विकास की सड़क या दुर्घटना का निमंत्रण?

गड्ढों का गणतंत्र और नागरिक की किस्मत

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

कुछ दिन पहले पास के एक छोटे शहर में जाना हुआ। लगा जैसे मैं किसी सड़क पर नहीं, बल्कि गड्ढों के संग्रहालय में चल रहा हूँ। कहीं सड़क थी, कहीं उसका अनुमान था और कहीं केवल गड्ढों के बीच बची हुई डामर की कुछ पट्टियाँ यह प्रमाण दे रही थीं कि कभी यहाँ सड़क भी रही होगी।

वापस अपने शहर लौटा तो लगा कि हम भी कोई बहुत सुखी नहीं हैं। फर्क बस इतना है कि पड़ोसी शहर का बुखार 104 डिग्री का है और हमारा 102 का। बीमारी दोनों को है।

आज राजस्थान के अधिकांश छोटे शहरों और कस्बों में एक विचित्र व्यवस्था विकसित हो चुकी है। सड़क यदि टूटी है तो नगर परिषद कहती है—यह पीडब्ल्यूडी की है। पीडब्ल्यूडी कहता है—यह नगर निकाय के अधीन है। जलदाय विभाग पाइप डालकर चला जाता है। सीवर विभाग खुदाई करके भूल जाता है। बिजली विभाग तार डालता है। गैस कंपनी नाली काट देती है। सड़क सबकी है, लेकिन जिम्मेदारी किसी की नहीं।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि हमारे यहाँ सड़क दुर्घटनाओं के विस्तृत आँकड़े मिल जाते हैं। कितनी दुर्घटनाएँ हुईं, कितने घायल हुए, कितने मरे—सब दर्ज है। लेकिन यह कहीं दर्ज नहीं मिलता कि इनमें से कितने लोग सड़क के गड्ढे में गिरकर घायल हुए, कितने खुले मैनहोल में समा गए, कितने टूटी पुलिया या अधूरी खुदाई के कारण दुर्घटनाग्रस्त हुए। मानो गड्ढे कभी दुर्घटना का कारण होते ही नहीं।

…और यदि किसी को लगता हो कि यह केवल मेरी व्यक्तिगत शिकायत है, तो वह राजस्थान के आधिकारिक सड़क दुर्घटना आँकड़े देख ले।

सिर्फ वर्ष 2023 में राजस्थान में 24,705 सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज हुईं। इनमें 11,762 लोगों की मृत्यु हुई। यानी औसतन हर दिन 32 लोग सड़क पर अपनी जान गंवा रहे हैं। 2020 से 2023 के बीच राज्य में 88,384 सड़क दुर्घटनाएँ और 42,159 मौतें दर्ज की गईं।

लेकिन यहाँ एक विचित्र प्रश्न खड़ा होता है।

इनमें से कितने लोग गड्ढों के कारण मरे?

कितने खुले मैनहोल में गिरकर घायल हुए?

कितने लोग टूटी पुलिया, धँसी सड़क या बिना चेतावनी छोड़ी गई खुदाई के कारण दुर्घटनाग्रस्त हुए?

उत्तर है—सरकारी आँकड़े लगभग मौन हैं।

हमारे यहाँ मौतें गिनी जाती हैं, मौत के असली कारण नहीं।

यही वह जगह है जहाँ व्यवस्था की जवाबदेही गड्ढों में समा जाती है।

कभी-कभी कोई बड़ी दुर्घटना समाचार बन जाती है। जैसे बारां में राष्ट्रीय राजमार्ग पर गड्ढों से बचने की कोशिश में कार दुर्घटनाग्रस्त हुई और चार लोगों की जान चली गई। भरतपुर में पानी से भरे गहरे गड्ढे के कारण ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटी और माँ-बेटे की मृत्यु हो गई। ये घटनाएँ अखबारों में छपीं।

लेकिन प्रश्न यह है—

क्या हर गड्ढा अखबार तक पहुँचता है?

क्या हर खुला मैनहोल “ब्रेकिंग न्यूज़” बनता है?

क्या हर वह बुज़ुर्ग, जो स्कूटर सहित गड्ढे में गिरकर महीनों बिस्तर पर पड़ जाता है, किसी आँकड़े का हिस्सा बनता है?

क्या हर वह बच्चा, जो साइकिल सहित टूटी सड़क पर गिरकर घायल होता है, प्रशासन की किसी फाइल में दर्ज होता है?

नहीं।

समाचार वही बनता है जिसे समाचार बनाया जाए। कभी-कभी अखबार में गड्ढे में गिरे बकरे की तस्वीर भी प्रमुखता से छप जाती है, और कभी दो-चार इंसानों की मौत स्थानीय कॉलम में दो इंच की खबर बनकर रह जाती है। यह मीडिया की आलोचना नहीं, बल्कि उस सामाजिक संवेदनहीनता का आईना है जिसमें हम धीरे-धीरे जीने लगे हैं।

हमने दुर्घटनाओं को समाचार मान लिया है, समस्या नहीं।

प्रशासन भी प्रायः अपनी भूमिका निभा देता है—घटना के बाद दौरा, जाँच के आदेश, सांत्वना, कभी-कभार मुआवज़े की घोषणा, और फिर अगली दुर्घटना तक प्रतीक्षा।

मानो सड़क का गड्ढा नहीं, स्मृति का गड्ढा भर दिया गया हो।

लोकतंत्र में नागरिक का जीवन केवल दुर्घटना के बाद मुआवज़ा पाने का अधिकार नहीं है। संविधान ने हमें सम्मानपूर्वक और सुरक्षित जीवन का अधिकार दिया है। यदि नागरिक अपने ही शहर की सड़क पर यह सोचकर निकले कि “आज सकुशल लौट आऊँ, यही बहुत है”, तो यह केवल सड़क की विफलता नहीं, शासन की भी विफलता है।

शायद गड्ढों का भी कोई प्रभावशाली वकील होगा।

कल्पना कीजिए—यदि किसी अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर की छत गिर जाए, तो क्या डॉक्टर यह कहकर बच सकता है कि “यह भवन निर्माण विभाग की जिम्मेदारी थी”? यदि किसी विद्यालय की दीवार गिर जाए, तो क्या प्रधानाध्यापक कह सकता है कि “मैं तो केवल पढ़ाने का जिम्मेदार हूँ”? फिर सड़क पर रोज़ जान जोखिम में डालने वाली लापरवाही किसकी है?

हमारे संविधान ने नागरिक को केवल मतदान का अधिकार नहीं दिया, बल्कि गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक बार कहा है कि जीवन के अधिकार में सुरक्षित वातावरण भी शामिल है। लेकिन विडंबना देखिए, घर के भीतर हम ताला लगाकर सुरक्षित सो सकते हैं, बाहर सड़क पर निकलते ही हमारी सुरक्षा भाग्य भरोसे हो जाती है।

घर से निकलते समय हेलमेट पहनिए, सीट बेल्ट बाँधिए, गति सीमा का पालन कीजिए—यह सब बिल्कुल आवश्यक है। लेकिन क्या सड़क बनाने वाली व्यवस्था की भी कोई सीट बेल्ट है? क्या उसके लिए भी कोई हेलमेट है? क्या उसकी लापरवाही का भी कोई चालान कटता है?

हमारे यहाँ जिम्मेदारी का बड़ा सुंदर गणित है। यदि वाहन चालक शराब पीकर दुर्घटना करे तो अपराध। यदि नागरिक ट्रैफिक नियम तोड़े तो अपराध। लेकिन यदि महीनों तक सड़क पर तीन फुट गहरा गड्ढा खुला रहे, चेतावनी बोर्ड न लगे, रात में रोशनी न हो और उसी में गिरकर कोई मर जाए, तो वह अक्सर “दुर्भाग्यपूर्ण घटना” कहलाती है। अपराध नहीं।

यह शब्दावली भी कमाल की है। नागरिक गलती करे तो “लापरवाही”। व्यवस्था गलती करे तो “घटना”।

कभी-कभी लगता है कि हमारे शहरों की सड़कें इंजीनियरों ने नहीं, पुरातत्व विभाग ने बनाई हैं। हर पचास मीटर पर खुदाई का एक नया अवशेष दिखाई देता है। कहीं पाइपलाइन, कहीं केबल, कहीं सीवर, कहीं अधूरा पैचवर्क। सड़क मानो स्थायी निर्माण नहीं, बल्कि निरंतर प्रयोगशाला हो।

और फिर हम बड़े गर्व से चमचमाते एक्सप्रेस-वे, सिक्स लेन और आठ लेन सड़कों की तस्वीरें दिखाते हैं। अच्छी बात है, देश को विश्वस्तरीय राजमार्ग चाहिए। लेकिन जिस नागरिक का रोज़ का सफर मोहल्ले की टूटी सड़क से शुरू होकर उसी पर समाप्त होता है, उसके लिए विकास की पहली परीक्षा वहीं होती है।

हाईवे पर टोल देना पड़ता है। वहाँ रखरखाव की व्यवस्था भी अपेक्षाकृत बेहतर होती है। लेकिन शहर की सड़कों का रखरखाव कौन करेगा? क्या शहर के निवासी कर नहीं देते? क्या वे वोट नहीं देते? क्या उनका जीवन कम मूल्यवान है?

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमने इन परिस्थितियों के साथ जीना सीख लिया है। बारिश आई तो सड़क टूटेगी—स्वाभाविक है। मैनहोल खुला रहेगा—चलता है। पुलिया धँसी हुई है—बचकर निकल जाओ। गड्ढे में बाइक फिसल गई—किस्मत खराब थी।

यही हमारी सबसे बड़ी हार है।

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र इस बात से भी मापा जाता है कि नागरिक बिना भय के सड़क पर चल सकता है या नहीं। यदि कोई व्यक्ति घर से निकले और सकुशल वापस लौट आना उसकी व्यक्तिगत दक्षता नहीं बल्कि सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी हो, तभी लोकतंत्र अपने उद्देश्य को पूरा करता है।

शायद अब समय आ गया है कि सड़क दुर्घटनाओं की परिभाषा बदलनी होगी। हर उस दुर्घटना का अलग रिकॉर्ड रखा जाए जो गड्ढों, खुले मैनहोल, टूटी पुलिया, अधूरी खुदाई और खराब सड़क रखरखाव के कारण हुई हो। हर मृत्यु के साथ यह भी दर्ज हो कि जिम्मेदार विभाग कौन था। सड़क बनाकर भूल जाना विकास नहीं है; सड़क को सुरक्षित बनाए रखना ही असली विकास है।

क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके सबसे चौड़े हाईवे से नहीं, बल्कि उसकी सबसे छोटी गली की सबसे सुरक्षित सड़क से होती है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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