चार-दीवारी के भीतर
विदेश में कम रहे धन अकूत
ये माँ बाप के सपूत
हे आधुनिक श्रवण कुमारो—
माँ बाप की आँखों के तारो l
करोड़ों का घर बनवाया—
बालकनी, मॉड्यूलर किचन ,
इंटरकॉम, लिफ़्ट, चिकना फर्श
बस एक चीज़ छूट गई—
अपनों का स्पर्श ।
अब एक विनम्र सुझाव है—
ज़रा उन घरों को
स्मेल-प्रूफ भी करवा दें ।
या कुछ स्मेल डिटेक्टर जड़वा दें
ताकि
भीतर सड़ती संवेदनाओं की गंध
बाहर तक न जाए,
पड़ोसी नाक न सिकोड़ें,
सोसाइटी की इमेज बची रह जाए ,
और आपकी वीडियो कॉल
बिना किसी
“सब ठीक है न?”
जैसे असभ्य सवाल के
चलती चली जाए ।
आपने बड़ी समझदारी की—
माँ-बाप को साथ रखने के
झंझट से बच गए।
अब न दवा की पर्ची,
न डॉक्टर की लम्बी कतार
पर निकलेगी जान ,
न मानसिक बीमारी की
असहज चुप्पियाँ करेंगी परेशान ।
बस—
हर महीने ६ महीने एक ऑफिसियल ,
कंपनी का टूर
पेरेंट्स के साथ औपचारिक दस्तूर
हर साल एक तस्वीर जरूर ,
नीचे कैप्शन लिखा —
“हम कहाँ दूर ”
वाह!
यही तो है
आप का उपकार ।
घर में
एक कमरा तो छोड़ा आपने—
पर वहाँ
इंसान नहीं,
रहता है इंतज़ार।
चार दीवारों के भीतर
धीरे-धीरे
गलता जीवन,
और बाहर
चमकता ताला—
ताला घर पर या
संवेदनाओं पर l
अब अगर
तीस दिन बाद
एक देह मिले
और चार दिन बाद दूसरी—
तो भावुक होने की क्या ज़रूरत?
यह कोई त्रासदी नहीं,
यह तो
सब अनुकूल अर्थ-सम्मत ।
दाह संस्कार
पड़ोसी कर देंगे।
आप ग्लोबल सिटीजन
आपसे इंडिया शाइन हैं।
आपका दुख
ज़ूम कॉल के फ्रेम में
फ़िट एंड फाइन है ।
बस एक आख़िरी दरख़्वास्त—
अगली बार घर बनवाएँ
तो सीसीटीवी के साथ
साइलेंस और स्मेल-कंट्रोल सिस्टम
ज़रूर लगवाएं ।
क्योंकि
अगर संवेदना की बदबू
बहार तक फैलेगी
तो जनता
सवाल पूछने लगेगी —
और सवाल,
यक़ीन मानिए,
सबसे महँगी चीज़ होते हैं।
बाक़ी आप
कमाते रहिए,
डॉलर भेजते रहिए,
और गर्व से कहते रहिए—
“हमने अपने माँ-बाप के लिए
सब कुछ दिया ।”
बस—
वक़्त को छोड़कर।
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