शिक्षा विनम्र बनाती है — या हमने शिक्षा को ही छोटा कर दिया है?
कहा जाता है—जितना आप शिक्षित होते हैं, उतना ही विनम्र, संवेदनशील और समझदार बनते हैं। शिक्षा केवल डिग्री का नाम नहीं, वह दृष्टि का विस्तार है। वह भीतर का अहंकार गलाकर मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आज की शिक्षा सचमुच हमें विनम्र बना रही है? या वह केवल प्रमाणपत्रों की सजावट बनकर रह गई है?
शिक्षा का अर्थ समग्र शिक्षा है—जिसमें ज्ञान हो, विवेक हो, संवेदना हो, संस्कार हो, और सबसे बढ़कर दूसरों के सुख-दुख को समझने की क्षमता हो। पर आज हमारी स्कूली शिक्षा अधिकतर एक औपचारिकता बन गई है। स्कूल जाना, परीक्षा देना, 33 प्रतिशत या कभी-कभी ग्रेस से पास हो जाना—और बस! क्या यही शिक्षा है? क्या केवल अंकों का जोड़-घटाव ही शिक्षित होने का प्रमाण है?
दूसरी ओर मीडिया ने भी शिक्षा की छवि को विचित्र ढंग से प्रस्तुत किया है। हर दिन हमें ऐसी कहानियाँ सुनाई जाती हैं—“फलाँ व्यक्ति दसवीं फेल था, आज अरबपति है”, “किसी चायवाले ने रील बनाकर करोड़ों कमा लिए”, “किसी ने कॉलेज छोड़ा और स्टार्टअप से इतिहास रच दिया”, “पारिवारिक व्यवसाय संभाला और साम्राज्य खड़ा कर दिया।” ये प्रेरक कहानियाँ अपनी जगह ठीक हैं, परंतु जब इन्हें इस रूप में परोसा जाता है कि मानो औपचारिक शिक्षा अनावश्यक है, तब समस्या पैदा होती है।
धीरे-धीरे समाज में यह वाक्य सामान्य हो गया है—“शिक्षा ने बेरोज़गार पैदा किए हैं।” यह वाक्य सुनने में जितना सरल लगता है, भीतर से उतना ही खतरनाक है। ज़रा ठहरकर सोचिए—जो नौकरी मांग रहे हैं, क्या वे सचमुच उस नौकरी के अधिकारी हैं? क्या उन्होंने अपने भीतर वह योग्यता, वह अनुशासन, वह परिश्रम विकसित किया है जिसकी अपेक्षा है? यदि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का माध्यम रह जाए, यदि 33 प्रतिशत या ग्रेस मार्क्स को ही सफलता मान लिया जाए, तो फिर गुणवत्ता कहाँ से आएगी?
हमने शिक्षा को प्रतिस्पर्धा की दौड़ बना दिया है, पर चरित्र निर्माण का आधार नहीं रहने दिया। परिणाम यह हुआ कि डिग्रियाँ बढ़ीं, पर संवेदनाएँ सिकुड़ती गईं।
मेरा एक व्यक्तिगत अनुभव है, जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। मेरा एक अत्यंत निकट संबंधी है—बहुत सफल व्यवसायी। अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्टार्टअप, करोड़ों का कारोबार, विदेशी दौरों की भरमार, शानदार गाड़ियाँ, विलासिता से भरा जीवन। बाहर से देखने पर सफलता की परिभाषा का साक्षात उदाहरण। लोग उन्हें आदर्श मानते हैं।
परंतु जब मैं भीतर झांकता हूँ, तो एक अलग तस्वीर दिखाई देती है। परिवार के प्रति संवेदना शून्य। रिश्तेदारों के प्रति कोई आत्मीयता नहीं। माता-पिता के प्रति सम्मान का अभाव। स्वार्थ इतना प्रबल कि हर संबंध लाभ-हानि के तराजू पर तौला जाता है। हाँ, समय पर लाखों रुपये माता-पिता के खाते में भेज दिए जाते हैं। पर क्या केवल आर्थिक सहयोग ही पर्याप्त है? क्या माता-पिता के सुख-दुख में शामिल न होना, उनकी भावनाओं को न समझना, उन्हें समय न देना—इसकी भरपाई धन कर सकता है?
जब यह सब देखता हूँ तो भीतर गहरा धक्का लगता है। सोचता हूँ—यदि शिक्षा ने हमें संवेदनशील नहीं बनाया, यदि सफलता ने हमें विनम्र नहीं किया, तो फिर हमने क्या पाया? केवल बैंक बैलेंस? केवल प्रतिष्ठा? केवल दिखावा?
सच्ची शिक्षा व्यक्ति को झुकना सिखाती है। वह बताती है कि जीवन केवल “मैं” का नाम नहीं, “हम” का विस्तार है। वह सिखाती है कि माता-पिता केवल जिम्मेदारी नहीं, आशीर्वाद हैं। रिश्ते केवल अवसर नहीं, विश्वास की डोर हैं। समाज केवल बाजार नहीं, सहभागिता का क्षेत्र है।
आज आवश्यकता है कि हम शिक्षा की परिभाषा पर पुनर्विचार करें। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, जीवन को समझना होना चाहिए। यदि हम अपने बच्चों को केवल यह सिखाएँ कि “कैसे कमाना है”, पर यह न सिखाएँ कि “कैसे जीना है”, तो हम अधूरी शिक्षा दे रहे हैं।
समग्र शिक्षा वह है जो व्यक्ति को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए, पर साथ ही भावनात्मक रूप से परिपक्व भी करे। जो उसे सफल बनाए, पर साथ ही विनम्र भी रखे। जो उसे आत्मनिर्भर बनाए, पर आत्मकेंद्रित न बनाए।
हमें यह भी समझना होगा कि कुछ अपवादों की कहानियाँ पूरी व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकतीं। हर चायवाला अरबपति नहीं बनता, हर ड्रॉपआउट स्टार्टअप का सितारा नहीं बनता। पर हर व्यक्ति यदि शिक्षित होकर संवेदनशील और विवेकशील बन जाए, तो समाज अवश्य बेहतर बन सकता है।
शिक्षा का असली अर्थ है—मन का विस्तार। और जब मन विस्तृत होता है, तब उसमें दूसरों के लिए स्थान बनता है। विनम्रता आती है। करुणा आती है। जिम्मेदारी का बोध आता है।
यदि हमारी शिक्षा इन गुणों को जन्म नहीं दे रही, तो दोष शिक्षा का नहीं, हमारी समझ का है। हमने शिक्षा को केवल साधन बना दिया है, साध्य नहीं। हमने उसे केवल रोजगार से जोड़ा, जीवन से नहीं।
समय आ गया है कि हम अपने बच्चों से यह न पूछें—“कितने प्रतिशत आए?” बल्कि यह पूछें—“तुम कितने संवेदनशील बने?”
न पूछें—“कितना कमाओगे?” बल्कि यह पूछें—“कितना बाँट पाओगे?”
क्योंकि अंततः, मनुष्य की असली पहचान उसकी संपत्ति से नहीं, उसकी संवेदना से होती है। और सच्ची शिक्षा वही है जो हमें मनुष्य बनाए—सिर्फ सफल नहीं, बल्कि सजग, विनम्र और संवेदनशील मनुष्य।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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