पार्टी’: एक बंगले में कैद पूरा समाज

फिल्में देखने का भी अपना एक स्वभाव होता है—कभी मन हल्का मनोरंजन चाहता है, कभी गहरे, उद्देश्यपूर्ण सिनेमा की तलाश करता है। आजकल जब दोनों का बेमेल मिश्रण मिलने लगा है, तो गोविंद निहलानी जैसा फिल्मकार राहत देता है, जिनका सिनेमा देखने से अधिक महसूस करने का अनुभव देता है। उनकी फिल्म ‘पार्टी’ पहले भी देखी थी, पर हाल में दोबारा देखने पर यह आज के साहित्यिक और बौद्धिक समाज का आईना कहीं अधिक साफ़ दिखाई देती है—मानो वर्षों बाद किसी धूल जमी खिड़की को पोंछकर देखा गया हो।

फिल्म एक पॉश बंगले से शुरू होती है—चमकीली रोशनियाँ, महँगी पेंटिंग्स, लॉन में करीने से कटा हुआ यूरोपीय घास, और भीतर शहर के नामी लेखक, कवि, नाटककार, बुद्धिजीवी। दमयंती नामक लेखिका आज बड़ी पार्टी दे रही है, किसी साहित्यकार को मिला सरकारी पुरस्कार जश्न का बहाना है। शराब के गिलासों और सिगरेट की लपटों के बीच वायवीय-सी बौद्धिक बहसें चल रही हैं—गंभीर दिखने वाली, पर भीतर से खोखली। हर चेहरा किसी न किसी मजबूरी, महत्वाकांक्षा, निजी टूटन या सत्ता-नज़दीकी के चश्मे में उलझा हुआ है। यह जमावड़ा साहित्यिक नहीं—एक चलती-फिरती प्रतिष्ठा-नीलामी की सभा लगता है, जहाँ लोग साहित्य कम और एक-दूसरे के प्रभाव का मुआयना ज़्यादा करते हैं।

इसी चमकते कमरे में एक नाम लगातार गूँजता है—अमृत। वह मौजूद नहीं, पर हर बातचीत में उपस्थित है। अमृत कवि था—बेचैन, आक्रोशित, समाज के दमन और शोषण को भीतर तक महसूस करने वाला। शहर से महीनों पहले चले जाने के बाद वह आदिवासी क्षेत्रों में अन्याय के खिलाफ़ लड़ रहा है—एक ऐसे प्रोजेक्ट के विरोध में, जिसमें सरकार, ठेकेदार और अफ़सर सब अपनी-अपनी जेबें गरम कर रहे हैं। अमृत घायल है, धमकाया गया है, अस्पताल में पड़ा है। लेकिन इस पार्टी में उसकी कविताएँ चाय के साथ उसी सहजता से चर्चा में हैं जैसे किसी मृत कवि की स्मृति सभा में लोग “बहुत अच्छा लिखता था” कहकर सांत्वना का ढोंग निभा लेते हैं। उसकी अनुपस्थिति ही इस पार्टी का सबसे भारी मेहमान बन जाती है।

जैसे-जैसे शराब बढ़ती है, चेहरों की पॉलिश उतरती है। क्रांति, न्याय, समाजवाद—इन पर लंबी-लंबी बहसें चलती हैं, जिनमें सैद्धांतिक गर्मी बहुत है, पर जमीनी सच्चाई का ताप शून्य। इनका समाजवाद ड्रॉइंग-रूम से बाहर नहीं निकलता; इनका वामपंथ किसी इंस्टाग्राम स्टोरी जितना टिकाऊ है। निहलानी ने मानो इस पूरे उच्चवर्गीय बौद्धिक समाज का MRI-स्कैन कर दिया है—अंदर घुसकर, हड्डी तक आवाज़ सुनाकर।

अमरीश पुरी का छोटा-सा दृश्य पूरी कहानी की धुरी बन जाता है, और ओम पुरी का देर से आना मानो इस बौद्धिक जमावड़े की अंतिम परीक्षा है। और तभी फोन बजता है। कमरे की हवा बदल जाती है। खबर आती है—अमृत “राज्य-विरोधी गतिविधियों” में मारा गया है। एनकाउंटर। कुछ पल का सन्नाटा। गिलास थम जाते हैं, हँसी जम जाती है, पर असहज विराम टूटते ही लोग फिर वाइन उठा लेते हैं—जैसे कवियों का मर जाना किसी शहर की सामान्य गतिविधि हो। यह क्षण फिल्म की सबसे निर्मम चोट बन जाता है—जो संघर्ष करता है, वह मर जाता है; और जो संघर्ष पर बहस करते हैं, वे अगले पेग के बाद सब भूल जाते हैं।

पार्टी पूँजीवाद, सत्ता-संरक्षण, सांस्कृतिक पाखंड और बौद्धिक स्वार्थ पर रखा गया सबसे धारदार व्यंग्य है। विडंबना यह कि सरकार-विरोधी फिल्म फिल्म्स डिवीज़न ने बनाई—यानि सरकार के पैसों से सरकार की चीर-फाड़। यही भारतीय कला का अनोखा विरोधाभास है। निहलानी का सिनेमा प्रश्न पूछता है—क्या हम संवेदनशील समाज हैं या सिर्फ़ सुविधानुसार ‘जागरूकता’ का नक़ाब पहनते हैं?

फिल्म का अंत दर्शक पर एक भारी चुप्पी छोड़ जाता है—मानो वह अपनी ही संवेदना का शव उठाए निकल रहा हो। और सवाल यही उठता है कि क्या कुछ बदला है? शायद नहीं। आज तो हम नक़ाब भी नहीं पहनते—अपनी स्वार्थपरता को खुलेआम प्रदर्शित करते हैं। अब नैतिकता निभाने की चीज़ नहीं, दिखाने का तमगा है। हम सब अपनी-अपनी पार्टियों में नंगे नाच रहे हैं—और गर्व भी कर रहे हैं। लगता है पार्टी अपने चरम पर है, और हम सब उसके स्थायी मेहमान।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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