सामंजस्य या आत्म-द्रोह? झुकना कब समझदारी है और कब हार
हम अक्सर सामंजस्य और समझौते को एक ही समझ लेते हैं। हमें बचपन से सिखाया जाता है—“एडजस्ट कर लो”, “समय के साथ चलो”, “ज्यादा मत बोलो”, “सिस्टम ऐसा ही है।” धीरे-धीरे हम यह मान लेते हैं कि झुक जाना ही परिपक्वता है, दब जाना ही व्यवहार-कुशलता है, और डरकर चुप रहना ही समझदारी है। पर क्या सचमुच यही सामंजस्य है?
सामंजस्य का अर्थ है संतुलन—भीतर और बाहर के बीच। पर जब संतुलन टूट जाता है और हम केवल बाहरी शांति बनाए रखने के लिए अपने भीतर की आवाज़ को कुचल देते हैं, तब वह सामंजस्य नहीं, आत्म-द्रोह बन जाता है। यदि किसी परिस्थिति में आपको झुकना भी पड़े, किसी को ‘सर’ भी कहना पड़े, किसी व्यवस्था में कुछ समय तक रहना भी पड़े—तो यह व्यावहारिकता हो सकती है। पर उस झुकाव में भीतर की असहमति जीवित रहनी चाहिए।
समस्या झुकने में नहीं है, समस्या यह है कि झुकते-झुकते हम भीतर से भी झुक जाते हैं। बाहर की मजबूरी को हम भीतर की स्वीकृति बना लेते हैं। जो हमें पसंद नहीं, उसे भी सही ठहराने लगते हैं। और यहीं से आत्म-सम्मान का क्षरण शुरू होता है।
मैंने भी जीवन में ऐसे लोग देखे—जिन्हें न चाहते हुए भी ‘सर’ कहना पड़ा। व्यवस्था का हिस्सा थे, पदानुक्रम का हिस्सा थे। पर फर्क इस बात से पड़ता है कि आप भीतर से क्या महसूस कर रहे हैं। यदि आप जानते हैं कि यह शब्द आपकी वास्तविक श्रद्धा नहीं, केवल औपचारिकता है, तो भीतर का सत्य जीवित है। पर यदि आप धीरे-धीरे उसी को आदर्श मान बैठें, उसी को महान घोषित करने लगें, तो भीतर की स्वतंत्रता खो जाती है।
सच्चा सामंजस्य यह नहीं कि आप हर अन्याय पर चुप रहें। यह भी नहीं कि आप हर क्षण विद्रोह करते रहें। सच्चा सामंजस्य यह है कि आप परिस्थिति को समझें, अपनी सीमाएँ जानें, पर अपनी असहमति को दबाएँ नहीं। कम से कम अपने भीतर इतना साहस रहे कि आप स्पष्ट जान सकें—“यह मुझे पसंद नहीं है।”
यह नापसंद ही आत्मा की रक्षा है। यह भीतर की चेतना का संकेत है कि अभी सब कुछ मरा नहीं है। जो व्यक्ति हर स्थिति में सहज हो जाता है, हर अपमान को सामान्य मान लेता है, हर गलत को ‘चलता है’ कहकर स्वीकार कर लेता है—वह धीरे-धीरे संवेदनहीन हो जाता है। और संवेदनहीनता से बड़ी हार कोई नहीं।
संतुलन का अर्थ है विवेकपूर्ण आचरण। कभी परिस्थिति आपको झुकने को मजबूर करे, तो झुकिए—पर यह जानकर कि आप क्यों झुक रहे हैं। डर से नहीं, रणनीति से। कमजोरी से नहीं, सजगता से। और भीतर यह दृढ़ रहे कि जहाँ आपकी गरिमा पर स्थायी चोट हो, वहाँ आप लंबे समय तक नहीं रुकेंगे।
जीवन में कई बार हमें असुविधाजनक शब्द बोलने पड़ते हैं, असहज व्यवहार सहना पड़ता है। पर इतना तो हो कि भीतर की आग बुझ न जाए। सामंजस्य बाहर का संतुलन है; आत्म-सम्मान भीतर की लौ। यदि लौ जलती रहे, तो झुकाव भी अस्थायी होगा।
और जब भीतर की यह स्पष्टता बनी रहती है, तब एक दिन आप उस परिस्थिति से बाहर आने का साहस भी जुटा लेते हैं। यही सच्ची स्वतंत्रता है—एडजस्ट करना, पर आत्मा को गिरवी न रखना।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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