Dr Shailesh Shukla
May 29, 2026
समसामयिकी
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भारतीय लोकतंत्र में मतदाता अब केवल परंपरागत राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहना चाहता। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, राजनीतिक ध्रुवीकरण और जनसमस्याओं के समाधान की कमी ने नागरिकों को नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश के लिए प्रेरित किया है। आम आदमी पार्टी, टीवीके और सोशल मीडिया आधारित अभियानों की लोकप्रियता इसी बदलती जनभावना का संकेत है। यह लेख भारतीय मतदाता की मनोवृत्ति, राजनीतिक विश्वास के संकट और लोकतंत्र में उभरते नए विकल्पों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
Dr Shailesh Shukla
May 11, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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चुनावी घोषणा पत्र लोकतंत्र का सार्वजनिक वचन होते हैं, लेकिन आज वे अक्सर राजनीतिक प्रचार का साधन बनकर रह गए हैं। यह लेख चुनावी वादों की जवाबदेही, राजनीतिक नैतिकता और लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 17, 2026
व्यंग रचनाएं
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भारत की बी.पी.एल. संस्कृति पर तीखा व्यंग्य—जहाँ लग्ज़री कार वाले भी गरीब हैं और असली गरीब सिस्टम में फंसे हैं। पढ़ें लोकतंत्र की विडंबनाओं पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर लेख।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 30, 2026
व्यंग रचनाएं
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नेताजी कर्मदास की राजनीति जनसेवा से नहीं, फीता-कटिंग से संचालित होती है। कैंची उनकी पहचान है और उद्घाटन उनका धर्म। लेकिन जब बाबा धर्मदास ने उनकी जगह ले ली, तो नेताजी के राजनीतिक अस्तित्व पर ही कैंची चल गई।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 5, 2026
व्यंग रचनाएं
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यह गीता मोक्ष नहीं दिलाती, यह कुर्सी दिलाती है—और वही इसका सबसे बड़ा धर्म है।जहाँ कर्म दूसरों से कराया जाता है और फल स्वयं भोगा जाता है, वहीं से राजनीति का शास्त्र शुरू होता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 21, 2026
व्यंग रचनाएं
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यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।
Ram Kumar Joshi
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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1971 का चुनाव हार-जीत से नहीं, एक पीए के भाषण से इतिहास बन गया।
सत्ता के गलियारों में बोले गए शब्द, जनता ने जेलों में गिने।
आपातकाल की कीमत उन लोगों ने चुकाई, जिनका भाषण से कोई लेना-देना नहीं था।
दिल्ली से नागौर तक—हर चुनाव में कोई न कोई पीए इतिहास लिख ही देता है।
लोकतंत्र में कई बार कर्म किसी के होते हैं, फल किसी और को भुगतने पड़ते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 24, 2025
People
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यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी के उस दुर्लभ व्यक्तित्व को रेखांकित करती है, जहाँ कविता और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहचर बन जाते हैं। सत्ता के उतार–चढ़ाव के बीच भी भाषा की मर्यादा, संवाद की गरिमा और लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा—इस रचना में श्रद्धा नहीं, वैचारिक स्मरण है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 7, 2025
Blogs
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लोकतंत्र की गाड़ी पम-पम-पम करती आगे बढ़ रही है—टायरों में हवा नहीं, पर वादों की फुलावट है। ड्राइवर बूढ़ा है पर जीपीएस नया, जो सिर्फ उसी की सुनता है। जनता सीट बेल्ट बाँधकर सफ़र का आनंद ले रही है—मंज़िल का सपना है ‘2047 का भारत’। इंजन पुराने भाषणों से गरम है, और भोंपू झूठे वादों का गान गा रहा है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 26, 2025
शोध लेख/विमर्श
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Pandit Deendayal Upadhyaya envisioned a philosophy where politics, economics, and society revolve around the dignity of the individual. Through Integral Humanism, he rejected blind imitation of capitalism and communism, stressing Antyodaya—upliftment of the last person. As a thinker, journalist, and organizer, his writings combined philosophy with practicality. From “Rashtradharma” to economic critiques, his legacy remains a guide for human-centered, ethical development, resonating in India’s contemporary policies.