समोसा: भारतीय सौंदर्यशास्त्र का प्रथम त्रिकोणीय विश्वविद्यालय

कला की दुनिया बड़े विचित्र ढंग से चलती है। एक तरफ़ कलाकार मकराने के संगमरमर में ‘आत्मा–पदार्थ–ऊर्जा’ का ब्रह्मांडीय संतुलन तलाश रहे होते हैं, और दूसरी तरफ़ हम जैसे साधारण नागरिक वही संतुलन समोसे के तीन कोनों में ढूँढ लेते हैं। अब इसमें किसकी दृष्टि ऊँची है—यह तो इतिहास ही तय करेगा; पर मेरा गहरा संदेह है कि यूरी मायस्को ने “ट्रिनिटी” गढ़ने से पहले हमारे कैंटीन का समोसा चखा होगा। और अगर नहीं चखा, तो यह कला-इतिहास का एक बड़ा अन्याय है।

आप ज़रा मूर्ति का वर्णन पढ़िये—तीन पंख, एक-दूसरे में समाहित, निरंतर गति में परिवर्तित, विरोधों का सामंजस्य, प्रकाश का खेल, अतीत–वर्तमान–भविष्य का संलयन… सुनते ही ऐसा लगता है जैसे कलाकार ने समोसे  का रसास्वादन करते हुए इस महान कृति को बाने का संकल्प लिया हो  । सच पूछिए तो यह सारा ज्ञान-विज्ञान भी कोई नई खोज नहीं। समोसा बरसों से यही कर रहा है—सफ़लतापूर्वक, निस्संग भाव से, बिना किसी अंतर्राष्ट्रीय निवास कार्यक्रम के।

समोसा भी त्रिकोण है—एक कोना आत्मा, एक पदार्थ, एक ऊर्जा। आत्मा कोनों पर तैरती है, पदार्थ भीतर भरा रहता है, और ऊर्जा तली हुई सतह से बाहर फूटती है। फर्क बस इतना है कि मूर्तिकार इसे “शाश्वत चक्र” कहते हैं और हम इसे शाम की चाय के समय का अपिटाइज़र । मूर्ति में सूरज की किरणें पड़ें तो वह सुबह की पारदर्शिता से लेकर सूर्यास्त की सुनहरी आभा तक रंग बदलती है। समोसे पर पड़ें तो वह भी कुछ ऐसा ही करता है—बस अंतर इतना है कि उसके रंग-बदलाव के साथ हमारी भूख  को नहीं बदलते ।

यूरी मायस्को की “ट्रिनिटी” ग्वालियर के आईटीएम विश्वविद्यालय के खुले परिसर में स्थापित है। कहा जाता है कि यह वहाँ ध्यान, चिंतन और आंतरिक संतुलन का स्थान बन गई है। अब अगर समोसे को भी किसी विश्वविद्यालय के खुले लॉन में स्थापित कर दिया जाए, तो वह भी ध्यान का अद्भुत माध्यम बन जाए—यह अलग बात है कि लोग ध्यान करते-करते उसे खा ही  डालेंगे और फिर नई स्थापना करनी पड़ेगी। संगमरमर की मूर्ति का यह लाभ है कि कम-से-कम उसकी जगह खाली नहीं होती।

मूर्ति दिनभर प्रकाश को पकड़कर बदलती रहती है। समोसा भी तो ऐसा ही करता है—सुबह दिखे तो एक अर्थ, दोपहर दिखे तो दूसरा, और शाम को दिखे तो तीसरा। अंतर बस यह है कि मूर्ति स्थिर रहती है और समोसा क्षणभंगुर। दर्शनशास्त्र की भाषा में कहें तो मूर्ति ‘नश्वर को अजर’ बनाती है, और समोसा ‘अजर को नश्वर’।

और बहस तो यह भी चल सकती है कि समोसे का अंदर का आलू ही वह “जीवित ऊर्जा” है जिसकी बात कलाकार कर रहे हैं। जब वह ऊर्जा मनुष्य तक पहुँचती है, तो उसके कदम स्वतः ही चाय की दुकान की ओर बढ़ जाते हैं। इसे आप आध्यात्मिक आकर्षण भी कह सकते हैं और भूख का गुरुत्वाकर्षण भी।

अब आप कहेंगे कि मैं महान मूर्तिकार के शिल्प को समोसे के स्तर पर क्यों ला रहा हूँ? तो मैं विनम्रता से कहूँगा—मैं कुछ नहीं कर रहा, त्रिकोण कर रहा हूँ। त्रिकोण आकृति का यह सार्वभौमिक प्रभाव है। दुनिया के बड़े-बड़े दर्शन इसी पर खड़े हैं। मिस्र के पिरामिड से लेकर गणित की थियोरियों तक, सब त्रिकोण के आगे नतमस्तक हैं। ऐसे में समोसा पीछे नहीं रह सकता। आखिर वह भारतीय सभ्यता का त्रिकोणीय ब्रह्म है—सस्ता, स्वादिष्ट और सर्व-सुलभ आप सभी के लिए ।

यूरी मायस्को की “ट्रिनिटी” विविधता में एकता, गति में शांति और मौन में प्रकाश का संदेश देती है। समोसा भी यही देता है—बस भाषा थोड़ी घरेलू है। उसके भीतर मौन में आलू है, बाहर स्थिरता में कुरकुरापन है, और कुल मिलाकर वह एक ऐसी एकता है जिसमें सब कुछ एक साथ समाहित है।

मेरा नम्र प्रस्ताव है कि यदि कभी कलाकार भारत दुबारा आएँ तो उन्हें समोसे का राष्ट्रीय दर्शन अवश्य समझाया जाए। संभव है कि उनकी अगली मूर्ति का नाम हो—
ट्रिनिटी II – द ग्रेट इंडियन समोसा”
और यह भी संभव है कि वह मूर्ति अंतर्राष्ट्रीय कला जगत में क्रांति ला दे।

कला का काम है विचारों को ऊँचा उठाना, और समोसे का काम है मनोबल को। दोनों ही अपना-अपना धर्म निभा रहे हैं। बस एक को संग्रहालय में रखा जाता है और दूसरे को पेट में।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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