सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट
आज मौसम ने जाने किस ज्योतिषीय गणना के बाद यह तय किया कि अब ठिठुरन को रिटायरमेंट दे देना चाहिए। सुबह की धूप में वह पुरानी खीझ नहीं थी, जो हड्डियों में उतरकर ऑर्थोपेडिक चेतना को भी कंपा दे। आज की धूप में वसंती उष्णता थी—हल्की, लुभावनी, आत्मविश्वासी। जैसे बसंत ऋतु ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर घोषणा कर दी हो—“मैं आ चुकी हूँ, कृपया पीला परिधान धारण करें।”
वसंती स्वर्णिम रंग ने मुझे भी अपने प्रभाव में ले लिया। अलमारी खोली तो महीनों से अंदर-बाहर होती, मौसम विभाग की अनिश्चितताओं की शिकार, एक आग्नेय वर्ण की पीली टी-शर्ट कोने से झाँकती मिली। वह मुझे देख रही थी—थोड़ी उम्मीद, थोड़ी शिकायत भरे लहजे के साथ। जैसे कह रही हो—“कब तक मुझे सिर्फ बसंत पंचमी की प्रतीक्षा में रखोगे? मैं भी सार्वजनिक जीवन चाहती हूँ।”
आज मैंने उसे न्याय दिया। उसे पहन लिया। वह मेरे शरीर पर ऐसे सजी जैसे किसी सांसद को अचानक मंत्रालय मिल गया हो। आईने में स्वयं को देखा तो लगा मानो मैं सरसों के खेत का चलता-फिरता प्रतिनिधि हूँ। मन में हल्की-सी साहित्यिक लहर उठी—धरती की पीली चुनरिया, पलाश की ज्वाला, कोयल की कूक, भ्रमरों की गुंजन…।
इसी काव्यमय मूड में स्कूटी स्टार्ट की और रेलवे हॉस्पिटल की ड्यूटी के लिए निकल पड़ा।
लेकिन प्रकृति को शायद मेरा यह काव्यात्मक आत्ममुग्ध होना रास नहीं आया। गाँव की सीमा पार करते ही सरसों के खेतों से भटके चेपे—जानते हैं न आप… कभी आपका भी पाला पड़ा ही होगा… बसंत के आगमन के ढोल पीटने वाले अपने सनातनी राग दरबारी गान करते हुए सूक्ष्म, पंखदार, पर अत्यंत संगठित जीव—ने मेरा स्वागत किया। स्वागत भी ऐसा जैसे भरी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जूतमपैजार हो जाती है।
चेपों का झुंड सीधे मेरे सीने पर, कंधों पर, हेलमेट पर आ गिरा। मुझे क्षणभर को लगा कि सरसों का कोई परित्यक्त खेत मुझे अपना बिछुड़ा हुआ वारिस समझ बैठा है। मेरी पीली टी-शर्ट को उन्होंने चलायमान सरसों का खेत घोषित कर दिया था।
अब मैं स्कूटी पर था—एक हाथ से हैंडल संभालता, दूसरे से चेपों को झटकता, और तीसरे काल्पनिक हाथ से अपनी गरिमा बचाता हुआ। पीछे से आते राहगीरों को भी बचाते हुए, क्योंकि यह “चेपा-आक्रमण” सिर्फ निजी नहीं, सार्वजनिक संकट था।
मैं सोचता रहा—कवि और साहित्यकार बसंत पंचमी पर कितनी अलंकृत रचनाएँ लिखते हैं। कोयल की कूक, पलाश की ज्वाला, मधुर समीर, वसंत रागिनी, धरती की पीली चुनरिया… सबका वर्णन होता है। पर इस पीली चुनरिया के ऊपर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करते चेपों का उल्लेख कहीं नहीं मिलता।
क्या कारण है? क्या चेपे साहित्यिक लॉबी में शामिल नहीं? क्या उनकी पीआर टीम कमजोर है?
सच तो यह है कि बसंत का वास्तविक भू-राजनीतिक विश्लेषण चेपों के बिना अधूरा है। सरसों की पीली चादर के ऊपर वे अपनी सूक्ष्म साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएँ लेकर मंडराते हैं। उनका जीवन-दर्शन स्पष्ट है—“जहाँ पीला, वहाँ हमारा।”
रेलवे हॉस्पिटल पहुँचते-पहुँचते मेरी टी-शर्ट पर चेपों के हस्ताक्षर थे। कुछ जीवित, कुछ शहीद। मैंने आईने में स्वयं को देखा—मैं अब कवि नहीं, युद्धभूमि से लौटा सेनापति लग रहा था।
ड्यूटी के बीच-बीच में मन में विचार आता रहा—यदि कालिदास आज होते, तो क्या “ऋतुसंहार” में चेपों का एक सर्ग जोड़ते? क्या किसी आधुनिक कवि ने चेपों की सामूहिक उड़ान को प्रेम के प्रतीक के रूप में देखा है?
मेरा निवेदन है—हे साहित्यकार बंधुओं! बसंत का सौंदर्य लिखिए, अवश्य लिखिए। पर उसके यथार्थ को भी स्थान दीजिए। उस धरती की पीली चादर पर मंडराते चेपों के मासूम आतंक को भी अभिव्यक्ति दीजिए। उनकी फ्रस्ट्रेशन और आकांक्षाओं को भी समझिए। वे भी तो अपने तरीके से बसंत का उत्सव मना रहे हैं।
शाम को घर लौटा तो पत्नी ने पूछा—“आज इतने पीले क्यों दिख रहे हो?”
मैंने कहा—“बसंत ने आशीर्वाद दिया है।”
बसंत का सौंदर्य दूर से अद्भुत है। पास जाकर देखो तो चेपों की लोकतांत्रिक भीड़ भी उसका हिस्सा है।
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