स्कारलेट और राधा : दो सभ्यताएँ, दो स्त्रियाँ, दो जीवन-दर्शन

स्कारलेट और राधा : दो सभ्यताएँ, दो स्त्रियाँ, दो जीवन-दर्शन

दो फ़िल्में—दो महाद्वीप—दो सभ्यताएँ—और दो ऐसी स्त्रियाँ, जो अपने-अपने समाज की आत्मा बनकर परदे पर उतरीं। एक ओर Gone with the Wind—1936 में प्रकाशित उपन्यास पर आधारित और 1939 में बनी हॉलीवुड की कालजयी कृति—और दूसरी ओर Mother India—1957 में महबूब ख़ान के निर्देशन में बनी भारतीय सिनेमा की शिखर रचना। दोनों फ़िल्में अपने-अपने देश के सिनेमा इतिहास में मील का पत्थर हैं, लेकिन उनकी वास्तविक शक्ति उनके केंद्रीय स्त्री-चरित्रों में निहित है—एक ओर स्कारलेट ओ’हारा और दूसरी ओर राधा।

स्कारलेट ओ’हारा और राधा केवल पात्र नहीं हैं, बल्कि दो भिन्न जीवन-दर्शन हैं। स्कारलेट उस पश्चिमी स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है, जो युद्ध, भूख और सामाजिक पतन के बीच अपने व्यक्तिगत अस्तित्व को बचाने की जिद में खड़ी रहती है। वहीं राधा भारतीय स्त्री की वह छवि है, जो विपत्ति में भी कर्तव्य, मर्यादा और सामूहिक नैतिकता का दामन नहीं छोड़ती। एक का संघर्ष “मैं कैसे बचूँ?” से शुरू होकर वहीं समाप्त हो जाता है; दूसरी का संघर्ष “हम कैसे टिकें?” से जन्म लेता है और समाज तक फैल जाता है।

जब हम Mother India की राधा और Gone with the Wind की स्कारलेट ओ’हारा को आमने-सामने रखते हैं, तो हम जान पाते हैं कि पूर्वी (भारतीय) और पश्चिमी (अमेरिकी) स्त्री-चेतना, उनके जीवन-दर्शन, मूल्यबोध और संघर्ष की दो भिन्न परंपराएँ अपने-अपने नैसर्गिक, बिना संपादित किए हुए रूप में सामने आती हैं। दोनों अपने-अपने समाज की उपज हैं, दोनों अपने समय की सबसे सशक्त स्त्री आकृतियाँ हैं, और दोनों ही विपत्ति में टूटने के बजाय “खड़ी रहने” की जिद रखती हुई दिखाई देती हैं—पर उनके खड़े रहने का अर्थ, तरीका और नैतिक आधार बिल्कुल अलग है।

राधा का जीवन कर्तव्य की मिट्टी में रचा-बसा है। वह जन्म से ही संबंधों, समाज और भूमि के साथ बंधी हुई है। उसका संघर्ष बाहर से ज़्यादा भीतर का है—भूख, कर्ज़, अपमान और मातृत्व के बीच संतुलन साधने का संघर्ष। राधा का जीवन किसी व्यक्तिगत आकांक्षा से संचालित नहीं होता; उसकी प्राथमिकता “मैं” नहीं, “हम” है। वह अपने दुखों को निजी नहीं समझती; वह उन्हें सामूहिक जीवन की कीमत मानकर सहती है। जब वह साहूकार के अमानवीय प्रस्ताव को ठुकराती है, तब वह केवल एक स्त्री नहीं बोलती—वह उस सभ्यता की आवाज़ बनती है, जहाँ देह नहीं, श्रम और आत्मसम्मान जीवन की मुद्रा हैं। राधा का सबसे कठोर निर्णय—अपने विद्रोही बेटे पर गोली चलाना—व्यक्तिगत प्रेम के विरुद्ध सामाजिक न्याय का चुनाव है, जिसे कितनी निर्ममता से लिया गया निर्णय कहा जा सकता है। यह निर्णय भारतीय स्त्री की उस सोच को रेखांकित करता है, जहाँ मातृत्व भी निरंकुश बनकर खड़ा नहीं होता; वह धर्म, नियम और समाज के दायरे में बंधा हुआ है।

इसके ठीक उलट, स्कारलेट ओ’हारा का जीवन स्व-केन्द्रित उत्तरजीविता की कथा है। वह ऐसे समाज में जीती है जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और इच्छाएँ नैतिकता से पहले आती हैं। स्कारलेट का संघर्ष भीषण है—युद्ध, भूख, अकेलापन, संपत्ति का नाश, वह सब कुछ जो एक व्यक्ति को तोड़ने के लिए काफ़ी है—पर उसकी प्रतिक्रिया राधा जैसी नहीं है। स्कारलेट समझौता करती है, रणनीति बनाती है और रिश्तों को साधन की तरह इस्तेमाल करती है। वह यह नहीं पूछती कि “क्या सही है?”, बल्कि यह पूछती है कि “क्या किया जाए अपने survival के लिए, क्या करें जो मुझे बचाएगा?”। उसकी प्रसिद्ध प्रतिज्ञा—कि वह फिर कभी भूखी नहीं रहेगी—कोई नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि जीवित रहने का निजी संकल्प है। स्कारलेट के लिए प्रेम भी तब तक अर्थवान है, जब तक वह उसकी सुरक्षा और आकांक्षाओं के अनुकूल हो; इसी कारण वह रेट बटलर जैसे प्रेम को देर से पहचानती है और ऐश्ली जैसे भ्रम में समय नष्ट करती है।

यहीं से पश्चिमी और पूर्वी स्त्री-चेतना का मूल अंतर स्पष्ट होता है। भारतीय स्त्री—राधा—का जीवन सामाजिक ढाँचे में गुँथा हुआ है। उसके निर्णयों में व्यक्तिगत इच्छा से अधिक सामाजिक दायित्व का भार होता है। वह “मैं” को “हम” में विलीन करता हुआ एक विशुद्ध भारतीय चरित्र है। उसके लिए स्वतंत्रता का अर्थ नियमों से बाहर निकलना नहीं, बल्कि नियमों के भीतर रहकर आत्मसम्मान बचाना है। इसके विपरीत, पश्चिमी स्त्री—स्कारलेट—का सम्पूर्ण जीवन और उसकी जिजीविषा व्यक्तिगत अस्तित्व की रक्षा पर केंद्रित है। वह समाज को चुनौती देती है, नैतिक सीमाओं को लचीला मानती है और परिस्थितियों के अनुसार अपने मूल्य बदलने से भी नहीं हिचकती। उसके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है—चुनाव की आज़ादी, स्व-केन्द्रित, चाहे उसकी कीमत कोई भी हो।

यहाँ यह कहना भी महत्त्वपूर्ण है कि राधा का जीवन त्याग को महिमामंडित नहीं करता, बल्कि उसे अनिवार्यता के रूप में स्वीकार करता है। वह दुख सहती है, पर उसे लक्ष्य नहीं बनाती; वह पीड़ा को आदर्श में नहीं बदलती। इसके विपरीत, स्कारलेट दुख से भागती नहीं, बल्कि उसे मात देने के लिए हर संभव उपाय करती है—चाहे उसकी कीमत सामाजिक तिरस्कार ही क्यों न हो। राधा समाज के लिए स्वयं को कठोर बनाती है; स्कारलेट स्वयं के लिए समाज से कठोरता झेलती है। दोनों की दृढ़ता समान है, पर उनकी दिशा एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न है।

नारीवाद के संदर्भ में देखें तो स्कारलेट आधुनिक, स्वायत्त और विद्रोही दिखाई देती है, जबकि राधा पारंपरिक और अनुशासित प्रतीत होती है। लेकिन यह सरलीकरण अधूरा है। राधा की शक्ति उसकी नैतिक अडिगता में निहित है—वह व्यवस्था से बाहर नहीं जाती, बल्कि व्यवस्था के भीतर रहते हुए अन्याय को अस्वीकार करती है। वहीं स्कारलेट की शक्ति उसकी अनुकूलन क्षमता में है—वह व्यवस्था को अपने अनुकूल मोड़ने का प्रयास करती है। एक के लिए नैतिकता स्थिर है, दूसरे के लिए परिस्थितिजन्य।

वैसे हम यह कह सकते हैं कि राधा और स्कारलेट दोनों ही अपने-अपने समाज का सच हैं। राधा उस भारत का सच है, जहाँ जीवन सामूहिक है और व्यक्ति समाज से बड़ा नहीं होता। स्कारलेट उस पश्चिम का सच है, जहाँ व्यक्ति की रक्षा सर्वोपरि है और समाज अक्सर पृष्ठभूमि में चला जाता है। एक मिट्टी से ताकत लेती है, दूसरी स्वयं से। एक का जीवन-गान मौन, दृढ़ और गंभीर है; दूसरी का संघर्ष मुखर, चतुर और असहज।

इन दोनों कालजयी फ़िल्मों को साथ रखकर देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि स्त्री-शक्ति की कोई एक परिभाषा नहीं हो सकती। स्कारलेट और राधा—दोनों अपने-अपने समय, समाज और इतिहास की सच्ची उपज हैं। एक अपने निर्णयों से व्यवस्था को चुनौती देती है, तो दूसरी अपने त्याग से व्यवस्था को नैतिक आधार प्रदान करती है। यही कारण है कि ये दोनों पात्र आज भी प्रासंगिक हैं—क्योंकि इनके माध्यम से हम केवल सिनेमा नहीं देखते, बल्कि पश्चिम और पूर्व की स्त्री-चेतना, सोच और मूल्यबोध को आमने-सामने खड़ा हुआ पाते हैं।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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