राजेश खन्ना : सुपरस्टार से अकेलेपन तक — एक सितारे की पूरी कथा

29 दिसंबर—एक ऐसा दिन जब हिंदी सिनेमा के इतिहास में “सिर्फ़ एक अभिनेता” नहीं, बल्कि “एक घटना” पैदा हुई थी। अमृतसर में जन्मा जतिन खन्ना—जो आगे चलकर राजेश खन्ना बना—अपने नाम के साथ ही मानो अपनी नियति भी बदल कर आया। बचपन में ही उन्हें रिश्तेदार दंपति चुन्नीलाल और लीलावती खन्ना ने गोद लिया और वे बंबई की तरफ़ चल पड़े—उसी शहर की तरफ़ जहाँ सपने किराये पर मिलते हैं, पर कीमत हमेशा आत्मसम्मान और धैर्य वसूलता है।

कहानी का पहला मोड़ फ़िल्मी नहीं, ज़िंदगी जैसा था: स्कूल के दिनों में उनकी दोस्ती रवि कपूर से हुई—जिसे दुनिया बाद में जितेंद्र के नाम से पहचानेगी। दो लड़के, एक शहर, और एक साझा शौक: मंच, अभिनय, और तालियों की वह खनक जो भीतर कहीं जाकर “मुझे भी देखो” में बदल जाती है। जतिन के भीतर अभिनय का बीज जल्दी अंकुराया—स्कूल के नाटकों से लेकर कॉलेज के रंगमंच तक। वे सिर्फ़ भूमिका नहीं निभाते थे; वे भूमिका में अपना “भविष्य” भी खोजते थे।

फिर आया वह दौर जब ऑडिशन के बाहर खड़े रहने की आदत आदमी को या तो विनम्र बनाती है या ज़िद्दी। राजेश खन्ना ने ज़िद चुनी। ज़िद—जो कई बार प्रतिभा की बहन होती है और कई बार अहंकार की। उन्होंने लगातार मौके खोजे, दरवाज़े खटखटाए, और अंततः एक ऐसा मंच मिला जिसने उनकी किस्मत की दिशा तय कर दी—एक राष्ट्रीय स्तर का टैलेंट कॉन्टेस्ट, जहाँ देश भर से आए हजारों सपनों के बीच वे विजेता बने। यह जीत सिर्फ़ ट्रॉफी नहीं थी—यह एक टिकट था, जिसके पीछे लिखा था: “अब कैमरा तुम्हें देखेगा।”

लेकिन कैमरा देख ले, इसका मतलब यह नहीं कि बॉक्स ऑफिस भी देख ले। उन्हें डेब्यू मिला “आख़िरी ख़त” से—फिल्म प्रतिष्ठित रही, चर्चा भी हुई, पर व्यापार में वह आग नहीं लगी जो किसी नए चेहरे को रातों-रात “जरूरत” बना दे। शुरुआती कुछ फिल्मों में उनके हिस्से “प्रयास” आया, “प्रशंसा” आई—पर वह चीज़ नहीं आई जिसे इंडस्ट्री “चलना” कहती है। और इंडस्ट्री में “चलना” ही सबसे बड़ा प्रमाणपत्र होता है।

फिर 1969 आया—और जैसे किसी ने सिनेमा के कैलेंडर पर लाल स्याही से लिख दिया: “अब रोमांस का चेहरा बदलना है।” “आराधना” ने उन्हें सिर्फ़ हिट नहीं दिया, उन्हें राष्ट्रीय सनसनी बना दिया। शर्मिला टैगोर के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री, चेहरे की मासूमियत, आँखों का संवाद, और एक ऐसी “नरम चमक” जो उस दौर के दर्शकों के भीतर सीधे उतर जाती थी—सबने मिलकर उन्हें वह बना दिया जो उनसे पहले किसी ने उस रूप में नहीं जिया था: भारत का पहला सुपरस्टार

और फिर… फिर जो हुआ, वह स्टारडम नहीं—हिस्टीरिया था। सेट पर लड़कियों की भीड़, सड़क पर शोर, घर के बाहर रोज़ का मेला—मानो “एक झलक” किसी धार्मिक दर्शन जैसा हो गया हो। जिस तरह बताया जाता है कि शूटिंग सड़क पर हो और वे जिधर मुड़ें, भीड़ भी उधर मुड़ जाए—यह दृश्य सुनने में अतिशयोक्ति लगता है, पर उसी अतिशयोक्ति ने तो “सुपरस्टार” शब्द को असली अर्थ दिया। उनके नाम के साथ एक मिथक जुड़ गया—“ऊपर आका, नीचे काका…”—और मिथक जब आदमी के सिर पर चढ़ जाए तो वह ताज भी बनता है और बोझ भी।

उनकी सुपरहिट फिल्मों की कतार—दो रास्ते, बंधन, सच्चा झूठा, कटी पतंग, आनंद, अंदाज़ और न जाने कितनी—सिर्फ़ टिकट खिड़की पर सफलता नहीं थीं; वे उस समाज के रोमांटिक सपनों का विस्तार थीं। किशोर कुमार की आवाज़, राजेश खन्ना का अंदाज़, और कहानी का भाव—तीनों मिलकर उस दौर की हवा बन गए। लोग फिल्म देखने नहीं जाते थे—लोग “काका का दौर” देखने जाते थे। प्रेम-पत्रों की कहानियाँ, फोटो से शादी, खून से लिखे पत्र—ये सब “फैन कल्चर” नहीं, एक देश की सामूहिक दीवानगी का मनोविज्ञान बन गया।

पर हर शिखर के साथ एक खतरा जुड़ा होता है—आदमी शिखर को ही अपना घर समझने लगता है। और जब शिखर घर बन जाए, तो “नीचे उतरना” अपमान लगने लगता है। यही वह जगह थी जहाँ राजेश खन्ना के भीतर का कलाकार, उनके भीतर के इंसान से बहस करने लगा। अत्यधिक लोकप्रियता के साथ आया गॉड-कॉम्प्लेक्स, और उसके साथ आए टैंट्रम्स—सेट पर देर से पहुँचना, अपनी “केंद्रीयता” का प्रदर्शन, आसपास ऐसे लोगों की दीवार खड़ी कर लेना जो सिर्फ़ “वाह-वाह” बोलें। सुपरस्टार होना और सुपरस्टार समझा जाना—इन दोनों के बीच एक बारीक रेखा होती है; कई बार आदमी उसी रेखा पर फिसल जाता है।

इसी पीक पर एक और महत्वपूर्ण घटना घटती है: “हाथी मेरा साथी” जैसी बड़ी हिट के आसपास, उद्योग के भीतर नए तरह का लेखन तेज़ी से उभर रहा था—ऐसा लेखन जो सिर्फ़ रोमांस नहीं, समाज की खदबदाहट भी पकड़ना चाहता था। और यहीं वह टकराव उभरता है जिसकी चर्चा आपने इनपुट में की—सलीम–जावेद के साथ वह बहुचर्चित मतभेद। एक सुपरस्टार चाहता है कि उभरती हुई लेखन-जोड़ी “सिर्फ़ उसी के लिए” लिखे; लेखन-जोड़ी अपनी आज़ादी, अपना विस्तार चाहती है। यह सिर्फ़ व्यक्तिगत अहं की लड़ाई नहीं थी—यह एक युग-परिवर्तन की भूमिका थी।

फिर “जंजीर” आती है—और हिंदी सिनेमा में “हीरो” का चेहरा बदलने लगता है। दर्शक बदल रहे थे; देश की धड़कनें बदल रही थीं; पर्दे पर नायक की परिभाषा बदल रही थी। अब सिर्फ़ गाना, रोमांस, नज़रों का खेल काफी नहीं था; पर्दे पर गुस्सा भी चाहिए था, व्यवस्था से टकराव भी चाहिए था, और “एंग्री यंग मैन” जैसी ऊर्जा भी। राजेश खन्ना का “रोमांटिक राजा” वाला सिंहासन पहली बार सचमुच हिलता है।

और यही वह त्रासदी है—कि एक कलाकार की हार कभी अकेले उसकी नहीं होती; उसमें समय का भी हाथ होता है। फिर भी, समय अक्सर कलाकार को ही दोषी ठहराता है। राजेश खन्ना के हिस्से आया लगातार फ्लॉप्स का दौर, और उसके साथ आया वह अकेलापन जो भीड़ के बीच भी महसूस होता है। जिस इंडस्ट्री में कल तक लोग डेट्स की भीख मांगते थे, वहीं आज फोन उठाना भी “जोखिम” लगने लगता है। और जिनके घर पर कभी “दरबार” लगता था—वहीं रातें धीरे-धीरे लंबी और खामोश होने लगती हैं।

उनकी निजी जिंदगी में भी तनाव बढ़ा—शादी, अपेक्षाएँ, नियंत्रण, रिश्तों की दरारें—ये सब फिल्मी नहीं, बहुत मानवीय था। और मानवीय चीज़ें अक्सर सुपरस्टार को सबसे ज़्यादा डराती हैं, क्योंकि कैमरा उन्हें देवता बना देता है, पर घर उन्हें इंसान ही रहने को कहता है। वे वापसी की कोशिशें करते रहे—कभी कुछ फिल्में चलीं, कभी नहीं। बाद के वर्षों में राजनीति की तरफ़ भी गए; टीवी की तरफ़ भी। लेकिन जो चीज़ वे सच में ढूँढ रहे थे—वही पुराना उन्माद, वही पुराना “एक झलक”—वह लौटकर नहीं आया।

यही सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक जाल है: जिसने एक बार शिखर देखा हो, वह मैदान को “कम” समझने लगता है। और जो मैदान को कम समझ ले, वह धीरे-धीरे अपने भीतर भी खाली होने लगता है। धीरे-धीरे खर्चे, जीवनशैली, आदतें—सब बोझ बनते जाते हैं। फिर अफवाहें भी चलती हैं, किस्से भी बनते हैं, आरोप भी लगते हैं—और सच, हमेशा की तरह, इन सबके बीच कहीं दबा रह जाता है।

उनका जीवन अंततः हमें एक कठोर, पर जरूरी सबक देता है—स्टारडम जितना चमकदार है, उतना ही अकेला भी। तालियाँ जब बहुत देर तक बजती रहें, तो कानों में संगीत कम और शोर ज़्यादा रह जाता है। और शोर की आदत पड़ जाए तो खामोशी चुभने लगती है।

आज उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करना सिर्फ़ “काका की हिट फिल्मों” को याद करना नहीं है। यह उस दौर को याद करना है जब देश ने पहली बार जाना कि “नायक” सिर्फ़ परदे पर नहीं होता—वह लोगों की कल्पना में बस जाता है। राजेश खन्ना कोई “पहला सुपरस्टार” भर नहीं थे—वे उस पीढ़ी का नाम थे, जिसने सिनेमा को पूजा, और पूजा को दीवानगी तक पहुँचा दिया।

और शायद यही वजह है कि वर्षों बाद भी—किसी गली में, किसी रेडियो पर, किसी पुराने पोस्टर के कोने में—काका की मुस्कान दिखते ही दिल अपने आप कह उठता है:
“कुछ सितारे डूबते नहीं… बस अपनी रोशनी का रंग बदल लेते हैं।”

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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