पहचान का आईना: आप जो सोचते और साधते हैं, वही आप हैं

“आप वास्तव में कौन हैं”—कोई नया प्रश्न नहीं है । हम सब अपने बारे में बहुत कुछ कहते हैं। कोई स्वयं को ईमानदार बताता है, कोई कर्मठ, कोई आध्यात्मिक, कोई देशभक्त, कोई संवेदनशील। पर सच यह है कि मनुष्य की असली पहचान उसके शब्दों से नहीं, उसके चयन से प्रकट होती है। वह क्या पाने के लिए बेचैन है, किस बात पर उसका मन अटकता है, किस दिशा में वह अपना समय और ऊर्जा समर्पित करता है—यही उसका वास्तविक परिचय-पत्र है।

यदि कोई व्यक्ति दिन-रात सफलता की बातें करे, पर उसका अधिकांश समय शिकायतों में बीतता हो, तो वह सफलता का साधक नहीं, परिस्थितियों का दर्शक है। यदि कोई प्रेम की महिमा गाए, पर उसके मन में ईर्ष्या और तुलना का वास हो, तो उसका प्रेम अभी शब्दों तक ही सीमित है। हम जो दावा करते हैं, वह अक्सर हमारी आकांक्षा होती है; पर हम जो निरंतर करते हैं, वही हमारी वास्तविकता होती है।

मन एक खेत की तरह है। उसमें जो बीज बार-बार बोए जाते हैं, वही वृक्ष बनते हैं। यदि मन में भय, असुरक्षा और संदेह के विचार अधिक समय तक ठहरते हैं, तो हमारा व्यक्तित्व भी उसी दिशा में आकार लेने लगता है। यदि हम अपने भीतर ज्ञान, करुणा और अनुशासन के बीजों को सींचते हैं, तो धीरे-धीरे वही हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि हमारे मन का अधिकांश समय किसमें व्यतीत होता है—रचनात्मक चिंतन में या निरर्थक तुलना में?

प्रतिबद्धता मनुष्य का सबसे सशक्त दर्पण है। जिस कार्य के लिए हम कठिनाइयाँ सहने को तैयार हों, वही हमारे लिए वास्तव में महत्वपूर्ण है। यदि हम स्वास्थ्य को मूल्यवान कहते हैं, पर नियमित व्यायाम के लिए समय नहीं निकालते, तो हमारा कथन खोखला है। यदि हम परिवार को प्राथमिकता बताते हैं, पर उनके लिए मन से उपस्थित नहीं होते, तो हमारा दावा अधूरा है। शब्दों से अधिक प्रभावी हमारा समर्पण है।

जीवन हमें प्रतिदिन छोटे-छोटे विकल्प देता है—समय का उपयोग कैसे करें, किस विचार को महत्व दें, किस दिशा में कदम बढ़ाएँ। इन विकल्पों का संचय ही हमारी पहचान गढ़ता है। हम जो पढ़ते हैं, जिन लोगों के साथ समय बिताते हैं, जिन लक्ष्यों के पीछे भागते हैं—सब मिलकर हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारित करते हैं। इसलिए स्वयं से यह प्रश्न पूछना आवश्यक है: क्या मेरा वर्तमान जीवन मेरे घोषित मूल्यों के अनुरूप है?

प्रेरणा का आरंभ आत्म-सत्य से होता है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारी असली पहचान हमारे कर्म और हमारे मन की दिशा से निर्मित होती है, तब परिवर्तन संभव होता है। यदि हमें अपने व्यक्तित्व को ऊँचा उठाना है, तो हमें अपने ध्यान, अपने समय और अपने समर्पण की दिशा बदलनी होगी।

आखिरकार, हम वही बनते हैं जिसे हम निरंतर चुनते हैं। इसलिए अपने दावों से अधिक अपने प्रयासों पर ध्यान दें। अपने शब्दों से अधिक अपने कर्मों को सशक्त बनाइए। क्योंकि दुनिया अंततः वही देखती है जिसे आप जीते हैं—न कि जिसे आप केवल कहते हैं।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

📚 मेरी व्यंग्यात्मक पुस्तकें खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें – “Girne Mein Kya Harz Hai” और “Roses and Thorns
Notion Press –Roses and Thorns अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 1)

Join the conversation and share your thoughts

डॉ मुकेश 'असीमित'

53 seconds ago

यह लेख मनुष्य की वास्तविक पहचान पर एक प्रेरक आत्मचिंतन है। हम अपने बारे में जो कहते हैं, वह अक्सर हमारी इच्छा होती है, पर हम वास्तव में वही होते हैं जिसे पाने के लिए हम अपने समय, ध्यान और ऊर्जा को समर्पित करते हैं। मन में बार-बार उठने वाले विचार, रोज़मर्रा के छोटे निर्णय और जिन लक्ष्यों के पीछे हम निरंतर चलते हैं—यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। लेख यह संदेश देता है कि आत्म-विकास का मार्ग दावों से नहीं, बल्कि ईमानदार कर्म, स्पष्ट प्रतिबद्धता और सजग जीवन-चयन से होकर जाता है।