं और बाहर की छोटी-सी कील ने भी बड़े दरवाज़े उखाड़ दिए।

इस विमर्श का मूल उद्देश्य यही है कि हम जानें : गुलामी तलवार से नहीं आती, गुलामी भीतर की कमजोरियोंसे आती है। जब समाज के भीतर दरारें पहले से मौजूद हों—आपसी फूट, भाग्यवाद, जातीय/सांप्रदायिक कटाव, कर्मकांड-केंद्रित धर्म, अंधश्रद्धा, ज्ञान-विमुखता—तो बाहर वाला बस उन दरारों में “वेज” (कील) डालकर उन्हें चौड़ा कर देता है। फिर गिरने के लिए बहुत ज़ोर नहीं लगाना पड़ता; वैसे ही जैसे दीमक-लगा वृक्ष हल्के धक्के से ढह जाता है।

इस लेख को मैंने कई हिस्सों में बाँटा है, ताकि एक  सतत, संवाद-सा बहाव बना रहे। लक्ष्य यह नहीं कि हम किसी एक कालखंड को दोषी ठहराएँ; लक्ष्य यह है कि हम अपने आज को पहचानें—क्योंकि पराधीनता का सबसे खतरनाक रूप वही है जो स्वतंत्रताके भ्रम में पलता है।

1) हम बाहर से नहीं, भीतर से हारे

हमारे मन में “हार” का अर्थ अक्सर मैदान में हुई हार होता है—सेना पराजित हुई, राजधानी गिर गई, संधि हो गई। लेकिन असली हार उससे बहुत पहले शुरू हो जाती है—जब समाज की आत्मा अपनी साझा सच्चाई खो देती है। बाहर की हार तो अंतिम दृश्य है, उस हार का जिसकी पटकथा बहुत पहले भीतर की हार ने लिख दी  है।

भीतर की हार की पहली पहचान है: आपसी लड़ाई को स्वाभाविक मान लेना। जब एक देश—भाषा, बोली, वेश, खान-पान, रीति, पूजा-पद्धति, जातीयताओं की अद्भुत विविधता के साथ—खुद को एक “साझी पहचान” में नहीं बाँध पाता, तो  आपसी लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं रहती, सांस्कृतिक बन जाती है। तब हर समूह अपनी छोटी-सी पहचान को “अंतिम सत्य” मानने लगता है। राजनीति बाद में आती है; पहले मन बँटता है। और जब मन बँट जाए, तो सेना का बँटना तो केवल औपचारिकता रह जाती है।

भीतर की हार की दूसरी पहचान है: सत्य की जगह मान्यताका राज। विविधता वाले देश में साझा मूल्य क्या हो सकता है? भाषा साझा नहीं, भोजन साझा नहीं, पूजा साझा नहीं, पहनावा साझा नहीं—तो साझा क्या? एक ही चीज़ साझा हो सकती है: Truth—सत्य का सम्मान। पर जब सत्य की जगह “हमारी कथा,” “हमारी मान्यता,” “हमारा रिवाज,” “हमारा मुहूर्त,” “हमारी परंपरा”—अन्दर तक घर कर  जाता है, तो समाज भीतर से विवेक-हीन हो जाता है। तब हम झूठ को भी अपना मानकर बचाते हैं, और सच को भी “अपमान”  समझकर ठुकराते हैं। यह वह क्षण है जब गुलामी बाहर नहीं—अंदर प्रवेश कर जाती है।

भीतर की हार की तीसरी पहचान है: आत्मसम्मान का क्षरण। आत्मसम्मान कोई नारा नहीं; यह वह क्षमता है जिससे व्यक्ति कह सके: “मेरी तक़दीर मैं तय करूँगा।” लेकिन अगर व्यक्ति का मन पहले ही मान चुका हो कि उसकी तक़दीर कहीं और लिखी है—ग्रहों में, पिछले जन्म में, किसी अदृश्य सत्ता की इच्छा में—तो वह अपने ही जीवन को “अपना” नहीं मानता। और जो अपने जीवन को अपना नहीं मानता, वह देश को भी अपना नहीं मान पाता। फिर वह कह देता है: “ठीक है, नया मालिक आ गया—उसके आदेश भी मान लेंगे।” यही भीतर की हार है—जिसके बाद बाहर की जीत बहुत आसान हो जाती है।

भीतर की हार की चौथी पहचान है: ज्ञान से विमुखता। ज्ञान केवल किताब नहीं, ज्ञान वह चेतना है जो पूछती है, जाँचती है, तर्क करती है, प्रमाण माँगती है। जब समाज ज्ञान को “अहंकार” कहकर, जिज्ञासा को “अश्रद्धा” कहकर, प्रश्न को “पाप” कहकर  उसे मरने देता  है—तब वह अपने ही भविष्य का गला घोंट देता है। और फिर इतिहास के पन्नों में केवल “कब आक्रमण हुआ” नहीं लिखा जाता—“कब समाज ने पूछना छोड़ा” भी लिखा जाता है; बस हम इन बिटवीन लाइन पढ़ते नहीं।

2) भारत क्यों नहीं लड़ पाया?

यह सवाल जितना इतिहास का है, उतना मनोविज्ञान का भी है। एक देश लड़ता क्यों है? सिर्फ हथियारों के लिए नहीं—पहले यह विश्वास चाहिए कि हम कर सकते हैं। और यह विश्वास तब आता है जब मनुष्य खुद को समर्थ मानता है, अपनी बुद्धि पर भरोसा करता है, अपने निर्णय को अपना मानता है।

यहाँ “फेटलिज़्म”—भाग्यवाद—एक निर्णायक कारक होता  है। अगर धर्म का स्वर ऐसा हो जाए कि वह कहे: “जो हो रहा है, वही होना था… यह तुम्हारे कर्मों का फल है… यह ईश्वर की इच्छा है…” तो संघर्ष की चिंगारी पहले ही बुझ जाती है। कोई क्रांति तब होती है जब व्यक्ति कहे: “यह अन्याय है, और इसे बदला जा सकता है।” पर भाग्यवाद कहता है: “यह अन्याय नहीं, यह व्यवस्था है। सह लो। सिर झुका लो।”

इतिहास में अकाल, कर-नीतियाँ, शोषण, दमन—इन सब पर प्रतिक्रिया कहाँ गई? जब समाज की चेतना “दैव-प्रकोप” का लेबल चिपका देती है, तब शासन की नीतियाँ भी प्रकृति की आपदा लगने लगती हैं। फिर लोग मरते हैं, और समाज कहता है—“उनके पाप कट गए।” यह वाक्य “धार्मिक” रूप से आपको एक आत्म संतुष्टी दे सकता है लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद ही खतरनाक है; क्योंकि वह सत्ता को उत्तरदायित्व से मुक्त कर देता है। और जिस समाज में सत्ता उत्तरदायी न रहे, वहाँ पराधीनता एक दिन बाहर से नहीं, भीतर से ही पैदा हो जाती है।

भाग्यवाद का दूसरा रूप है—ज्योतिष-केंद्रित जीवन। हाथ की रेखा, कुंडली, मुहूर्त, ग्रह-दशा—ये सब, आधुनिक शब्दों में, व्यक्ति की आजादी छीन लेते हैं। वे कहते हैं: “तुम्हारे निर्णय का मूल्य नहीं, किसी बाहरी गणना का मूल्य है।” और जब यह सोच समाज का सामान्य व्यवहार बन जाए, तब लोकतंत्र भी केवल वोट की रस्म रह जाता है। लोकतंत्र का अर्थ है—“मैं जानता हूँ, मैं चुनूँगा, मैं जिम्मेदार हूँ।” लेकिन अगर व्यक्ति का विश्वास ही यह हो कि “मेरी तक़दीर किसी और के पास है,” तो वह प्रतिनिधि भी उसी तरह चुनता है जैसे मुहूर्त चुनता है—किसी विवेक से तो  नहीं, हाँ  किसी भय या लोभ से अवश्य ।

और लड़ाई केवल सेना नहीं लड़ती, समाज लड़ता है। सेना तो समाज का शारीरिक रूप है; समाज का मानसिक रूप अगर घुटनों पर है, तो शरीर कब तक खड़ा रहेगा? इसलिए “भारत क्यों नहीं लड़ पाया?” का उत्तर केवल “तकनीक कम थी” नहीं—उत्तर यह भी है कि विरोध की इच्छा को हमने ‘अधर्म’ कहकर, और समर्पण को ‘धर्म’ कहकर स्थापित कर दिया था। यह वही मानसिकता है जो आज भी कई बार अलग रूप में हमारे बीच जीवित दिखती है।

3) हम फिर वही गलती कर रहे हैं

इतिहास का सबसे दुखद पक्ष यह नहीं कि हम हारे; दुख यह है कि हम हार के कारणों को कथाबना देते हैं, बलिदानों की गाथा बना देते हैं लेकिन सबकनहीं। हम स्मारक बनाते हैं, पर मस्तिष्क नहीं बदलते। हम शौर्य-गाथाएँ गाते हैं, पर विज्ञान-गाथा नहीं लिखते। हम भावुक हो जाते हैं, पर विवेकशील नहीं होते।

यहाँ एक बड़ा संकेत है: किसी काल में नेविगेशन, एस्ट्रोनॉमी, मेटलर्जी, इंडस्ट्रियल क्षमता—ये बड़े निर्णायक थे। युद्ध “क्लोज कॉम्बैट” से “आर्टिलरी” और “फायर-पावर” में बदल चुका था, लेकिन भारतीय  समाज का मन “हाथी,” “घोड़े “, “मुहूर्त,” “परंपरा” में अटका रहा। अब आज की दुनिया में “कटिंग-एज” क्या है? AI, सेमीकंडक्टर्स, इंजन-टेक, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, साइबर-डिफेंस, डेटा-इकोनॉमी, रिसर्च-पेटेंट्स। सवाल यह नहीं कि हमारे पास कुछ नहीं है—सवाल यह है कि इन सभी तकनीकों में गैप कितना है। क्योंकि युद्ध और प्रतिस्पर्धा में “विनर टेक्स ऑल” चलता है।जीत और हार में परसेंटेज  नहीं चलता l  पाँच यूनिट का अंतर भी निर्णायक बन जाता है। चुनाव में 100 और 99 का अंतर—एक को सत्ता देता है, दूसरे को शून्य। युद्ध में 80 और 75 का अंतर—एक को जीत देता है, दूसरे को पराधीनता का लंबा अध्याय।

हम अक्सर अपने छोटे-छोटे गर्व के टुकड़ों से अपने बड़े-बड़े अंतर को ढक लेते हैं—“देखो, हमारे पास भी ISRO है… हमारे पास भी तेजस है… हमारे पास भी फलाना है …”। यह गर्व आवश्यक है, पर क्या यह पर्याप्त है ? क्योंकि सवाल “है” का नहीं, “कितना है” और “किस गति से बढ़ रहा है” उसका है। अगर हम मूल कारणों को नहीं बदलेंगे—जिज्ञासा का सम्मान, वैज्ञानिक टेंपर, रिसर्च संस्कृति, प्रश्न-आधारित शिक्षा, उत्पादन-आधारित अर्थव्यवस्था—तो हम “कुछ उपलब्धियाँ” के बावजूद उसी पुराने रास्ते पर बढ़ेंगे जहाँ अंत में वही पुराना परिणाम खड़ा मिलेगा ।

और सबसे खतरनाक बात यह है कि आज उन कारणों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित भी किया जा रहा है—यानी जो चीजें कभी हमारी कमजोरी थीं, वे अब “ग्लैमरस” बन रही हैं। अगर समाज प्रश्न पूछना छोड़कर “मानना” सीख रहा है, अगर अंधविश्वास आधुनिक पैकेजिंग में लौट रहा है, अगर परंपरा को “इनॉवेशन” से ऊपर रखा जा रहा है—तो यह इतिहास का पुनरावृत्ति-क्षण है। गुलामी फिर आए—यह जरूरी नहीं; पर समाज का पतन—यह निश्चित हो जाता है, अगर हम अपनी बुनियादें नहीं बदलते।

4) वैराग्य और आध्यात्मिक बहाने

यह विषय सबसे सूक्ष्म है, क्योंकि यहाँ गलती “धर्म” में नहीं, धर्म के भ्रमित अर्थ में होती है। वैराग्य का अर्थ अक्सर हम कर देते हैं—“दुनिया से कोई लेना-देना नहीं… यह लोक तो सराय है… असली जीवन तो परलोक में है…”। और यही सोच धीरे-धीरे समाज को “इस दुनिया” के तथ्य, नियम, विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक—सब से काट देती है।

मूल प्रश्न सरल है: जिस दुनिया से तुम्हें लेना-देना नहीं, उस दुनिया की लड़ाई तुम कैसे जीतोगे? अगर तुम समुद्र को “माया” कहकर नज़रअंदाज़ करते हो, तो समुद्र पार करने वाला तुम्हें पीछे छोड़ देगा। अगर तुम तारे-ग्रहों को “पूज्य” मानकर बस नमन करते हो, पर उन्हें “नापने” का साहस नहीं करते, तो नेविगेशन करने वाला तुम्हारे तट पर उतर जाएगा। अगर तुम प्रकृति के नियमों को “लीला” कहकर टाल देते हो, तो नियम समझने वाला तुम्हारे संसाधनों पर अधिकार कर लेगा।

यहाँ एक बहुत सुंदर, पर कड़ा वाक्य शायद वैराग्य की परिभाषा के साथ न्याय करे : वैराग्य का मतलब भौतिक से दूरीनहीं, ‘अविवेक से दूरीहै। भौतिक जगत को समझना, उसके नियमों को जानना, उसे बेहतर बनाना—यह वैराग्य के खिलाफ नहीं। वैराग्य का केंद्र “अहंकार” की पहचान है। आत्मज्ञान के बिना वैराग्य केवल पलायन मात्र होकर रहा जता है —दुनिया से नहीं, जिम्मेदारी से पलायन करना । और जब समाज जिम्मेदारी से पलायन करता है, तब कोई दूसरा समाज जिम्मेदारी लेकर आगे बढ़ जाता है—और वही आगे बढ़ना फिर सत्ता  हस्तांतरण का कारण बन जाता है।

आध्यात्मिकता अगर सही अर्थ में हो—तो वह व्यक्ति को अधिक साहसी, अधिक स्पष्ट, अधिक करुणाशील, अधिक विवेकशील बनाती है। पर जब आध्यात्म “बहाना” बन जाए—“क्यों पूछें? क्यों बदलें? क्यों लड़ें? क्यों शोध करें? क्यों कमाएँ? पैसा तो गंदा है…”—तब आध्यात्मिकता एक धीमा जहर बन जाती है। वह समाज की अर्थव्यवस्था को जड़ से काट देती है ; और जहाँ अर्थव्यवस्था नहीं, वहाँ सुरक्षा नहीं। जहाँ उत्पादन नहीं, वहाँ रणनीति नहीं। और जहाँ रणनीति नहीं, वहाँ युद्ध केवल भावनाओं का तमाशा बन कर रह जाता है।

5) भावना से युद्ध नहीं जीते जाते

हम अपनी सांस्कृतिक छवि पर गर्व करते हैं कि “हम भावुक हैं।” भावुक होना मनुष्यता का हिस्सा है, पर अगर भावना विवेक का स्थान ले ले—तो वह मनुष्यता को ही निगल जाती है। युद्ध, प्रतिस्पर्धा, राष्ट्र-निर्माण—ये सब इमोशंस से नहीं, इकोनॉमी और इंडस्ट्री से चलते हैं।

यहाँ एक कटु सत्य को हम भूलें नहीं : लड़ाई “शौर्य” से नहीं जीती जाती; लड़ाई मटेरियल से जीती जाती है। टैंक, फाइटर प्लेन, सबमरीन, गोला-बारूद, सप्लाई-चेन—ये सब उद्योग के उत्पाद हैं। उद्योग बिना अर्थव्यवस्था के नहीं चलता। अर्थव्यवस्था बिना श्रम, रिसर्च, मैन्युफैक्चरिंग, शिक्षा, अनुशासन के नहीं चलती। और अगर समाज यह मान ले कि “पैसा कमाना छिछोरी चीज है,” “मटेरियलिस्ट होना गाली है,” “दुनिया का अन्वेषण अधर्म है”—तो वह अपने ही सुरक्षा-तंत्र की जड़ काट देता है। फिर चाहे वह कितना भी भावुक राष्ट्र-गीत गा लें हम , युद्ध की मशीनरी नहीं बनती इससे  ।

भावना का एक और पक्ष है—रणनीति का अपमान। कई बार इतिहास में हमने “ऑनर,” “इमोशन,” “हर्ट” के नाम पर गठबंधन नहीं बनाए, विकल्प नहीं चुने, व्यावहारिक फैसले नहीं किए। रणनीति कहती है: “जीत के लिए, कभी-कभी असहज समझौता भी करना पड़ता है।” भावना कहती है: “नहीं, मेरे अहं को चोट लगी है।” और फिर परिणाम यह होता है कि अहं तो बच जाता है, देश हार जाता है। यह व्यक्तिगत मनोविज्ञान नहीं, सांस्कृतिक पैटर्न बन जाता है—क्योंकि हम धर्म को ही भावना बना देते हैं: “भगवान तो भाव के भूखे हैं।” जब भाव को परम बना दिया जाए, तो बुद्धि को कौन पूछे?

और याद रखिए—इमोशनलिटी अक्सर “जेनेटिक” नहीं, कल्चरल होती है। एक ही नस्ल-समूह, अलग संस्कृति में पलकर अलग मानसिकता दिखा सकता है। इसका मतलब—हम बदल सकते हैं। पर बदलने के लिए पहले यह स्वीकार करना होगा कि भावना पर्याप्त नहीं; विवेक चाहिए। भावनाएँ शुद्ध हो सकती हैं, पर शुद्धता ज्ञान से आती है। बिना ज्ञान के भावना पाशविक भी हो सकती है—भीड़ की हिंसा, अंध-भक्ति, नफरत, उन्माद—ये भी तो भावना ही हैं। इसलिए राष्ट्र को जीतना है तो भावना नहीं, चेतना चाहिए। चेतना का अर्थ—जानना, समझना, तर्क करना, प्रमाण देना।

6) 1757: असली निर्णायक क्षण

हम सामूहिक स्मृति में अक्सर 1857 को “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहकर केंद्र में रखते हैं—यह भावनात्मक रूप से उचित भी है। पर रणनीतिक इतिहास कहता है कि असली निर्णायक मोड़ कई बार उससे पहले आता है,कई फूट होल्ड  जिन्हें हम विस्मृत कर देते हैं । एक बार किसी बड़ी ताकत को आर्थिक-राजनीतिक आधार मिल जाए, फिर बाद के विद्रोह अक्सर वीरतापूर्ण होते हुए भी असफल हो जाते हैं, क्योंकि खेल का मैदान बदल चुका होता है।

1757 (प्लासी का युद्ध ) की घटना का पूर्ण विश्लेषण करें तो हम पायेंगे कि वहां सत्तासीन लोगों पर चाटुकार ,मूर्ख दरबारियों का प्रभाव  एक मुख्य वजह थी । जब सत्ता-केंद्रों पर ऐसे लोग बैठे हों जिनके लिए राष्ट्र-हित से बड़ा अपना स्वार्थ हो, जब दरबार “चाटुकारों” से भरा हो, जब राज्य का श्रेष्ठ प्रतिभा-समूह राजा के वस्त्र, उत्सव, प्रशंसा-काव्य और दरबारी तमाशे में लगा हो—तब राज्य का पतन केवल समय की बात रह जाता है। क्योंकि शासन की शक्ति का अर्थ युद्ध नहीं; शासन की शक्ति का अर्थ “निर्णय” होता है। और अगर निर्णयकर्ता ही खोखला हो, तो सैन्य-बल भी दिशाहीन हो जाता है।

यहाँ “यथा राजा तथा प्रजा” के साथ “यथा प्रजा तथा राजा” भी लागू होता है। समाज ने क्यों स्वीकार कर लिया कि प्रतिनिधि ऐसा ही होगा? क्योंकि समाज की चेतना भी उसी स्तर पर थी। जब व्यक्ति खुद को भाग्य-लिखित मानता है, तो वह सत्ता-लिखित को भी सहज मान लेता है। जब व्यक्ति प्रश्न नहीं पूछता, तो नेता से भी प्रश्न नहीं पूछता। और जब प्रश्न नहीं, तो जवाबदेही नहीं; और जब जवाबदेही नहीं, तो “रॉन्ग इलिट्स” का राज स्वाभाविक हो जाता है।

इस हिस्से का सबसे तेज़ प्रश्न आज के लिए है: क्या हमें अपने प्रतिनिधि चुनना आता है? केवल वोट डालना चुनना नहीं है। चुनना का अर्थ है—विवेक से निर्णय, तथ्यों की जाँच, चरित्र और क्षमता का मूल्यांकन, नारे और भावनाओं से दूरी। अगर समाज यह नहीं सीखता, तो हर युग में कोई न कोई “धूर्त” आएगा—कभी कंपनी के रूप में, कभी प्लेटफॉर्म के रूप में, कभी विचारधारा के रूप में—और हमारी “नैरो आइडेंटिटीज” को कैपिटलाइज करके सत्ता बना लेगा।

7) रटने की परम्परा और पतन

शिक्षा का पतन अक्सर युद्ध से पहले होता है। क्योंकि युद्ध केवल हथियार नहीं, एक जटिल ज्ञान-तंत्र भी है। यदि समाज का शिक्षण-मॉडल “समझ” की जगह “रट” को महिमा दे, तो वह कुछ पीढ़ियों में अपनी बौद्धिक रीढ़ तोड़ देता है।

रट्टा अपने-आप में बुरा नहीं—मेमोरी एक उपयोगी क्षमता है। समस्या है: बिना समझ की स्मृति । जब श्लोक रट लेना विद्वता बन जाए, पर अर्थ समझना अनावश्यक हो; जब कर्मकांड का अभ्यास जीवन बन जाए, पर प्रश्न पूछना अपराध बन जाए; जब गणित, दर्शन, तर्क, विज्ञान—ये सब पीछे छूट जाएँ, और केवल “अनुष्ठान” आगे रहे—तो समाज धीरे-धीरे “टाइम-कैप्सूल” में कैद हो जाता है। वह वर्तमान की हवा में साँस लेता है, पर मानसिक रूप से सदियों पीछे जीता है।

और सबसे विचित्र दृश्य यह है कि हम आधुनिक सुविधाओं का उपयोग करते हुए भी “अतीत का नमूना” बनकर बैठ जाते हैं। 21वीं शताब्दी के विज्ञान से लाभ लेते हैं, पर 12वीं शताब्दी के रिवाजों को अंतिम सत्य मानते हैं। फिर हम उस व्यक्ति को पूजते हैं जो बाहरी पोशाक और भाषा के बल पर हमें “प्राचीन” लगे—भले ही उसकी बात आज की समस्याओं के लिए शून्य हो। सम्मान वहाँ जाना चाहिए जहाँ समाधान है—जहाँ बात आज की जिंदगी में काम आती है, जहाँ तर्क है, जहाँ प्रमाण है। लेकिन हम अक्सर सम्मान वहाँ देते हैं जहाँ “रहस्य” है—क्योंकि रहस्य हमारी जिज्ञासा नहीं, हमारी असुरक्षा को संबल प्रदान करता  है।

इस हिस्से में “रिचुअल” का प्रश्न भी आता है। रिचुअल अगर अर्थपूर्ण हो, तो संस्कृति का सुंदर हिस्सा है। पर जब जीवन ही रिचुअल बन जाए—“ऐसे ही करना होता है”—तो व्यक्ति का व्यक्तित्व मरने लगता है। इंडिविजुअल का अर्थ है—जिसकी अपनी निजी सत्ता हो। यदि आपके फैसले, आपके मूल्य, आपकी सोच—सब कुछ “क्योंकि सब करते हैं” पर टिके हों, तो आप व्यक्ति नहीं, भीड़ हैं। और भीड़ को नियंत्रित करना हमेशा आसान होता है—किसी भी शासक, किसी भी प्रचार, किसी भी धूर्त के लिए।

8) ज्ञान के अपमान का परिणाम

यह अंतिम और सबसे निर्णायक सूत्र है। पराधीनता की जड़ अंततः यहाँ आकर मिलती है: ज्ञान का अपमान। जैसे ही समाज ज्ञान को “चालाकी,” “पश्चिमीपन,” “अहंकार,” “धर्म-विरोध,” “शंका,” “नास्तिकता”—किसी भी नाम से नीचा दिखाना शुरू करता है, उसी दिन से उसका पतन शुरू हो जाता है। क्योंकि मनुष्य को मनुष्य ज्ञान ही बनाता है।

यहाँ “चेतना” का अर्थ बहुत स्पष्ट है: Consciousness = Knowing. चेतना  कोई “बिलीफ” नहीं है, “इमोशन” नहीं है। हम किसी को “जिंदा” तब कहते हैं जब वह conscious है—यानी वह जानता है। अगर समाज “जानना” छोड़कर “मानना” पकड़ ले, तो वह अपनी मनुष्यता का पतन कर  देता है। फिर वह भावनाओं से चलता है, अंध-विश्वास से चलता है, और अपने निर्णय किसी बाहरी शक्ति को सौंप देता है। यही वह भूमि है जहाँ शोषक आकर राज्य बन जाता है—और पीड़ित उसे नियति मान लेता है।

ज्ञान का अपमान शिक्षा-तंत्र में भी दिखता है। “बोर्ड टॉपर” होना, “अंक” लाना, “रट” लेना—ये सब सम्मान पाते हैं। लेकिन वास्तविक चुनौती आते ही पता चलता है कि बिना समझ के रट केवल  शैक्षिक सजावट है। समाज को “समझ” का सम्मान  करना चाहिए—समस्या-समाधान, तर्क, प्रयोग, रिसर्च, निर्माण। अगर हम कर्मकांड में जितना निवेश करते हैं, उसका आधा भी विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, शोध-अनुदानों, शिक्षकों की गुणवत्ता में करें—तो देश का भाग्य बदल सकता है। क्योंकि देश का भाग्य “ग्रह” नहीं बनाते; देश का भाग्य “ज्ञान-संस्थाएँ” बनाती हैं।

और इसी बिंदु पर गीता/उपनिषद/वेदांत की बात अर्थपूर्ण हो जाती है। वेदांत का प्राण जिज्ञासा है—“विद्” धातु का अर्थ ही जानना है । धर्म का मूल अर्थ “मानना” नहीं, “जानना”  होता है । लेकिन हमने धर्म को “कथा-विश्वास” बना दिया; जिज्ञासा हटाकर मान्यता भर दी। फिर स्वाभाविक है कि देश, जिसके पास ज्ञान-परंपरा थी, वह भी पराधीन हो गया—क्योंकि उसने उस परंपरा को ही मार दिया। यह त्रासदी इसलिए बड़ी है कि यहाँ कमी “ज्ञान की अनुपस्थिति” नहीं थी; कमी “ज्ञान के प्रति सम्मान की अनुपस्थिति” थी।

आज़ादी का अर्थऔपचारिक नहीं, वास्तविक

तो क्या निष्कर्ष है? क्या हम अतीत को कोसें? नहीं। अतीत से सीखें—और वर्तमान को उस सीख से  बदलें। पराधीनता का खतरा कभी “जहाज़ लेकर आने वाले” तक सीमित नहीं रहा । आज की पराधीनता नए रूप ले रही है—डेटा, टेक, अर्थ, मानसिकता, शिक्षा, प्रचार, अंध-विश्वास, भीड़-मनोविज्ञान—इन सब में। इसलिए असली स्वाधीनता का अर्थ है:

  • सत्य को साझा मूल्य बनाना (विविधता के बीच एकता का आधार)
  • भाग्यवाद से  कर्मशील बनने  की ओर लौटना (मेरी तक़दीर मैं तय करूँगा)
  • जाति/नैरो आइडेंटिटीज से मनुष्य मात्र -पहचान की ओर बढ़ना
  • धर्म को जिज्ञासा और आत्मज्ञान के रूप में पुनर्स्थापित करना (मान्यता नहीं)
  • भावना को ज्ञान से शुद्ध करना (भावना का नेतृत्व बुद्धि करे)
  • रिचुअल के स्थान पर समझ-आधारित जीवन
  • शिक्षा में रट्टा नहीं, समझ; सम्मान में प्रदर्शन नहीं, समाधान
  • अर्थव्यवस्था और उद्योग को नैतिक-परिश्रम का क्षेत्र मानना (गंदा नहीं)

और सबसे जरूरी: ज्ञान का सम्मान—क्योंकि एक राष्ट्र जितना ज्ञान-प्रेमी होता है, उतना ही स्वतंत्र रहता है। गुलामी पहले मन में आती है; आज़ादी पहले मन में जन्म लेती है। बाहर की सीमाएँ बाद में बदलती हैं—पहले भीतर की सीमाएँ टूटती हैं।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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