जब किसी सभा, किसी आयोजन या किसी बौद्धिक संकेत में यह कहा जाता है कि अमुक आयु से नीचे वालों का प्रवेश वर्जित है, तब प्रश्न केवल शारीरिक आयु का नहीं रह जाता। उस क्षण मनुष्य अपने भीतर झाँकने लगता है—मैं ज्ञान की दृष्टि से कितना बड़ा हूँ, कितना छोटा हूँ, या क्या मैं वास्तव में बड़ा हूँ भी या नहीं। शरीर की आयु एक निश्चित गणना है, पर चेतना की आयु किसी प्रमाणपत्र से तय नहीं होती। कई बार जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़ा व्यक्ति ज्ञान में शैशव अवस्था में होता है, और कभी-कभी कोई अल्पायु मनुष्य गहरी दृष्टि का अधिकारी हो जाता है।
ज्ञान की दुनिया में सबसे बड़ा भ्रम यही है कि ज्ञानी एक-दूसरे के सामने बैठकर विमर्श करेंगे। व्यवहार में अक्सर होता यह है कि विमर्श शास्त्रार्थ में बदल जाता है, और शास्त्रार्थ से संवाद नहीं, अहंकार जन्म लेता है। “मैं जानता हूँ”—यह वाक्य जैसे ही भीतर जड़ जमाता है, ज्ञान की गति रुक जाती है। सच्चा ज्ञानी वह नहीं जो अधिक बोलता है, बल्कि वह है जो अज्ञानी को भी अपने साथ बैठने देता है। क्योंकि ज्ञान बाँटने से बढ़ता है और परंपरा तभी बनती है जब पीढ़ियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं—कड़ी से कड़ी बनती हुई एक लड़ी।
स्वाध्याय का अर्थ केवल पढ़ना नहीं है, बल्कि स्वयं को परखना है—यह देखना कि हमने कितना ग्रहण किया, कितना केवल ओढ़ लिया, और कितना आडंबर बन गया। इस आत्म-परीक्षण में जब यह बोध होता है कि “मुझे पूरी समझ नहीं है”, तभी ज्ञान का वास्तविक द्वार खुलता है। यह स्वीकार ही सबसे बड़ा साहस है।
संगति का प्रभाव इसी बिंदु से समझा जा सकता है। कुछ लोगों के साथ बैठकर, कुछ बातों को सुनकर, बिना तर्क जाने, बिना कारण खोजे, भीतर कुछ बदल जाता है। यह परिवर्तन क्यों होता है—यह मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान, दर्शन और तर्क सभी से पूछा जा सकता है। पर अनुभव कहता है कि जैसे अग्नि में हाथ रखने से जलन होती है, वैसे ही किसी सार्थक शब्द, किसी सच्ची कविता या किसी गहरी अनुभूति से मन प्रभावित होता है। कारण जानना उपयोगी है, पर अनुभूति को नकार देना आत्मघाती है।
कविता, कला और संगीत का मूल प्रश्न यही है—क्या वह सीधे मन से संवाद कर पाते हैं या नहीं। विद्वत व्याख्याएँ, सिद्धांत और वर्गीकरण तब तक अर्थपूर्ण हैं, जब तक वे इस सीधे संवाद को बाधित न करें। जब हम यह तय करने लगते हैं कि कविता पात्र में है, अनुकार्य में है या शिल्प में—तब हम उस सरल सत्य से दूर चले जाते हैं कि कविता का मूल्य उसकी पहुँच में है। पढ़ी-लिखी माँ की लोरी हो या अनपढ़ माँ की—महत्व शब्दों का नहीं, संवेदना का है।
जहाँ गद्य और कविता की सीमाएँ तय की जाती हैं, वहाँ अंततः मन ही साक्ष्य बनता है। जो रचना अहंकार के कवच को भेदकर भीतर कुछ हिला दे, वही मनुष्य की जीवित उपस्थिति का प्रमाण होती है। यही सम्यक दृष्टि का पहला संकेत है।
ज्ञान और अनुभव को समझने के लिए प्रकृति सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्षा खेत में भी होती है, कंक्रीट के जंगल में भी, नाली में भी और सीप में भी। प्रश्न यह नहीं कि वर्षा कहाँ हुई, प्रश्न यह है कि किसने उसे कैसे ग्रहण किया। ज्ञान भी ऐसा ही है—वह सब पर पड़ता है, पर उससे मोती किसके भीतर बनते हैं, यह दृष्टि तय करती है।
कला की यात्रा में यह भी देखा जाता है कि जैसे-जैसे पदार्थ घटता है, तत्व बढ़ता जाता है। कुछ कलाएँ भौतिक हैं, कुछ प्रतीकात्मक, और कुछ पूरी तरह अनुभूति-आधारित। रचनात्मकता का उदय किसी गणना से नहीं होता। रचनाकार स्वयं भी नहीं जानता कि वह क्यों लिखता है—वह लिखता है क्योंकि उसे अच्छा लगता है, क्योंकि वह विवश है, क्योंकि भीतर कुछ उमड़ता है जिसे रोक पाना संभव नहीं होता।
इसी यात्रा में एक कठिन प्रश्न उठता है—क्या रचनात्मकता का अंत विक्षिप्तता है? इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ महान सृजन के बाद मौन आ गया, जहाँ शब्द थम गए। पर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि कला पागलपन की ओर ले जाती है, एक अत्यंत सरलीकृत और अन्यायपूर्ण धारणा है। कई बार मौन भी सृजन का ही एक रूप होता है। हर बहाव को शब्द नहीं चाहिए होते।
समस्या तब पैदा होती है जब समाज उस स्थिति को समझ नहीं पाता और उसे नाम दे देता है—“पागल”, “भटका हुआ”, “असामान्य”। जो हमारी समझ से बाहर होता है, हम उसे खारिज कर देते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ आध्यात्मिकता, कला और धर्म का सार छूट जाता है और केवल लेबल बचते हैं।
सम्यक दृष्टि का अर्थ है—संतुलन। न अंधी श्रद्धा, न अहंकारी बुद्धि। आज कई शब्द अपने मूल अर्थ खो चुके हैं। जो कभी आत्म-परीक्षण के संकेत थे, वे अब गाली या भ्रम बन गए हैं। इसलिए आवश्यकता है अर्थों की पुनर्प्राप्ति की, शब्दों की आत्मा को पहचानने की।
करुणा इसी पुनर्प्राप्ति का केंद्र है। करुणा कोई बाहरी प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भीतर से स्वतः बहने वाला स्रोत है। वह घटना-जन्य नहीं, चेतना-जन्य है। जब करुणा भीतर से उठती है और हृदय की ओर लौटती है, तब वह मनुष्य को शुद्ध करती है। यही करुणा हिंसा, आतंक और वैमनस्य से थके संसार के लिए सबसे बड़ा उत्तर है।
सम्यक ज्ञान का अर्थ है—बुद्धि का निरस्तीकरण नहीं, बल्कि उसका संतुलन। बुद्धि को रोकना नहीं, उसकी धारा को मोड़ना। जैसे नदी को बाँधकर नहीं, तटबंध देकर दिशा दी जाती है। इसी संतुलन से शिल्प बनता है, मूर्ति बनती है, कविता आकार लेती है। हर चोट पत्थर को तोड़ती नहीं, बल्कि उसे रूप देती है।
आज आवश्यकता है कि जो भी अनुभव, विचार या रचना हमारे सामने आए, उसमें पहले यह देखें कि क्या अच्छा था। जो सार है, उसे ग्रहण करें। सम्यक दृष्टि वही है जो तत्त्व को पहचानती है, शोर को नहीं।
क्योंकि अंततः ज्ञान का उद्देश्य अधिक जानना नहीं, बल्कि अधिक मानवीय होना है।
और जहाँ कोई शब्द, कोई रचना, कोई अनुभूति शांति दे—वही सम्यक ज्ञान का प्रमाण है।
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