पद्म पुरस्कारों में 45 गुमनाम नायकों को पुरस्कार मिलने की खबर पढ़कर पंडित शिवनारायण जी अज्ञानचबूतरे पर ज्ञान की चर्चा करते हुए बोले नाम पर तो बहुत कुछ लिखा गया ,बहुत कुछ कहा गया लेकिन गुमनाम हस्तियों ने कठिन चीजों को चेलेंज देते हुए पुरस्कार प्राप्त कर गुमनाम जिंदगी से गुम को रफा दफा कर ,नाम ,हासिल कर नामचीन हो गए ।अरे हम भी अनाम है हम में से कुछ बदनाम है कुछ गुमनाम है और हमारा नाम गुम ही है ।और तो और शेक्सपियर ने ,नाम में क्या रखा है ,लिखकर नाम की धजिय्या उड़ा दी ,लेकिन नाम में अनाम, गुमनाम बदनाम, सुनाम बेनाम बहुत समाया हुआ है ।जिससे वह सारी बातें निहित है जो नाम में भी नहीं है !
गुमनाम हस्तियों की चर्चा में अपनी आहुति देते हुए सुनील भैया बोले गुमनाम ,गुमशुदा रहते हैं दुनिया में नाम बदलने का सिलसिला कभी बदलता नहीं है ,कई तो जिंदगी भर गुमनाम नाम को नाम देने के लिए है जतन करते हैं लेकिन गुम हुआ ,नाम , हासिल नहीं कर पाता है ।अरे इन पुरस्कारों को प्राप्त कर नामी बनने वाले गुमनामियों ने भी खामोशी से समाज में इतना बदलाव लाए कि समाज तो बदला ही उनका गुमनाम भी ,नाम, में बदल गया। इस पर नरेंद्र स्वामी जी बोले बस के यात्रियों कौ टिकट बांटने वाले कंडक्टर जो जिंदगी भर आगे पीछे सरको, तीन पर चार बैठ जाओ,अरे पायदान पर खड़े रहो,बोनट पर बैठ जाओ,बस स्टैंड पर आवाज लगाने वाले अंके गौड़ा ने पद्म पुरस्कार कंडक्टर की, टिकट बुक ,से बुक को अपने जेहन में ,बुक, कर विश्व का सबसे बड़ा पुस्तकालय स्थापित कर गुमनाम नाम को गुमनामी से बाहर निकाल कर विश्व में अपना नाम कमा लिया।
यही नहीं एक गुमनामी ने कूड़ा बीनने वाले हजारों बच्चों का जीवन संवार कर अपना नाम भी संवार लिया और गुमनामी जिंदगी से एक नामी शख्सियत बन गए ।
इस पर निवान भाई बोले एक गुमनामी ने रबर प्रजाति के पेड़ ,फिकस ,की जड़ों को बुनकर 600 वर्ष तक टिकने वाला पुल बना दिया और गुमनामी से बाहर आकर गुमनाम नाम को पहचान दे दी और बिहार में टूटने वाले बदनाम पूलों की पोल खोलकर टिकने वाला पुल बनाकर अपने गुमनाम में से गुम को, पूल, कर नाम को स्थापित कर लिया । इतना ही नहीं साइकिल से जा जा कर दस वर्ष से सड़कों की सफाई कर कर पद्म पुरस्कार प्राप्त करने वाले इंद्रजीत सिंह ने सड़क की सफाई के साथ-साथ अपनी गुमनामी की भी सफाई कर दी ।
जब गुमनाम बस्तियों में रहने वाले गुमनामों की चर्चा चल रही थी तो रिटायर्ड प्रोफेसर काग बोले छोटी-मोटी कला वाले जो प्लेटफार्म न मिलने से गुमनामी जीवन जीते हैं उनमें एक गुमनाम कलाकार ने तमाशा कलाकार ,बनकर हजारों तमाशों के जरिए दहेज प्रथा, भ्रष्टाचार ,अपराध प्रवृति और साफ सफाई अभियान चलाकर.गंदगी पर पलीता लगा दिया। किसी ने बंजर भूमि को उपजाऊ कर गुमनाम की खरपतवार को नष्ट कर नामी फसल उगाली और पुरस्कार प्राप्त कर नामी हो गए ।इस पर शायराना मजाक रखने वाले विपुल जी टपके और बोले नाम से ज्यादा गुमनाम पर फिल्में, नाटक बने हैं। ,गम है किसी के प्यार में पर शायरी लिखी गई गीत गाए और गुमनाम से नामी गिरामी बन गए लेकिन जिसे ख्याति प्राप्त न हो वह गुमनाम होता है जिसका नाम न जाने वह गुमनाम होता है और गुमनाम लेटर ,गुमनाम शिकायत, गुमनाम हस्ताक्षर, गुमनाम राइटर भी होते हैं । लेकिन यह जब कोई नाम पा लेते हैं या नामी बन जाते हैं तब इनका वजूद सारी सिद्धियों और प्रसिद्धयों को पीछे छोड़ देता है। इस पर विमल जी बोले नाम ही ऐसी चीज है जिस पर लोग मर मिटते हैं, नाम के लिए लड़ते हैं, नाम के लिए मरते हैं, नाम के लिए संघर्ष करते हैं ,नाम के लिए ज्ञापन ,विज्ञापन ,प्रदर्शन, धरना देते हैं ।नाम के लिए फेसबुक इंस्टाग्राम पर जानी अनजानी हरकतें अपलोड कर नामचीन बनना चाहते हैं । लेकिन ऐसे कई नाम वाले हैं वे बदनाम भी है । जिसके पास नाम की चाहत नहीं है वे गुमनाम है ।और वे नाम में क्या रखा है नीयति से काम करते हैं तो गुमनामी से ही नाम पा लेते हैं। इसलिए किसी गुमनाम ने लिखा है कि
,,आज गुमनाम हूं जरा फासला रख मुझसे,
कल फिर ,नाम वाला, हो जाऊं तो कोई रिश्ता निकाल लेना !
Comments ( 1)
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डॉ मुकेश 'असीमित'
2 weeks agoयह रचना गुमनामी और नाम के बीच के फासले को बेहद सादगी और तीखे व्यंग्य के साथ उजागर करती है। लेखक ने समाज के उन चेहरों को सामने रखा है जो बिना शोर किए बदलाव रचते हैं और देर से सही, नाम पा ही लेते हैं। भाषा सहज है, कथ्य प्रभावी है और अंत की पंक्तियाँ पूरे लेख को अर्थवत्ता प्रदान करती हैं। एक सार्थक, समकालीन और विचारोत्तेजक प्रस्तुति।