समझदार होने का खामियाज़ा
मुझे अपनी समझदारी का पता बहुत देर से चला।
अगर समय रहते मालूम हो जाता तो शायद छिपा लेता।
कुछ बीमारियाँ ऐसी होती हैं जिनका आदमी इलाज कराता है, कुछ ऐसी जिन्हें छिपाता है। समझदारी दूसरी किस्म की बीमारी है। जब तक घर के भीतर रहे, ठीक है। मोहल्ले को पता चल जाए तो आदमी गया काम से।
अब तो मुझे लगभग रोज ही यह अहसास कराया जाता है कि समाज में ‘समझदार आदमी’ का तमगा लगवाना भी कितना दुखदायी हो सकता है।
“डॉक्टर साहब, आप समझदार आदमी हैं… पढ़े-लिखे हैं… समाज में आपकी इज्जत है… और आप ये सब! आपको ये शोभा नहीं देता।”
‘शोभा नहीं देता’ सुनते ही मैं भीतर से सहम जाता हूँ।
मैं तो अब तक यह समझता था कि दुनिया में समझदारी से काम लेंगे, थोड़ी समझ दिखाएँगे तो शायद अपना भी भला होगा और समाज का भी। लेकिन अनुभव ने बताया कि दुनिया में रहने के लिए समझदारी से ज्यादा दुनियादारी की जरूरत होती है।
अपनी समझदारी अपने तक सीमित रखिए। जैसे लोग बैंक बैलेंस छिपाते हैं, उम्र छिपाते हैं, कमाई छिपाते हैं—वैसे ही समझदारी भी छिपाकर रखिए।
कहीं आपने अपनी समझदारी अपने मामले में या किसी दूसरे के मामले में दिखा दी, तो इसे लगभग अमेरिका की तरह दूसरे देशों के मामलों में टाँग अड़ाने के समकक्ष माना जाएगा।
तो हुआ यूँ मित्रों कि बात फैल गई कि इस मोहल्ले में एक समझदार आदमी रहता है।
और बस!
जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, मोहल्ले के बाकी लोगों को अपनी-अपनी बेवकूफियों को अंजाम देने की मानो खुली छूट मिल गई।
किसी ने मेरे घर के सामने गाड़ी लगा दी।
मैंने विनम्रता से कहा—
“भाई साहब, जरा गाड़ी हटा लीजिए।”
उत्तर मिला—
“डॉक्टर साहब, आप तो समझदार हैं। थोड़ा एडजस्ट कर लीजिए।”
गाड़ी लगाना उसके हिस्से आया।
समझदारी मेरे हिस्से।
तभी मुझे समझ में आया कि समझदार आदमी की असली पहचान ही यही है—गलती दूसरा करे और एडजस्ट वह करे।
मैं भी सोचता हूँ, हर उपलब्धि कुछ न कुछ त्याग तो माँगती ही है।
समझदारी की उपलब्धि मुझसे बस ‘एडजस्टमेंट’ माँगती है।
अब चाहे किसी ने माथे के ऊपर से पान की पीक फेंक दी हो, पड़ोसी का कचरा हवा के सहारे आपके आँगन में आ गया हो, बस में किसी ने ऐसी कोहनी मारी हो कि दो पसलियों ने आपस में हैंडशेक कर लिया हो—आप समझदार हैं, एडजस्ट कीजिए।
किसी ने आपकी कार पर खरोंच मार दी—
“कोई बात नहीं डॉक्टर साहब, इतनी-सी बात है।”
झगड़ा सुलझाने की सामाजिक खुजली में आपने दो लोगों के फटे में पैर रख दिया और हत्थापाई में दो-चार डंडे आपको भी पड़ गए—एडजस्ट कीजिए।
पड़ोसी का सत्संग रात बारह बजे तक डीजे पर चल रहा है—
एडजस्ट कीजिए।
रैली की भगदड़ में पुलिस का डंडा आपको लग गया—
एडजस्ट कीजिए। अआप भी यार समझदार होकर कहाँ बाहर सड़क पर घूम रहे हैं…!
और पड़ोसी के कुत्ते ने आपके आँगन को अपनी सुबह की प्राकृतिक गतिविधि के लिए चुन लिया—
तो भाई, कुत्ता तो बेचारा जानवर है।
आप तो समझदार हैं।
धीरे-धीरे मेरी समझदारी की ख्याति बढ़ती गई।
अब लोग मेरे पास काम लेकर नहीं आते। काम छोड़ जाते हैं।
“डॉक्टर साहब, शर्मा जी को आप समझा देना।”
“वर्मा जी आपकी बात मानते हैं, उनसे आप बात कर लेना।”
“बच्चा पढ़ता नहीं है, जरा आप समझा देना।”
“भाई से प्रॉपर्टी का मामला है, आप बीच में पड़ जाइए।”
पहले मैं डॉक्टर था।
अब मुझे शक होने लगा है कि शायद मैं संयुक्त राष्ट्र संघ में थर्ड पार्टी एग्रीमेंट कराने वाला कोई अवैतनिक कर्मचारी हूँ।
जहाँ भी दो पक्षों के बीच तनाव हो, मुझे शांति सेना बनाकर भेज दिया जाता है।
समझदार आदमी के जीवन का सबसे बड़ा संकट उसका गुस्सा है।उसे गुस्सा करने का अधिकार नहीं होता।
आप दुनिया की हर बेवकूफी हँसते-हँसते झेलते रहिए।कभी मेरा गुस्सा नाक पर रहा करता था।
अब बेचारा दुबककर कहीं भीतर बैठ गया है। क्योंकि जिस दिन बाहर निकला, तुरंत कोई कह देता है—
“डॉक्टर साहब, आपसे ये उम्मीद नहीं थी।”
यह वाक्य आदमी के चरित्र पर सीधा हमला है।
“आपसे ये उम्मीद नहीं थी!”
मानो उन्होंने वर्षों पहले मेरे ऊपर कोई दीर्घकालीन निवेश किया हो और मैंने अचानक शेयर बाजार में उनकी सारी पूँजी डुबो दी हो।
आखिर उन्हें मुझसे उम्मीद क्या थी?
यही कि मैं समझदार हूँ, इसलिए वक्त-बेवक्त उनकी मदद के लिए आगे आता रहूँगा।
चंदे की रसीद वे जितनी सोचकर आए हों, मैं उससे आगे बढ़कर कटवाऊँ।
कोई फोन कर दे—
“डॉक्टर साहब, जरा थोड़े पैसे चाहिए।”
तो मैं बिना यह पूछे कि कब लौटेंगे, तुरंत उधार दे दूँ।
और फिर अगर पैसे वापस न आएँ तो उन्हें माँगना भी मेरी समझदारी के विरुद्ध माना जाएगा।
समझदार आदमी होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि उस रकम को चुपचाप डूबत खाते में लिख दूँ।
समझदार आदमी की वस्तुओं पर भी उसका पूर्ण अधिकार नहीं माना जाता।
आपका छाता, पेन, किताब, चश्मा—यहाँ तक कि आपकी लंगोट भी कोई बिना पूछे ले जाए और आपने वापस माँग ली तो सामने वाला आश्चर्य से देखेगा—
“इतनी छोटी-सी बात! आप तो समझदार हैं।”
अर्थात वस्तु चाहे आपकी हो, वापस माँगने का अधिकार आपका नहीं।
आपको केवल क्षमा करने की स्वतंत्रता है।
समझदार होने के साथ पढ़े-लिखे होने की एक अतिरिक्त सजा भी है।
थोड़ी शर्म भी करनी पड़ती है।
आखिर पढ़े-लिखे हैं तो दिखाना भी तो पड़ेगा कि पढ़ाई ने आपके भीतर से विरोध करने की शक्ति सफलतापूर्वक निकाल दी है।
किसी ने सड़क पर गलत पार्किंग कर दी।
आपने कहा—
“भाई साहब, गाड़ी जरा साइड कर दीजिए।”
तुरंत कोई बोलेगा—
“आप भी डॉक्साहब.. सड़क पर बहस कर रहे हैं? क्या बात है ..कहीं आप चुनाव लड़ने कि तो नहीं सोच रहे हैं ?”चुनाव लड़ना शायद समझदारों के खाते में आता ही नहीं।
वह हम जैसे लोगों के लिए नहीं।
उसे फिलहाल बेशर्मों के खाते में ही रहने दीजिए।
अब आप ही बताइए, पढ़ा-लिखा आदमी सड़क पर क्या करे?
क्या हर समय स्टेथोस्कोप गले में डालकर घूमे?
कोई लाइन तोड़कर आपके आगे घुस जाए और आपने टोका तो सलाह मिलेगी—
“डॉक्टर हैं, अपनी डॉक्टरी कीजिए। यहाँ सड़क पर क्यों उलझ रहे हैं?”
मानो सड़क, पानी, बिजली, ट्रैफिक और नागरिक अधिकार अशिक्षित लोगों के आरक्षित विषय हों।
हाँ भाई!
किसी दफ्तर में आपका जायज काम अटका है।दो बार आदमी आपके चैंबर में आ चुका है।
आप उसे चाय पिलाकर विदा करते रहे। तीसरी बार वह शायद मन ही मन सोचता है—
“डॉक्टर साहब यार इतना भी नहीं समझते..मैं तो इन्हें बड़ा समझदार आदमी मानता था ?”
क्योंकि उसके हिसाब से ‘चाय-पानी’ का अर्थ का इस प्रकार से चाय पिलाकर अनर्थ कर देना कहाँ समझदारी कि बात हो सकती है ।
मुझे अब लगता है कि हमारे यहाँ पढ़ाई का अंतिम उद्देश्य यही माना जाता है कि आदमी अपना हक माँगते समय थोड़ा शर्माए।जितनी बड़ी डिग्री—
उतना छोटा विरोध।
जितनी बड़ी प्रतिष्ठा—
उतनी धीमी आवाज।
इतने वर्षों में मैंने पाया कि समझदार आदमी समाज को कई अतिरिक्त सुविधाएँ देता है।उसका समय बिना पूछे लिया जा सकता है।उससे उधार माँगा जा सकता है।उससे सिफारिश कराई जा सकती है।
उसकी कुर्सी ली जा सकती है।उसकी बारी छोड़ी जा सकती है।
उसे लाइन में पीछे किया जा सकता है। एक दिन पड़ोसी आए।
बोले—
“डॉक्टर साहब, मेरी गाड़ी जरा देख लेना। मैं दो घंटे में आता हूँ।”
यह वाक्य आदेश था, लेकिन स्वर अनुरोध वाला रखा गया था।
मैंने पहली बार कहा—
“नहीं।”
वे चौंके।
पहले मुझे देखा।
फिर मेरे घर को देखा।
शायद यह सुनिश्चित कर रहे थे कि पता सही है और आदमी भी वही है।
फिर बोले—
“तबीयत तो ठीक है?”
मैंने कहा—
“बिल्कुल।”
उनकी चिंता और बढ़ गई।
समझदार आदमी जब पहली बार ‘नहीं’ कहता है तो समाज को उसके चरित्र पर नहीं, सीधे स्वास्थ्य पर संदेह होता है।
यह कोई नहीं मानता कि आदमी ने पहली बार अपनी समझदारी का उपयोग अपने लिए किया है।
मैंने उसी दिन यह प्रयोग आगे बढ़ाया।
एक परिचित बोले—
“डॉक्टर साहब, बस एक छोटा-सा काम था।”
पहले मैं तुरंत पूछता था—
“बताइए।”
उस दिन मैंने पूछा—
“कितना छोटा?”
वह चुप हो गए।
अब मुझे अनुभव हो गया है कि हमारे समाज में ‘छोटा-सा काम’ प्रायः वह होता है जिसमें आपका आधा दिन, दो फोन, तीन सिफारिशें और थोड़ा-सा आत्मसम्मान खर्च होना तय है।
क्योंकि जब आप मुझे समझदार कहते हैं तो मुझे ऐसा लगता है जैसे आप मेरी तारीफ नहीं कर रहे—
बल्कि यह प्रमाणित कर रहे हैं कि इस पूरे प्रसंग में मूर्ख बनने के लिए आपने मुझे ही सबसे योग्य आदमी चुना है।
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