Prem Chand Dwitiya
Mar 16, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज के सार्वजनिक जीवन में संवेदना भी एक सार्वजनिक प्रदर्शन बन गई है। किसी की पीड़ा कम हो या न हो, पर फोटो, पोस्ट और लाइक-शेयर की दुनिया में संवेदना का बाजार खूब गर्म है। यह व्यंग्य उसी विडंबना को पकड़ता है जहाँ असली वेदना से ज्यादा महत्व संवेदना की तस्वीरों को मिल जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 12, 2026
व्यंग रचनाएं
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सरकार की पशुपालन योजना में गाय-भैंस को तो जगह मिल गई, पर गधे को अभी भी पहचान का इंतजार है। गधा गणना में घटती संख्या ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है। इस व्यंग्य में गधा संरक्षण, पति पंजीकरण और पड़ोसी देशों की गधाग्राही अर्थव्यवस्था के बहाने समाज और व्यवस्था पर हल्का-फुल्का कटाक्ष किया गया है।
Dr Shailesh Shukla
Mar 7, 2026
लघु कथा
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डॉ. शैलेश शुक्ला की ये पाँच लघुकथाएँ — वारिस, नमक का हक़, कागज़ की ढाल, जाति की छतरी और मुफ़्त का नशा — हमारे समाज की गहरी विडंबनाओं को उजागर करती हैं। लालच, विश्वासघात, व्यवस्था की असमानता, जातिगत राजनीति और मुफ़्तखोरी की मानसिकता पर ये कथाएँ संक्षिप्त होते हुए भी तीखा सामाजिक प्रश्न खड़ा करती हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 21, 2026
Science Talk (विज्ञान जगत )
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Galgotia University AI Summit विवाद ने केवल एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस मानसिकता को उजागर किया है जहाँ हम सच्चाई से अधिक दिखावे को महत्व देते हैं। क्या हम मूवी सेट पर जी रहे हैं—जहाँ चमक असली है, पर दीवारें खोखली? यह लेख हमारे सामूहिक आत्ममंथन का आग्रह है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 5, 2026
Book Review
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‘बाराखड़ी’ केवल व्यंग्य-रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों की वर्णमाला है। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी अपने तीखे लेकिन संतुलित व्यंग्य के माध्यम से पाठक को हँसाते नहीं, बल्कि सोचने को विवश करते हैं।
इस समीक्षा में ‘लड़की का बाप’, ‘घोटालाटूर’, ‘खाली देगची और भूखी पंगत’, ‘गरीबी हटेगी’, ‘पहचान हो तो ठीक रहता है’ जैसी रचनाओं के चयनित उद्धरणों के सहारे यह दिखाने का प्रयास है कि कैसे लेखक हास्य को साधन बनाकर गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाते हैं।
यह संग्रह पाठकों के साथ-साथ व्यंग्यकारों के लिए भी एक पाठशाला की तरह है, जहाँ शिल्प, संवेदना और सरोकार का संतुलन सीखने को मिलता है। ‘बाराखड़ी’ आज के समय को समझने के लिए एक अनिवार्य व्यंग्य-पाठ है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 4, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज रिश्ते तय नहीं होते, डेमो दिए जाते हैं। बायोडाटा अब परिचय नहीं, प्रोडक्ट कैटलॉग है—जिसमें माइलेज, एसेट्स और फ्री एक्सेसरीज़ गिनाई जाती हैं। सवाल बस इतना है:
क्या संस्कार भी EMI पर मिलते हैं?
Prem Chand Dwitiya
Feb 4, 2026
व्यंग रचनाएं
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पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 21, 2026
व्यंग रचनाएं
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बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी।
नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम।
‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं।
समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 16, 2026
व्यंग रचनाएं
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“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।”
“किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।”
“इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।”
“कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 29, 2025
हिंदी कविता
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चार दीवारों के भीतर
धीरे-धीरे
गलता जीवन,
और बाहर
चमकता ताला—
संस्कार ज़िंदा थे,
बस माता-पिता नहीं रहे।