भारत की सांस्कृतिक स्मृतियों में जब फ़िल्म की बात चलती है, तो बंगाल की मिट्टी से उभरा एक नाम ध्वनि की तरह बजता है—सत्यजीत रे। वे केवल फ़िल्म बनाते नहीं थे, बल्कि जीवन को उसके सबसे सच्चे, सबसे नंगे, सबसे मासूम और सबसे खतरनाक रूप में उतार लेते थे। रे की फिल्में समय से परे हैं। जिन्हें ब्लैक एंड व्हाइट से डर लगता है, वे भी ‘पाथेर पाँचाली’ या ‘अपुर संसार’ देखकर समझ जाते हैं कि रंगों की ज़रूरत वहाँ नहीं होती जहाँ चरित्रों की आत्मा स्वयं प्रकाश बनकर चमकती है। यही वजह थी कि हॉलीवुड के निर्देशक वेस एंडरसन रे के संगीत के दीवाने थे और अपनी फिल्म में उन्होंने रे के ही धुनों का इस्तेमाल किया—क्योंकि भावनाओं की भाषा का कोई कॉपीराइट नहीं होता।
2 मई 1921 को जन्मे रे शायद खुद भी नहीं जानते थे कि वे भारतीय सिनेमा की पहचान बनेंगे। युवा रे ने 1947 में कलकत्ता फिल्म सोसायटी बनाई, जहाँ फिल्मों की आलोचना पूरे उत्साह से की जाती थी। एक मज़ेदार घटना आज भी याद की जाती है—सोसायटी के सदस्य किसी मकान मालिक के कमरे में बैठे बंगाली फिल्मों की बुराइयाँ कर रहे थे, तभी मकान मालिक आया और सबको बाहर निकाल दिया। बोलने का लहजा ऐसा मानो कह रहा हो—“ये फ़िल्मी लोग मेरे घर की पवित्रता बिगाड़ देंगे!” वही रे आगे चलकर भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक दूत बने—एक विडंबना जिसे इतिहास ने भी मुस्कुरा कर स्वीकार किया।
रे की सबसे अद्भुत प्रतिभाओं में एक था उनका अवलोकन। वे सिर्फ कहानी नहीं देखते थे—वे रोशनी, छाया, ध्वनि, लय, अभिनय, चेहरे और क्षण का पूरा गणित पहचान लेते। दुनिया की कोई भी हॉलीवुड फिल्म देखकर वे तुरंत बता देते कि यह MGM की स्टाइल है, यह वार्नर ब्रदर्स की तकनीक है, यह पैरामाउंट की बनावट है। जैसे कोई उस्ताद संगीतकार सुरों की पहचान से राग समझ लेता है, वैसे ही रे स्टूडियो की पहचान से कहानी की आत्मा पकड़ लेते थे। इसी अवलोकन ने उन्हें वह निर्देशक बनाया जो कलाकार से पहले रचनाकार और शिल्पकार था।
1950 की इंग्लैंड यात्रा उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल गई। पत्नी के साथ गए रे वहाँ विज्ञापन बनाने का प्रशिक्षण तो ले रहे थे, लेकिन मन तो कहीं और था। इस यात्रा में उन्होंने 99 फिल्में देखीं—और उनमें से एक थी ‘बाइसिकल थीव्स’। इस फिल्म ने रे के भीतर एक तूफ़ान जगा दिया, ऐसा तूफ़ान जिसमें कथा, यथार्थ, गरीबी, संघर्ष और सौंदर्य सब एक साथ खड़े थे। उन्होंने लौटते समय जहाज़ में ही बैठकर ‘पाथेर पाँचाली’ का पहला ट्रीटमेंट लिख डाला। विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के उपन्यास का कवर डिज़ाइन करते हुए जिस कहानी से उनका पहला परिचय हुआ था, वही आगे चलकर भारत की महानतम फिल्मों में से एक बनने वाली थी—जैसे किसी कथा ने कलाकार को नहीं, कलाकार ने कथा को खोज लिया हो।
रे सिर्फ निर्देशक नहीं थे। वे अपने ही फिल्म स्टूडियो की तरह थे—लेखक, संगीतकार, एडिटर, कैमरा-डिज़ाइनर, कवर-आर्टिस्ट, संवाद-लेखक और कभी-कभी मेकअप सलाहकार भी। रिचर्ड एटेनबरो ने कहा था, “दुनिया में बहुत कम लोग इतने काम अकेले कर सकते हैं—और उनमें सत्यजीत रे सबसे ऊपर हैं।” उनकी फिल्मों में डिटेल ऐसा जादू था कि जला हुआ चेहरा भी प्लास्टिक सर्जन को असली लगता। एक सर्जन ने तो एक कलाकार को देखकर सर्जरी की सलाह दे डाली—उसे पता नहीं था कि वह रे की कला है, कोई घाव नहीं।
‘पाथेर पाँचाली’ ने दुनिया को मंत्रमुग्ध कर दिया—लेकिन भारत? भारत को चिंता थी कि इससे देश की गरीबी दिखेगी। इसलिए फिल्म को ऑस्कर में भेजने से रोक दिया गया। विडंबना देखिए—जिस फिल्म ने देश की इज़्ज़त विश्व में बढ़ाई, उसे खुद देश ने ही रोक दिया। और यही फिल्म सैकड़ों नए निर्देशकों के लिए प्रेरणा बनी। रे के लिए यह पुरस्कारों का नहीं, दृष्टि का सवाल था। वे चमकदार सफलता में नहीं, अपने किराए के घर में साधारण जीवन जीते हुए ज्यादा खुश रहते थे।
उनसे किसी ने पूछा—“क्या आप अमीर बनना चाहते थे?”
रे ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—“मैं पहले से अमीर हूँ। मेरे पास किताबें हैं, संगीत है, और शांत मन है।” जीवन का धन उन्होंने नोटों में नहीं, अनुभवों में गिना।
कुरोसावा ने उनके बारे में कहा था—“रे को न देखना ऐसा है जैसे सूरज और चांद को न देखना।” दुनिया का यह सबसे बड़ा सम्मान शायद किसी भी भारतीय फिल्मकार को नहीं मिला। यह श्रद्धा रे ने अपने लिए नहीं, अपने सिनेमा के लिए अर्जित की थी—क्योंकि उनकी फिल्में मनुष्य को भीतर से बदल देती हैं।
1992 में जब रे को लाइफटाइम ऑस्कर दिया गया, वे अस्पताल के बिस्तर पर लेटे थे। हाथ में ट्रॉफी ली, कैमरे की तरफ देखा और कहा—“My gratitude to the Academy.” भाषण खत्म होते ही पूरी दुनिया खड़ी हो गई। ताली की वह आवाज़ सिर्फ सम्मान नहीं थी—वह यह घोषणा थी कि कलकत्ता की गलियों में रहने वाले एक शांत, विनम्र कलाकार ने विश्व सिनेमा को नई आत्मा दी है।
कुछ दिन बाद रे चले गए। लेकिन उनकी फिल्में आज भी वहीं हैं—चलती हुई, सांस लेती हुई, दर्शक की आँखों में उतरती हुई। सत्यजीत रे कोई व्यक्ति नहीं थे—एक भावना थे। एक दृष्टि, एक विनम्र चमत्कार। उन्होंने सिनेमा को कहानी नहीं बनाया—सिनेमा को मनुष्य बना दिया।
और जो कला मनुष्य बन जाए, वह कभी नहीं मरती।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
मेरी व्यंग्यात्मक पुस्तकें खरीदने के लिए लिंक पर क्लिक करें – “Girne Mein Kya Harz Hai” और “Roses and Thorns”
Notion Press –Roses and Thorns
संपर्क: [email protected]
YouTube Channel: Dr Mukesh Aseemit – Vyangya Vatika
📲 WhatsApp Channel – डॉ मुकेश असीमित 🔔
📘 Facebook Page – Dr Mukesh Aseemit 👍
📸 Instagram Page – Mukesh Garg | The Focus Unlimited 🌟
💼 LinkedIn – Dr Mukesh Garg 🧑⚕️
🐦 X (Twitter) – Dr Mukesh Aseemit 🗣️
Comments ( 0)
Join the conversation and share your thoughts
No comments yet
Be the first to share your thoughts!