मैं यूँ ही मूवी लिस्ट स्क्रॉल कर रहा था। अचानक नज़र स्वामी पर ठहर गई—मन्नू भंडारी के उपन्यास पर आधारित, बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित, 1977 की वही फिल्म। कोई खास वजह नहीं थी देखने की, न nostalgia, न सिनेमा के किसी तकनीकी पक्ष को परखने की इच्छा। बस लगा, देख लेते हैं। लेकिन फिल्म खत्म होने तक यह एहसास गहराता चला गया कि मैं किसी कहानी से नहीं, बल्कि एक लंबे सामाजिक विमर्श से होकर गुज़रा हूँ—ऐसा विमर्श जो पर्दे के बाहर भी पीछा नहीं छोड़ता।
स्वामी देखते हुए बार-बार यह ख्याल आता रहा कि हम अक्सर फिल्मों को कथानक, अभिनय, संगीत, स्क्रीनप्ले जैसी कसौटियों पर तौलते हैं, लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो इन सबसे आगे जाकर सवाल खड़े करती हैं। स्वामी भी वैसी ही फिल्म है। यह किसी रोमांटिक कहानी की तरह नहीं खुलती, बल्कि धीरे-धीरे एक ऐसी बहस रचती है जिसमें स्त्री-पुरुष संबंध, विवाह, परिवार और निर्णय की स्वतंत्रता आपस में उलझते चले जाते हैं।
मिनी को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि वह कोई क्रांतिकारी स्त्री है। न वह नारे लगाती है, न घर तोड़ने की बात करती है। वह बस पढ़ी-लिखी है, संवेदनशील है, और सबसे बड़ी बात—वह अपने जीवन को जीना चाहती है। नरेंद्र से उसका प्रेम किसी विद्रोह की मुद्रा में नहीं, बल्कि बिल्कुल स्वाभाविक रूप में सामने आता है। जैसे प्रेम कोई असाधारण घटना नहीं, बल्कि जीवन का सहज हिस्सा हो। लेकिन यहीं से टकराव शुरू होता है। परिवार के लिए यह प्रेम नहीं, बल्कि “समस्या” है। समाधान के तौर पर विवाह आता है—एक ऐसा विवाह, जो व्यवस्था की नज़र में सही है, सुरक्षित है, सम्मानजनक है।
घनश्याम से मिनी की शादी होते ही यह साफ हो जाता है कि फिल्म का संघर्ष किसी खलनायक के कारण नहीं है। यहाँ कोई अत्याचारी पति नहीं, कोई हिंसक ससुराल नहीं। सब कुछ शालीन है, सभ्य है, तर्कसंगत है। यही बात सबसे ज्यादा बेचैन करती है। क्योंकि जब दमन क्रूर न होकर सौम्य हो, तब उससे लड़ना और भी मुश्किल हो जाता है। मिनी का असंतोष चीख में नहीं बदलता, वह खामोशी में ढल जाता है। उसकी झुंझलाहट, उसका भीतर-ही-भीतर टूटना—यह सब किसी संवाद से ज़्यादा उसकी चुप्पियों में दिखता है।
यहाँ सवाल उठता है—क्या स्त्री-स्वतंत्रता का मतलब केवल अपनी इच्छा के अनुसार निर्णय लेना है? या फिर परिस्थितियों को समझकर, उनसे सामंजस्य बिठाकर जीना भी स्वतंत्रता का ही एक रूप है? स्वामी इस सवाल का उत्तर देने से बचती है। मिनी का धीरे-धीरे घनश्याम की ओर झुकाव क्या हार है? क्या यह उसकी आकांक्षाओं का अंत है? या फिर यह अनुभव से उपजा एक नया बोध है—कि जीवन केवल सपनों से नहीं, जिम्मेदारियों से भी बनता है?
फिल्म यहीं सबसे ज़्यादा असहज करती है। क्योंकि यह हमें किसी साफ़ निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाती। एक दृष्टि से देखा जाए तो यह स्त्री से ही त्याग की अपेक्षा करती है। प्रेम छोड़ना उसे पड़ता है, समझौता वही करती है। दूसरी ओर यह भी सच है कि घनश्याम भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। वह भी परंपरा, परिवार और सामाजिक नैतिकता से बँधा हुआ है। वह मिनी को आज़ाद छोड़ सकता था, लेकिन उस आज़ादी की कीमत केवल मिनी को नहीं, पूरे ढांचे को चुकानी पड़ती। यह फिल्म बार-बार यह एहसास कराती है कि भारतीय समाज में निर्णय कभी अकेले व्यक्ति का नहीं होता—हर फैसले के साथ कई अदृश्य लोग जुड़े होते हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह लगी कि आज से लगभग पचास साल पहले बनी यह फिल्म उन सवालों को छू रही थी, जिन्हें आज हम स्त्रीवादी विमर्श का हिस्सा मानते हैं। स्वतंत्रता, चुनाव, विवाह की नैतिकता—ये सब मुद्दे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। फर्क बस इतना है कि आज हम उन्हें तेज़ आवाज़ में कहते हैं, और स्वामी उन्हें धीमे स्वर में, लेकिन उतनी ही गहराई से कह जाती है।
फिल्म व्यवस्था को तोड़ती नहीं, उसे मानवीय बनाकर सामने रखती है। यह विद्रोह नहीं, बल्कि एक ठहरी हुई बेचैनी है। शायद इसी वजह से यह कुछ लोगों को असंतोषजनक भी लग सकती है। लेकिन यही इसकी ईमानदारी है। यह अपने समय की सीमाओं के भीतर रहते हुए स्त्री-मन की जटिलता को दर्ज करती है, बिना उसे आदर्श या खलनायिका बनाए।
फिल्म खत्म होने के बाद भी एक सवाल मन में अटका रह जाता है—क्या खुश रहने के लिए अपने सपनों को छोड़ना ज़रूरी है, या फिर कभी-कभी सपनों का रूप बदल जाना ही जीवन की परिपक्वता है? स्वामी इस सवाल का जवाब नहीं देती। वह उसे हमारे सामने रख देती है, और शायद यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसीलिए स्वामी सिर्फ़ एक फिल्म नहीं लगती, बल्कि एक ऐसी बातचीत बन जाती है, जो पर्दा गिरने के बाद भी भीतर चलती रहती है।
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