अलाव, अंगीठी और उल्टे पैरों वाली काकी

अलाव, अंगीठी और उल्टे पैरों वाली काकी

सच कहें तो बचपन की स्मृतियाँ कभी “मेरी” या “आपकी” नहीं होतीं—वे लगभग सबकी “एक-सी” होती हैं। बस घर का पता बदल जाता है, यादों की डाक उसी मोहल्ले में उतरती है। किसी के यहाँ आँगन चौड़ा होता है, किसी के यहाँ गलियारा संकरा—पर अंगीठी की आँच, ढिबरी की लौ और डर के मीठे किस्सों की धड़कन सब जगह समान रहती है।

सर्दियों की वो अंगीठी—जिसके चारों तरफ़ हम ऐसे जमा रहते थे जैसे दुनिया की सारी गर्मी वहीं से जारी होती हो। कोयले की हल्की-सी गंध, राख की उड़ती रुई-सी धूल, और किसी कोयले के चटकने की आवाज़ पर अचानक सबका “ओहो!” कर उठना। जैसे आग नहीं, कोई सामूहिक रहस्य टूट गया हो। रात का ढिबरी वाला उजाला—जिसमें परछाइयाँ भी रिश्तेदार लगती थीं; दीवार पर नाचती, छत पर फिसलती, और हमारी आँखों में उतरकर सपनों का रास्ता बनातीं। आज एलईडी की रोशनी है—पर परछाइयाँ अब रिश्तेदार नहीं रहीं, बस बिजली का हिसाब हैं।

गाँव का वो कलेवा—जिसका स्वाद आज भी किसी सुबह की हथेली में रखा मिलता है। सुबह-सुबह घर में रई बिलोने की आवाज़… “छन-छन… छन-छन…” जैसे दूध नहीं, समय मथा जा रहा हो। चक्की की घरघराहट—जिसमें गेहूँ पिसता था और साथ में हमारी नन्ही-नन्ही जिदें भी। और उन आवाज़ों के बीच, दादी-नानी के किस्से—जहाँ हर मोड़ पर या तो कोई जिन्न निकल आता था, या कोई भूत; और हम डरते भी थे, सुनते भी थे, और फिर उसी डर को लेकर कंबल में सबसे मज़े से सो जाते थे। डर भी तब एक सुविधा था—नींद की सहायक।

फिर वो बूढ़ी काकी… जिसे हमने अपने बाल-बुद्धि वाले न्यायालय में कब का “चुड़ैल” घोषित कर रखा था। हम उसके उल्टे पैर ढूँढते रहते—जैसे सच का सबूत बस उसी में छिपा हो। कभी उसे देखकर माँ के पल्लू के पीछे छुप जाते, फिर चोरी-चोरी झाँकते कि कहीं सच में पैर उल्टे तो नहीं। हर बार वही निष्कर्ष—“उल्टे नहीं हैं… लेकिन फिर भी हो सकती है!” बचपन का तर्क बड़ा दिलचस्प होता है—वह सबूत से नहीं, रोमांच से चलता है।

ऐसी अनगिनत स्मृतियाँ हैं—जिनकी कोई सूची नहीं बनती, बस भीतर का घर बनता चला जाता है। और इसी घर में रिश्तों के नाम भी सामूहिक होते हैं। संयुक्त परिवार का कमाल देखिए—दादाजी सिर्फ़ दादाजी नहीं रहते, वे “भाई” बन जाते हैं, क्योंकि पापा और चाचा भी उन्हें “भाई” कहते हैं। ताईजी “भाभी” बन जाती हैं, क्योंकि घर की हवा वही शब्द बोलती है। बचपन शब्द नहीं सीखता, चलन सीखता है। हम पापा को “दादा भाई” कहते रहे—क्योंकि चाचाओं का समूह वही बोलता था। थोड़ा बड़े हुए तो “पापा” कहने की आदत डलवाई गई—जैसे किसी पुरानी फ़ाइल का नाम बदल दिया गया हो।

आज की सुबह कुछ जूझनी-सी लग रही है—वैसी, जैसी मलेरिया बुख़ार आने से पहले लगती है। मीडिया के लिए तो यह ब्रेकिंग न्यूज़ है—रिकॉर्ड टूट गए, थर्मामीटर हिल गया, और पूरी संभावना है कि कल अख़बार चिल्लाएगा—“सदी की सबसे सर्द सुबह!” अब भई, वो सर्दी ही क्या जो कोई रिकॉर्ड न तोड़े! आजकल मौसम पैदा ही इसीलिए होता है कि आते ही कोई पदक जीत ले। मौसम हो तो मौसम की तरह बर्ताव करे—आता-जाता रहे, ठहरकर डराने की क्या ज़रूरत?

और हम इंसान भी कौन से कम बदलू हैं। मौसम को भी थोड़ा हम जैसा होना चाहिए—ऐसा कि एक ही दिन में सर्दी, गर्मी, बारिश—सबका स्वाद मिल जाए। हरफ़नमौला मौसम—बिल्कुल आज के साहित्यकारों की तरह: वही लेखक, पाठक, संपादक, प्रकाशक, समीक्षक—सब कुछ एक साथ। भूमिका बदलते देर नहीं लगती, बस टोपी बदलनी पड़ती है।

हम ठहरे ग्राम्य जीवन की सहज रिवाइंड स्मृतियों से चिपके हुए। हमारे लिए साहित्य का मतलब भी वही—जहाँ भी मौका मिले, थोड़ा-सा गाँव घुसा दो, साहित्य अपने आप लोक-अपीलिंग हो जाता है। और गाँव की सर्दियाँ—माशाअल्लाह! अगहन, पूस और माघ—ये महीने ठंड के लिए बाक़ायदा आरक्षित थे। अगहन बिल्कुल समय पर आता था—आज की तरह नहीं कि ऑफिस के लेट-लतीफ़ कर्मचारी या क्राइम सीन पर “रास्ते में हैं” कहती पुलिस की तरह। अगहन आता, पूरा गाँव जकड़ लेता। मोटी रज़ाइयाँ रात की साथी बनतीं, सुबह वही रज़ाइयाँ ओढ़कर बूढ़े-जवान बाहर निकलते—आँखें खुली, बाकी सब लिपटा हुआ।

अलाव—उसे भी हम अगहन ही कहते थे—जला-जला कर अगहन भगाया जाता था। फिर पूस आता; पूस की पूलियाँ जलतीं और माघ तक ठंड चखती-समझती चली आती। मकर संक्रांति तक पहुँचते-पहुँचते ठंड में थोड़ी तमीज़ आ जाती—धूप की चुटकी, राहत की रेखा।

छुपटुट दुकानों, पनवाड़ी और चाय की टपरियों के सामने अलाव जलते। वहीं किस्सागोई की महफ़िलें जमतीं—राजनीति के चटखारे, मोहल्ले का पोस्टमार्टम, किसकी नौकरी लगी, किसकी बहू ने  सास के ताने पर चप्पल तानी—सब कुछ अलाव की आँच पर सेककर परोसा जाता। चाय की सुड़क-सुड़क के साथ सामूहिक रसास्वादन चलता। अलाव के अपने नियम भी होते—उसका धुआँ हमेशा उसी तरफ़ मुड़ता, जिधर आप उससे बचने बैठते। जैसे धुआँ नहीं, कोई ज़िद्दी पड़ोसी हो।

आज रास्ते में इक्का-दुक्का अलाव दिखते हैं। रूम हीटर आ गए हैं, महफ़िलें चली गईं। पर मित्र, हीटर चाहे जितने आ जाएँ—वो किस्सागोई, वो अपनापन कहाँ से लाओगे?
अलाव सिर्फ़ ठंड नहीं जलाता था—वह दूरी भी पिघलाता था।

रचनाकार –डॉ मुकेश असीमित

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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