कल्पना कीजिए, आप किसी बंद पार्किंग में खड़े हैं जहाँ तीन कारें खड़ी हैं। आपको सिर्फ़ इतना पता है कि एक कार लाल है, एक नीली है और एक काली, पर कौन-सी गाड़ी किस कंपनी की है—यह नहीं जानते। आप दूर से देखते हैं, बस नंबर प्लेटें झलकती हैं, बस इतना अंदाज़ा है कि तीन अलग-अलग कंपनियों की कारें हैं। थोड़ी देर बाद गेट खुलता है और दो कारें बाहर निकलती हैं—मान लीजिए एक लाल मारुति और दूसरी नीली हुंडई। अब अचानक आपके सामने बची हुई तीसरी कार के बारे में संभावनाएँ बदल जाती हैं—अब आप जानते हैं कि वह न लाल हो सकती है, न मारुति, न हुंडई। फिर जब कोई गार्ड बोल उठता है कि “काली वाली तो हमेशा यहाँ की आख़िरी कार होती है, वो टाटा की है”, तो एक और जानकारी मिलते ही आपके अनुमान पूरी तरह सिमट जाते हैं। आप महसूस करते हैं कि केवल देखने, नोटिस करने और थोड़ी-सी अतिरिक्त सूचना से ही पूरे “संभावित दृश्य” का गणित बदल गया। यही observer effect है—देखने वाला सिर्फ़ तमाशबीन नहीं, उसकी उपस्थिति और जानकारी ही वास्तविकता की संभावनाओं को घटाती, बढ़ाती और नया रूप देती रहती है।
क्वांटम भौतिकी ने इस सच्चाई को दो-चीर (double slit) प्रयोग के माध्यम से सामने रखा। जब इलेक्ट्रॉन को स्वाभाविक रूप से जाने दिया, वह तरंग की तरह व्यवहार कर interference pattern बनाता है; लेकिन जैसे ही हम उसे “देखने” लगते हैं, वही इलेक्ट्रॉन कण बनकर केवल दो धारियों का पैटर्न रच देता है। यानी कण अपने व्यवहार को बदल रहा है—सिर्फ़ इसलिए कि कोई उसे देख रहा है। नील्स बोहर ने इसलिए कहा था—“Particles don’t have definite properties until they are observed.” अर्थात पदार्थ की निश्चितता चेतना की उपस्थिति पर निर्भर है।
यहीं से एक अद्भुत सेतु बनता है—आधुनिक भौतिकी और हमारे सनातन दर्शन के बीच। सांख्य दर्शन कहता है—जब तक पुरुष चेतना, प्रकृति को नहीं निहारती, तब तक सृष्टि “घटित” ही नहीं होती। प्रकृति में सब कुछ बीज रूप में, अव्यक्त पड़ा रहता है; पुरुष की जागरूक दृष्टि उस बीज को फोड़कर उसे व्यक्त, दृश्य, अनुभव योग्य बना देती है। विज्ञान इसे observer effect कहता है, ऋषि इसे पुरुष का दर्शन कहते हैं।
इसी पुरुष के बारे में, और उसकी दृष्टि से उत्पन्न सृष्टि के रहस्य के बारे में, ऋग्वेद के दशम मंडल का 90वाँ सूक्त है—पुरुष सूक्त—जिसमें सोलह मंत्र हैं। पहले पाँच मंत्र पुरुष और उसकी दिव्य विशेषताओं का परिचय देते हैं, और शेष ग्यारह, पुरुष की चेतन दृष्टि से कैसे यह पूरी सृष्टि प्रकट होती है, उसका अद्भुत वर्णन करते हैं। यह वही सूक्त है जो केवल ऋग्वेद में ही नहीं, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी थोड़े अंतर के साथ मिलता है—जैसे किसी महाकाव्य की प्रतिध्वनि चारों दिशाओं में गूँज रही हो।
पहला प्रश्न स्वाभाविक है—यह “पुरुष” कौन है? क्या यह कोई पुरुष देहधारी देवता है? क्या यह पितृसत्तात्मक सोच का विस्तार है? नहीं। यहाँ “पुरुष” का अर्थ आज के “मर्द” से बिल्कुल भिन्न है। संस्कृत में “पुरुष” को पुर + उषा से जोड़ा गया—“पुर” यानी क्षेत्र, नगर, स्थान; “उषा” यानी भोर की पहली किरण। अर्थात वह चेतना, वह ऊर्जा, जो समस्त “पुर” में, सारे क्षेत्र में, पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई है। यह किसी gender का नाम नहीं, यह cosmic consciousness का नाम है—वह सार्वत्रिक साक्षी जो हर जगह उपस्थित है, हर चीज़ को देख रहा है, अनुभव कर रहा है, पर स्वयं कहीं बंध नहीं रहा।
पहले मंत्र की पंक्ति है—
“सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥”
यहाँ कहा जा रहा है कि पुरुष के “हज़ार सिर, हज़ार आँखें, हज़ार पैर” हैं। संख्या शास्त्र की तरह न लें; वैदिक भाषा में “सहस्र” का प्रयोग अनेक, अनंत, अगणित के अर्थ में भी होता है। इसका सहज अर्थ है—यह पुरुष इस ब्रह्मांड के अनगिनत जीवों के माध्यम से देख रहा है, सोच रहा है, चल रहा है। जब कोई पक्षी आकाश को निहारता है, कोई बच्चा तारों की गिनती करता है, कोई वैज्ञानिक दूरबीन से आकाशगंगाएँ खोजता है—तो ये सब मनुष्य या जीव अलग-अलग नहीं, पुरुष की ही अनगिनत आँखें हैं जो ब्रह्मांड को देख रही हैं। उसके सहस्र सिर अर्थात अनगिनत चिंतनशील मस्तिष्क हैं; सहस्र पाद अर्थात हर जीव के कदम उसी के कदम हैं, जो अस्तित्व की राह पर चल रहे हैं।
आगे कहा—“स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्।” पुरुष ने इस पूरे भू-मंडल को चारों ओर से घेर रखा है, और फिर भी वह इस ब्रह्मांड से “दस अंगुल” बड़ा है। दस अंगुल—नाप की दृष्टि से देखें तो छोटी सी दूरी, पर प्रतीक रूप से यह बहुत कुछ कहती है। जैसे नाभि से हृदय तक लगभग दस अंगुल की दूरी है—नाभि सृजन का प्रतीक, हृदय आत्मा का—वैसे ही ब्रह्मांड सृष्टि का प्रतीक है और पुरुष आत्मा का। दोनों बहुत निकट हैं, पर एक सूक्ष्म दूरी है—जितनी दूरी सृजन और साक्षी में होती है, उतनी ही दूरी पुरुष और इस दृश्य जगत के बीच है। पुरुष जगत में रचा-बसा भी है और उससे परे भी—जैसे हम स्वप्न में घुस भी जाते हैं और जानते भी हैं कि यह स्वप्न है।
दूसरे मंत्र में दृष्टि समय की ओर घूम जाती है—
“पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्…”
अर्थात जो कुछ भूतकाल में था, जो वर्तमान में है और जो भविष्य में होगा, सब पुरुष के ही अवलोकन में है। ब्रह्मांड के विस्तार में जो ऊर्जा लगातार बह रही है—डार्क एनर्जी के रूप में, तारों की ज्वाला में, जीवों के प्राण में—वह सब पुरुष की चेतन दृष्टि का क्षेत्र है। यहाँ केवल space नहीं, time भी चेतना का आयाम बन जाता है। जो था, जो है, जो होगा—तीनों पुरुष के लिए “इकाई” हैं, जैसे हमें सुबह-शाम के बीच का अंतर समय बताता है।
तीसरे मंत्र में अचानक हमें एक चौंका देने वाली बात बताई जाती है—हम जिस भौतिक ब्रह्मांड को देखकर दंग रह जाते हैं, विशाल आकाशगंगाओं, अनंत तारों, रहस्यमय ब्लैकहोलों पर आश्चर्य करते हैं—वह पुरुष का केवल एक “चौथाई हिस्सा” है।
“पादोऽस्य विश्वा भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि।”
पुरुष के चार भागों में से केवल एक भाग, 25%, इस भौतिक ब्रह्मांड के रूप में व्यक्त हुआ है; शेष तीन भाग, 75%, इतने सूक्ष्म, इतने अव्यक्त, इतने पारलौकिक हैं कि हमारी इंद्रियाँ उन्हें छू नहीं सकतीं। हम जिस विश्व पर मोहित हैं, वह पुरुष के अस्तित्व का केवल बाहरी, मोटा आवरण है।
यदि सांख्य दर्शन की भाषा में कहें तो जब पुरुष प्रकृति के साथ संयोग में आता है, तो 23 तत्व प्रकट होते हैं—बुद्धि, अहंकार, मन, इंद्रियाँ, तन्मात्राएँ और पंचमहाभूत। इन 23 में से केवल पाँच महाभूत—भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ऐसे हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। शेष सूक्ष्म हैं। यानी हमारी इंद्रियाँ पुरुष की अनंत सत्ता के केवल 25% हिस्से से ही परिचित हो पाती हैं; बाकी 75% हमारे subconscious और उससे परे, किसी और ही आयाम में स्थित है। हम जिस पर मुग्ध हैं, वह पुरुष का केवल एक कोना भर है; मूल पुरुष इससे “दशाङ्गुलम्” बड़ा है।
चौथा मंत्र यही बात और स्पष्ट करता है—जो 25% भाग है, जो साकार ब्रह्मांड है, वह नश्वर है। वह जन्म और विनाश के चक्र से बँधा है। तारे जन्म लेते हैं, सुलगते हैं, सुपरनोवा बनकर फटते हैं और फिर गैस-बादल बनकर विलीन हो जाते हैं। शरीर बनता है, जीता है, बूढ़ा होता है और मिट जाता है। हर रूप अपने मूल में लौट जाता है। पर जो सूक्ष्म 75% हिस्सा है—बुद्धि, मन, कारण शरीर, और अंततः पुरुष की साक्षी सत्ता—वह अविनाशी है। हमारे भीतर भी यही विभाजन है—स्थूल देह और सूक्ष्म देह। स्थूल शरीर माता-पिता से मिला, समय के साथ नष्ट हो जाएगा; पर सूक्ष्म देह—संस्कारों और वासनाओं से बुना हुआ—सृष्टि के आरंभ से है और प्रलय तक रहेगा, नए-नए शरीर धारण करता हुआ।
आगे के मंत्रों में पुरुष सूक्त एक विराट विकास-कथा जैसा लगने लगता है। बताया जाता है कि जब पुरुष ने प्रकृति को देखा, तो जैसे दूध से मंथन कर मक्खन निकाला जाता है, वैसे ही प्रकृति से एक विशाल “विराट रूप” प्रकट हुआ—यह ब्रह्मांड। पुरुष की जिज्ञासा यहीं नहीं रुकी; उसकी देखने की इच्छा और अधिक सूक्ष्म हो गई। अब वह और बारीकी से, और विविध रूपों से, इस ब्रह्मांड का अनुभव करना चाहता है। इसी इच्छा से जीवों का विकास होता है—एक कोशिकीय जीव से बहुकोशिकीय, जलीय से स्थलीय, crawling से walking, अंततः मनुष्य तक। हर नया जीव, हर नई इंद्रिय, हर जटिल नर्वस सिस्टम पुरुष की observation क्षमता का नया version है।
समुद्र की गहराइयों में रहने वाले प्रारम्भिक जीवों को प्रकाश का क्या ज्ञान? पर जब कुछ जीव सतह की ओर आए, प्रकाश की झलक मिली, उसी “अनुभव की संभावना” से आँखों का विकास हुआ। जहाँ सुनना ज़रूरी हुआ, वहाँ कान जैसी संरचनाएँ बनीं। जहाँ सूँघना, छूना, स्वाद पहचानना महत्वपूर्ण हुआ, वहाँ और जटिल इंद्रियाँ विकसित हुईं। इस जैविक विकास को आधुनिक विज्ञान natural selection कहता है; पुरुष सूक्त इसे पुरुष की बढ़ती हुई दृष्टि कहता है। जितनी जटिल इंद्रियाँ, उतना समृद्ध अनुभव; जितना गहरा अनुभव, उतना विस्तृत ब्रह्मांड। अंततः मनुष्य आता है—जिसके पास न केवल देखने-सुनने की क्षमता है, बल्कि सोचने, प्रश्न करने, तर्क करने और आत्मचिंतन करने की शक्ति भी है। अब पुरुष खुद को भी देखने लगता है—ब्रह्मांड के दर्पण में स्वयं की झलक।
पुरुष सूक्त के आगे के मंत्रों में यह भी बताया जाता है कि यह समूची सामाजिक और दार्शनिक व्यवस्था भी उसी विराट पुरुष के अंगों से उत्पन्न हुई—किसी जातिवादी अहंकार के साथ नहीं, बल्कि एक प्रतीक के रूप में। कहीं कहा गया कि ब्रह्मा उसके मुख से हैं, क्षत्रिय बाहुओं से, वैश्य जंघाओं से, शूद्र चरणों से—यह कोई जन्म पर आधारित स्थायी वर्गीकरण नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक भूमिकाओं का प्रतीकात्मक वर्णन है कि ज्ञान, शक्ति, समृद्धि और सेवा—ये चारों मिलकर ही एक स्वस्थ समाज बनाते हैं। यह बात अलग है कि आगे की सदियों में इस प्रतीक को कठोर सामाजिक ढाँचों में बदल दिया गया; पर मूल सूक्त की दृष्टि अधिक आध्यात्मिक और दार्शनिक है, राजनीतिक नहीं।
अंतिम मंत्रों में यह भी संकेत मिलता है कि जैसे घी दूध में छिपा रहता है, वैसे ही सृष्टि प्रकृति में छिपी रहती है। जब तक पुरुष का अवलोकन नहीं होता, तब तक जगत अव्यक्त है। जैसे ही पुरुष प्रकृति को “जागकर” देखता है, मंथन का चक्र शुरू होता है—तत्व प्रकट होते हैं, आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी बनते हैं, फिर जीवों की अनगिनत जातियाँ, और अंत में वह मनुष्य जो खड़े होकर तारों की ओर देखता है और पूछता है—“मैं कौन हूँ? यह सब क्या है?” यही प्रश्न पुरुष की चेतना की पराकाष्ठा है—जब वह स्वयं को ही देखना शुरू कर देता है।
यहीं से पुरुष सूक्त, observer effect और हमारी अपनी दिनचर्या एक सूत्र में बँध जाते हैं। जब तक हम केवल घटनाओं के बीच भागते रहते हैं, जीवन एक अराजक भीड़ जैसा लगता है; जैसे अनगिनत कण, लहरों की तरह टकराते-उछलते रहते हैं। लेकिन जैसे ही भीतर एक साक्षी जागता है—जो केवल दौड़ता नहीं, देखता भी है—उसी क्षण पुरुष की झलक हमारे भीतर दिखाई देने लगती है। हम समझने लगते हैं कि मैं केवल शरीर नहीं, केवल मन नहीं, केवल भावनाएँ नहीं; मैं वह “देखने वाली सत्ता” हूँ जो इन सबको घटित होते हुए देख रही है। उसी क्षण बाहरी ब्रह्मांड और भी अद्भुत हो जाता है—क्योंकि अब उसे देखने वाला साक्षी, खुद को भी देखने लगा है।
पुरुष सूक्त कोई पुराना वैदिक “हाइमन” भर नहीं है जिसे पूजा के समय यांत्रिक रूप से पढ़ लिया जाए; यह हमारे अस्तित्व की सबसे गहरी पहेली का कवितामय उत्तर है। यह कहता है—ब्रह्मांड कोई ठंडी, अर्थहीन मशीन नहीं; यह एक चेतन अवलोकन की ज्वलंत प्रक्रिया है। तुम, मैं, पक्षी, पेड़, समुद्र, तारा, आकाशगंगा—सब मिलकर एक ही विराट पुरुष की आँखें हैं, उसी के सिर हैं, उसी के कदम हैं। हम ब्रह्मांड को देख रहे हैं, और ब्रह्मांड हमारे माध्यम से खुद को।
और शायद यही पुरानी वैदिक वाणी का सबसे आधुनिक वाक्य है—
संसार केवल “बाहरी वस्तु” नहीं, एक संवाद है—चेतना और प्रकृति के बीच।
जिस दिन यह संवाद बंद हो जाएगा, सारी संभावनाएँ फिर से दूध में घुले मक्खन की तरह अव्यक्त हो जाएँगी—
और पुरुष, दस अंगुल आगे, फिर किसी नए अनुभव की प्रतीक्षा में शांत बैठा होगा।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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