समोसा—हैं हैं … नाम तो सुना ही होगा। सदाबहार फल है, जैसा नाम का अर्थ भी यही… सभी मौसम का फल। इसे फल कहना इसलिए आवश्यक है कि आजकल पुण्य-पाप का फल भी भगवान समोसे के रूप में ही देते हैं। मुझे याद है हमारी पी.जी. पोस्टिंग के दिनों में तो यह फल विशेष रूप से ऋषियों की तरह प्रकट होता था—हम ओ.टी. में केस पाने के लिए सीनियर से मिन्नतें करते और बदले में त्रिकोणीय फल की दान-दक्षिणा अनिवार्य थी।
ऐसा फल जिसे छिलके सहित खाया जा सकता है। सरकारी महकमों में तो रिश्वत को राजनीतिक शुद्धता के चलते ‘चाय-पानी’ कहा गया, पर सच्चाई यह है कि चाय-पानी से काम नहीं चलता। काम तभी बनता है जब चाय के साथ समोसा हो। एक बार हमारे डॉक्टर ने हमें हिदायत दी कि बाहर का खाना बंद करो। हमने तुरंत उसका तोड़ निकाल लिया—हमने बाहर का खोल खाना बंद कर दिया, सिर्फ अंदर का गूदा खाते रहे। डॉक्टर भी संतुष्ट, हम भी अभ्यस्त। महेफ़िल की जान है समोसे… चखना में समोसा हो तो सुरूर कुछ ज्यादा चढ़ा देखा है लोगों का। समोसे ब्रेकफ़ास्ट से लेकर लंच-डिनर स्नैक्स—सब कैटेगरी में अपनी टांग फँसाए है।
“क्या मामा, क्या मौसा… सबको भाता समोसा।“
समोसा एक ऐसा लोकव्यापी फल है जिसे खाने में अमीर-गरीब की कोई भेदरेखा नहीं। सबकी थाली में एक जैसा अधिकार, जैसे लोकतंत्र में सबकी एक वोट। किसी अनचाहे अतिथि को जल्दी विदा करना हो तो बस सामने की दुकान से समोसा मंगवा लीजिए… और कह दीजिये “वो क्या है भाईसाहब, गरम-गरम है… लीजिए… अरे थोड़ी चटनी भी लीजिए साथ में।” वह तृप्त होकर स्वयं चला जाएगा।
समोसा इस देश की मूल संपदा है, फिर भी कुछ जलनखोर इसके मूल को लेकर अफ़वाह फैलाते हैं, समोसे की राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। समोसा कहाँ पैदा हुआ—इस पर बहस ऐसे होती है जैसे कालिदास के पूर्वजों पर शोध हो रहा हो! बंगाली कहेगा—कोलकाता का है। बिहारी बोलेगा—पाटलिपुत्र से। कानपुर का आदमी दावा करेगा कि कलेक्टरगंज के हलवाई ने ही इसे संसार को दिया। इलाहाबाद वाले तो जन्म प्रमाण-पत्र तक दिखा देंगे—“अमोसा मेले” का हवाला देकर।
मेरा इलाहाबादी मित्र एक बार घर आया—“इलाहाबाद जैसा समोसा कहीं नहीं मिलेगा। आकार में तिकोना, आलू-मटर भरा, एकदम खस्ता!” मुझे मानना पड़ा क्योंकि वह खुद मेरे घर इन्हें लेकर आया था… चार समोसे लाल चटनी सहित। मैंने कहा—“अरे, आपके स्वागत में तो मैंने भी समोसे मँगाए थे।” बोले—“तो फिर दोनों मिलकर ही चढ़ाते हैं नैवेद्य!”
इतिहास का पन्ना पलटते हुए एक मूर्ख ‘विद्वान’ ने फारसी शब्द “सम्मोक्सा” से समोसा निकालने की कोशिश की है। भाषा के एक मिलते शब्द से खानपान का इतिहास निकालना वही मूर्खता है जैसे किसी कविता की एक पंक्ति से कवि का पूरा चरित्र-चित्रण निकालना। सच तो यह है कि समोसा भारत का है—और कम से कम 800 साल से भारतवासियों के दिलों में तला जा रहा है। इब्नबतूता ने दिल्ली सल्तनत में गोश्त-मूंगफली वाले समोसे का ज़िक्र किया है। अमीर खुसरो लिखते हैं कि मीट वाला घी-तला समोसा शाही परिवार का प्रिय व्यंजन था। पहले अमीरों का शौक था—फिर समाजवाद आया और गली-मोहल्ले तक उतर आया। आज फ़ाइव-स्टार में भी है और बस अड्डे की ठेलियों पर भी।
समोसे का अपरिवर्तनीय त्रिकोण। ब्रह्मांड विस्तार कर सकता है, सरकारें बदल सकती हैं, पर समोसे का आकार नहीं बदलता—तिकोना ही रहेगा। यही उसकी सांस्कृतिक स्थिरता है। एक ऐतिहासिक युद्ध का जिक्र करें आपको l एक बार समोसे और बर्गर में ठन गई। बर्गर ने कहा—“मैं हेल्दी हूँ, यह अनहेल्दी!” लेकिन सी.एस.ई. की रिपोर्ट ने बीच-बचाव किया—समोसे में कैलरीज़ कम, तेल नियंत्रित और आकार वैज्ञानिक रूप से संतुलित। समोसा विजयी घोषित हुआ। बर्गर ने पराजय मान ली और कोने में बैठकर मेयोनेज़ से अपने घावों पर मरहम लगाया।
हमारे देश में शादी की ‘डील’ टूटे या बने, सब कुछ इस पर निर्भर होता है कि लड़केवालों ने आखिर में समोसा उठाया या नहीं। मंगोड़ी, दही-बड़े, रसगुल्ला—सब औपचारिकताएँ हैं—समोसा ही असली ‘निर्णायक प्रावधान’ है। और यह भी सिद्ध है कि समोसे की उपलब्धता किसी संस्था की विश्वसनीयता तय करती है। जिन दफ्तरों में फाइलें वर्षों से नहीं हिलतीं, वहाँ भी समोसा प्रवेश करे तो पेपर अपनी जगह से हिलकर दूसरी जगह शिफ्ट हो जाते हैं।
समोसे पर तो शालू का प्यार भी निर्भर है मित्र… समोसा शालू के प्यार का एकमात्र गवाह—इस प्यार को अमर करने के लिए खड़ा है। जिस दिन समोसे से आलू गायब… सोचो उस दिन क्या होगा शालू के प्यार का!
समोसा ज़िम्मेदार नागरिक की तरह टिका हुआ है—आप इसे कितना ही धुत्कारेँ, कितने ही रिज़ोल्यूशन इसकी महक ने तुड़वाए हैं… कितने ही पतले होने के डायट-प्लान की खोखली सच्चाई को इसने ध्वस्त किया है… कितने ही गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट की रोज़ी-रोटी का एकमात्र सहारा—जब तक थाली में रहेगा समोसा, डॉक्टरों का अडिग रहेगा भरोसा।
सच कहें तो पूरे भारत में इसकी सार्वभौमिक सरकार चलती है। मैं तो राष्ट्रभक्तों से कहूँगा की लगे हाथों इसे राष्ट्रीय नाश्ता घोषित किया जाए तो कोई बात बने ।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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