बी.पी.एल. संस्कृति-हास्य व्यंग्य रचना

बी.पी.एल. संस्कृति

इस लोकतंत्र की प्रयोगशाला में बरसों से गरीबों के उत्थान के लिए कोई अचूक दवा इजाद करने की मशक्कत में न जाने कितने ही आयोग, चिंतन, मंथन, चर्चा, मीटिंग्स और संसदीय सत्रों के गड्डमड्ड मिश्रण से,यूँ समझिए कि टेस्ट ट्यूब बेबी की तरह जो हमने पैदा करवाया है, वह है बी.पी.एल. कल्चर।

कितनों के ही पेट पल रहे हैं इस बी.पी.एल. बेबी से,योजना बनाने वाले, योजना के नाम पर भाषण देने वाले और योजना के नाम पर लूटने वाले..सबके सब।

तनिक नज़र डालिए,कैसे-कैसे बी.पी.एल. के पाले हुए ये खाए-अघाए बीपीएलिए! गले में मोटी सोने की जंजीर, मकान के सामने खड़ी लग्ज़री कार, चारों दरवाज़े खुले हैं, अंदर एल.ई.डी. स्क्रीन पर भजन चल रहा है और पीछे की सीट पर बोरों में चावल व गेहूँ भरे हैं। इन्हें देखकर सरकारी बाबू भी द्रवित हो उठता है-“काश, हम भी गरीब होते!”

यही हैं भारतवर्ष के असली बी.पी.एल. महारथी। सरकार इनकी है, सरकार को ये पाले हैं और सरकार इन्हें पाल रही है।

द्वैतवाद का जीवंत नमूना है आज की बी.पी.एल. संस्कृति! अब आप कहेंगे कि यह विरोधाभास है! नहीं…! यह भारतीय दर्शन का मूर्तिमान उदाहरण है,द्वैतवाद का जीवंत मॉडल, जिसमें आदमी एक साथ ‘गरीब’ भी है और ‘गाड़ीवाला’ भी। गरीबी भी अब अय्याश टाइप की हो गई है,ऐसे ही आलीशान घरों में टिकती है।

देखो इन महारथियों को,अक्सर राशन की दुकान से गरीबी को फतह करते हुए बी.पी.एल. योद्धा की तरह निकलते हैं। पर्ची फटती है, बोरा लदता है, और फिर ‘श्रम ही पूजा है’ के सिद्धांत पर चलते हुए उसी राशन को ब्लैक में बेचने का ‘उद्यम’ शुरू हो रहा है। बेचारा असली गरीब उस लाइन में उस यात्री की तरह है, जिसकी सीट कभी आरक्षित होगी ही नहीं।

ऐसे कितने ही कार वाले, महल वाले गरीब आपको दिख जाएंगे। अब देखिए,इनका जीवनचक्र:
सुबह इसकी गाड़ी में ‘सरकारी राहत’ का पेट्रोल डलता है,
दोपहर को ‘फ्री राशन’ का सौदा इधर से उधर होता है,
शाम को ‘जनकल्याणकारी शराब’ की बोतल खुलती है,
और रात को ‘भविष्य की योजना’ बनती है,“कल कौन सा फॉर्म भरें, जिससे अगली किश्त आए।”

ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा। कभी-कभार सरकार कोई तिकड़म लगा दे,जैसे बायोमेट्रिक। कोई तकनीकी अनर्थ इनके सुनहरे भविष्य पर लात मार दे,बायोमेट्रिक फेल हो जाए, या सरकार को अचानक याद आ जाए कि “गरीबों की सूची तो अपडेट करनी चाहिए”,तो बात अलग है!

अब प्रश्न उठता है,जो असली गरीब हैं, जिनके पास न गाड़ी है, न बंगला, न गाड़ी की परछाईं,उनका क्या?
अरे मित्र! वो तो सिस्टम के यज्ञ में आहुति हैं।
आधार से लिंक कराने, ई-श्रम कार्ड बनवाने और के.वाई.सी. की तंग गलियों में उलझे हुए ये लोग एक प्रकार से नए भारत के डिजिटल अरेस्ट में कैद हैं। ये शरीर से नहीं, आश्वासनों से ज़िंदा हैं।

बीच-बीच में सरकार जाग भी जाती है और पूछ बैठती है,“यार, गरीबी हटा रहे हैं, फिर भी इतने गरीब कहाँ से आ गए?”
तब कोई दिलासा देता है,“माई-बाप, आप गरीबों की सरकार हैं। हम गरीब नहीं रहेंगे तो सरकार कहाँ रहेगी?”

गरीबी कोई कष्ट नहीं,एक अवसर है। और जैसा कि हमने अवसरवाद से सीखा है,यदि फॉर्म में ‘गरीब’ भरने से लाभ मिले, तो मूर्ख ही होगा जो ‘मध्यम वर्ग’ का तमगा ढोएगा।

जब बायोमेट्रिक का महासंग्राम छेड़ा गया, तब असली हाहाकार मचा। पता चला कि कई ‘कार वाले गरीब’ तो मृत्यु के बाद भी राशन ले रहे थे! ये वो ‘पितृपक्ष एक्सप्रेस’ के यात्री हैं, जो तर्पण में भी अनाज नहीं छोड़ते।

जब उनके नाम काटे गए, तो राशन दुकान वालों ने कराहते हुए कहा,“अभी तक तो हमें भूत-प्रेतों पर विश्वास था, सरकार ने अब भूतों का हक भी छीन लिया!”

इस बायोमेट्रिक डिजिटल गड़बड़ी का असर कुछ इस प्रकार से घातक हुआ,कोटेदारों की बायपास सर्जरी हो गई, प्रधानों का आत्मबल टूट गया, सोचिए इस देश की जीडीपी को तो जैसे कार से उतरकर पैदल चलना पड़ गया होगा।

लेकिन चिंता न करें,सरकार कुछ न कुछ करेगी इन अनुचित  लाभ से वंचित अवसरधारियों के लिए।
बी.पी.एल. संस्कृति अक्षुण्ण रहेगी…

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अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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