प्रदर्शनप्रिय मन और आंतरिक स्वतंत्रता की खोज

मनुष्य के भीतर एक अदृश्य मंच बना होता है। उस मंच पर वह स्वयं को प्रस्तुत करता है—कभी उपलब्धियों के साथ, कभी संबंधों के साथ, कभी अपने संग्रहित वैभव के साथ। समस्या मंच में नहीं है; समस्या तब शुरू होती है जब जीवन ही मंच बन जाए और हम अभिनेता की तरह हर क्षण तालियों के इंतज़ार में जीने लगें।

प्रदर्शनप्रिय मन (exhibitionist mind) बाहरी स्वीकृति को ही अपना ऑक्सीजन मान लेता है। उसे हर खुशी तब तक अधूरी लगती है जब तक वह दिखा न दी जाए। नई वस्तु खरीदी, तो तस्वीर; किसी प्रभावशाली व्यक्ति से मुलाक़ात हुई, तो पोस्ट; रिश्तों में निकटता आई, तो सार्वजनिक घोषणा। मानो जीवन का मूल्य उसकी अनुभूति में नहीं, उसके प्रदर्शन में छिपा हो। पर सच यह है कि जितनी ज़ोर से हम दिखाते हैं, उतनी ही गहराई से भीतर कहीं खालीपन छिपा होता है।

स्वीकृति की चाह स्वाभाविक है, पर जब वह आवश्यकता बन जाए, तब वह बंधन बन जाती है। जो व्यक्ति हर निर्णय इस सोच के साथ लेता है कि लोग क्या कहेंगे, वह धीरे-धीरे अपने ही भीतर से कटने लगता है। उसका हर चयन दूसरों की नज़र से तय होता है। वह अपनी पसंद से नहीं, प्रतिक्रिया से संचालित होता है। ऐसी स्थिति में जीवन स्वतंत्र नहीं रहता; वह दर्शकों की तालियों पर निर्भर कठपुतली बन जाता है।

दिखावे की प्रवृत्ति अक्सर असुरक्षा की संतान होती है। जब भीतर आत्मविश्वास का स्रोत मजबूत नहीं होता, तब हम बाहरी प्रमाण-पत्र खोजते हैं। हमें चाहिए कि लोग कहें—“वाह!” ताकि हमें लगे कि हम पर्याप्त हैं। पर बाहरी “वाह” कभी स्थायी नहीं होता। आज की प्रशंसा कल की आलोचना में बदल सकती है। जो पहचान दूसरों की राय पर टिकी हो, वह हवा के झोंकों से डगमगा जाती है।

आंतरिक शक्ति का मार्ग अलग है। वह शोर नहीं करता। वह चुपचाप स्वयं को गढ़ता है। वह जानता है कि असली संतोष अनुभव में है, प्रदर्शन में नहीं। यदि आपने किसी की सहायता की और उसे सार्वजनिक करने की बेचैनी नहीं हुई, तो समझिए आत्मा मजबूत हो रही है। यदि आपके पास उपलब्धि है, पर उसे प्रमाणित करने के लिए निरंतर मंच नहीं चाहिए, तो समझिए स्वतंत्रता जन्म ले रही है।

जीवन को प्रदर्शन में बदल देने से हम अनुभव की गहराई खो देते हैं। हर क्षण कैमरे की नज़र से जीना हमें अपने ही मन से दूर कर देता है। हम पल को जीने के बजाय उसे दिखाने की तैयारी करने लगते हैं। धीरे-धीरे हमारी संवेदनाएँ भी दर्शकों की अपेक्षाओं के अनुसार ढलने लगती हैं। यह स्थिति खतरनाक है, क्योंकि तब हम स्वयं से नहीं, छवि से प्रेम करने लगते हैं।

प्रेरणा का अर्थ है—अपने भीतर लौटना। स्वयं से यह पूछना कि यदि कोई देख न रहा हो, तब भी क्या मैं यही करूँगा? यदि कोई ताली न बजाए, तब भी क्या यह कार्य मेरे लिए सार्थक रहेगा? जब उत्तर “हाँ” में आता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता शुरू होती है।

जीवन प्रदर्शन नहीं, साधना है। संबंध सजावट नहीं, संवेदना हैं। उपलब्धियाँ प्रमाण नहीं, प्रक्रिया हैं। जो मन बाहरी तालियों से ऊपर उठकर भीतर की शांति खोज लेता है, वही सच्चे अर्थों में स्वतंत्र होता है। क्योंकि अंततः हमें दुनिया की नहीं, अपने अंतरात्मा की स्वीकृति चाहिए—और वही स्वीकृति सबसे स्थायी, सबसे शक्तिशाली होती है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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