पहचान का आईना: आप जो सोचते और साधते हैं, वही आप हैं
मनुष्य की असली पहचान उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके मन में बसे विचारों, उसके चुने हुए लक्ष्यों और उसके समर्पण से बनती है। हम वही हैं, जिसे पाने के लिए हम समय और ऊर्जा अर्पित करते हैं।
मनुष्य की असली पहचान उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके मन में बसे विचारों, उसके चुने हुए लक्ष्यों और उसके समर्पण से बनती है। हम वही हैं, जिसे पाने के लिए हम समय और ऊर्जा अर्पित करते हैं।
गीता किसी एक दर्शन का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का समन्वय है। सांख्य से विश्लेषण, योग से अभ्यास, वेदान्त से दृष्टि, भक्ति से करुणा और कर्मयोग से आचरण — गीता आज भी मनुष्य को संतुलन, समत्व और जिम्मेदारी का मार्ग दिखाती है।
ज़िंदगी घटनाओं की नहीं, व्याख्याओं की शृंखला है। हर इंसान अपने कंधे पर एक बैग उठाए चढ़ रहा है—यह मानकर कि उसमें सोना है। पर ऊँचाई बढ़ते ही जब साँस फूलने लगती है, तब सवाल उठता है— क्या सच में बोझ की क़ीमत थी, या हम सिर्फ़ कहानी ढो रहे थे?
नया साल समय के बदलने का नहीं, सोच के बदलने का उत्सव है। प्रकृति जहाँ निरंतरता में जीती है, वहीं मनुष्य हर साल खुद से पूछता है—क्या मैं यही रहना चाहता हूँ? यह लेख नए साल के उत्साह, मनुष्य की अनुकूलन क्षमता और पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने की मानवीय बेचैनी पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि डालता है।
नया साल कोई तारीख नहीं, भीतर की एक हल्की-सी हलचल है। उत्सव का सवाल नहीं, चेतना का सवाल है। जो छूट गया, वही नया है; जो थाम लिया, वही बोझ। कैलेंडर बदलते रहते हैं, साल तभी बदलता है जब दृष्टि बदलती है।
“हमसे हर ओर उजाले हैं, क्योंकि हम दिलवाले हैं!” “चेहरे पर कोई चेहरा नहीं, जो हैं, हम हूबहू हैं वही!” “प्रेम हमारा जीवन सार, प्रकृति से करते हैं प्यार!” “अनुपम यह आत्म-उपहार, तुकबंदी भरे ये प्रिय उद्गार!”
भगवान के पास और कोई काम नहीं? हर परेशानी पर लोग इतना ही कहते हैं—धैर्य रखो, भगवान परीक्षा ले रहे हैं…मानो ऊपर कोई परीक्षा बोर्ड बैठा हो, और हम सब उसके आजीवन परीक्षार्थी हों।” 2. “हर आदमी का प्रश्नपत्र अलग—न टाइम टेबल, न सिलेबस, न नोटिस। बस सुबह उठो और पता चले—भगवान ने आज पॉप क्विज रख दी है!” 3. “पड़ोसी, रिश्तेदार, सलाहवीर—सबको लगता है भगवान ने सवाल-पत्र इन्हीं से पूछा है। खुद के पेपर तकिये के नीचे छुपाएँगे, पर दूसरों की कॉपी में झाँकना नहीं छोड़ेंगे!”
विद्या पोखरियाल की यह कविता "पत्थर हूं मैं" जीवन की विसंगतियों को एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पत्थर कभी पूजित है, कभी ठुकराया गया। मंदिर, नदी, पहाड़ और रास्ते — हर स्थल पर उसका एक अलग अस्तित्व है। यह साधारण होते हुए भी असाधारण है।
यह कविता एक मौन, निःस्वार्थ संगिनी की बात करती है — परछाई की, जो जीवन भर साथ चलती है, बिना शिकायत, बिना अपेक्षा। वो सिर्फ साथ नहीं होती, बल्कि हर क्षण हमें अनुशासन, त्याग और अस्तित्व की सार्थकता सिखाती है। यही छाया, असली संगिनी है आत्मा की।
यह कविता जीवन की उस रहस्यमय दिशा की तलाश है, जहाँ कोई पदचिन्ह नहीं और कोई उत्तर नहीं। कवि उस अज्ञात छोर की ओर देखता है, जहाँ जीवन कभी मुस्कराता, कभी मौन चलता चला जाता है। यह आत्ममंथन की यात्रा है — जिसमें कवि न केवल जीवन को खोजता है, बल्कि स्वयं से भी प्रश्न करता है। हर पंक्ति एक सूक्ष्म पीड़ा को उद्घाटित करती है, जहाँ जीवन का मौन गूंजता है। कविता एक प्रतीक है उस क्षण का, जब मनुष्य समझना चाहता है — क्या सच में जीवन कुछ कहे बिना ही चला जाता है, और पीछे छोड़ जाता है... एक खालीपन।